भारत में ताम्रनिधियाँ | ताम्रपाषाण काल | Chalcolithic age in hindi | chalcolithic culture in hindi | Tamrapashan kaal Part-2

भारत में ताम्रनिधियाँ : भारत में ताम्र निधियों का ज्ञान सर्वप्रथम सन् 1822 ई० में हुआ जब उत्तर प्रदेश में कानपुर के बिठूर नामक स्थान से ताँबे के औजार मिले।

कालान्तर में अनेक स्थानों से भी ताँबे के उपकरण प्राप्त हुए जिन्हें ताम्र निधियों के अन्तर्गत परिगणित किया गया।

भारत में ताम्रनिधियाँ
भारत में ताम्रनिधियाँ

ये उपकरण आकस्मिक रूप से खेत जोतते समय, नहर की खुदाई करते समय अथवा सड़क निर्माण के समय मिले थे।

इन ताम्र उपकरणों का समूह में मिलना ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया, इसलिए पुरातत्त्वविद् ताम्र उपकरणों का स्थान-स्थान पर बिल्डर (ढेर) के रूप में मिलने के कारण इन्हें ‘ताम्रनिधि’ को संज्ञा प्रदान हैं।

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ताम्रनिधियो की खोज : भारत में ताम्रनिधियाँ

विभिन्न स्थानों से ताम्रनिधि संस्कृति के मिलने के कारण पुरातत्त्वविद् इसके ऐतिहासिक महत्व को और आकर्षित हुए, जिसके फलस्वरूप 1905 ई. और 1907 ई० में स्मिथ महोदय ने ताम्र निधियों की संक्षिप्त सूची प्रस्तुत की।

सन् 1916 ई० में हीरानन्द शास्त्री ने ताम्रनिधियों पर एक लेख लिखकर विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया।

इसी प्रकार हाइन गेल्दर्न और स्टुअर्ट पिग्गट ने भी ताम्रनिधि संस्कृति की ऐतिहासिकता और उसके सम्बन्ध के विषय में अपने मत प्रतिपादित किये।

सन् 1951 ई० में डी० बी० लाल ने गंगा घाट के ताम्रनिधियों पर एक विद्वतापूर्ण शोध-निबन्ध लिखकर ताम्रनिधि संस्कृति की समस्याओं को हल करने का प्रयास किया।

ताम्रनिधि संस्कृति का विस्तार : Tamrapashan kaal

सम्प्रति-भारत में ताम्रनिधियों की संख्या 86 से अधिक मानी गयी है जिनमें हरियाणा से पाँच, राजस्थान से सात, उत्तर प्रदेश से तैंतीस, बिहार से उन्नीस, पश्चिम बंगाल से छ:, उड़ीसा से सात, मध्य प्रदेश से आठ और कर्नाटक से एक पुरास्थल प्राप्त हुए हैं।

इन ताम्र निधियों से लगभग एक हजार उपकरण प्राप्त हुए हैं। मध्य प्रदेश के गुंगेरिया पुरास्थल के अलावा ताम्र वस्तुओं के प्राप्त होने का औसत एक से सैंतालीस के मध्य है।

गंगेरिया पुरास्थल से 424 ताम्र वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। उत्तर प्रदेश के प्रमुख तामनिधि पुरास्थलों में बिहार तथा फतेहगढ़ (दोनों कानपुर जिला), राजपुर-परसू (बिजनौर जिला), परिहर (उन्नाव जिला), बिसौली (बदायूं जिला), सरथौली (शाहजहाँपुर जिला), खानपुर (बुलंदशहर जिला), हैदराबाद (सहारनपुर जिला) और सेफई (इटावा जिला) उल्लेखनीय हैं।

ये सभी स्थल 78° से 84° पूर्वी देशान्तरों के मध्य स्थित हैं।

पुरातत्त्वविदों के अनुसार ताम्रनिधि संस्कृति के कुछ विशेष उपकरण मत्स्य भाले, श्रृंगिका तलवार और मानवाकृतियाँ मात्र 24° उत्तरी अक्षांश तक ही उपलब्ध हुए हैं।

अन्य पुरास्थलों में हामी (छोटा नागपुर क्षेत्र, बिहार), बरगुण्डा, कौशल्या (दोनों बिहार), तमाजुरी (पश्चिम बंगाल), दुनिया, भागलपुर (उड़ीसा), दायमाबाद ( अहमदनगर जिला, महाराष्ट्र), गुंगेरिया और पोण्डी (मध्य प्रदेश) तथा कोल्लूर ( रायपुर जिला, कर्नाटक) आदि का उल्लेख किया जा सकता है।

ताम्रनिधि संस्कृति से अभी तक जो महत्त्वपूर्ण उपकरण अथवा औजार प्राप्त हुए हैं उनका विन शुद्ध तने से किया गया है। इनमें किसी भी अन्य धातु का मिश्रण नहीं है।

ऐसा प्रतीत होता है कि ताम्र उपकरणों का निर्माण वर्ग विशेष के द्वारा किया जाता था, ताम्रनिधियों के आस-पास आवासीय साक्ष्यों का अभाव है। अत: इनका निर्माण स्वतन्त्र रूप से शिल्पियों द्वारा किया गया रहा होगा।

ताम्रनिधि संस्कृति के प्रमुख उपकरण-ताम्र निधियों के विभिन्न भण्डारों से अनेक प्रकार के ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं जिनका संक्षिप्त परिचय है―

(1) श्रृंगिका तलवार-

इस उपकरण की लम्बाई 40 सेमी० से 50 सेमी ० के बीच में है। इसमें एक फलक है। फलक में मूठ की ओर किसी कीटाणु के शृंग की भाँति दो श्रंगिकाएँ निकली ई हैं। तलवार का फलक स्पष्ट रोढ़ युक्त है। मूठ मुंगिका सहित द्वाली गयी है।

पुरातत्त्वविदों का अनुमान है कि इन्हें हाथ में पकड़ कर प्रयोग किया जाता रहा होगा। धर्मपाल अग्रवाल के मतानुसार श्रृंगिका तलवार का प्रयोग शिकार में किया जाता था।

(2) मानवाकृति या मानवकल्प-

इन उपकरणों का आकार मानव के आकार की तरह (सिर, दो हाथ, दो पैर) है इसके हाथ अन्दर की ओर मुड़े हुए हैं। पैर बाहर की ओर झुके हैं। हाथ का बाहरी सिरा धारदार तथा सिर की अपेक्षा पतला है। पाँवों के आन्तरिक भाग में धार नहीं मिलती है। इनका निर्माण ताँबे की पत्तल को काटकर हथौड़ी से किया गया है।

इस उपकरण के प्रयोग के विषय में विद्वान् एक मत नहीं है। कतिपय विद्वान् इसका सम्बन्ध धार्मिक अनुष्ठान से जोड़ते हैं। धर्मपाल अग्रवाल के मतानुसार इनका प्रयोग फेंककर चिड़ियों के शिकार में किया जाता था।

(3) पट्टीदार या चिपटी कुल्हाड़ियाँ-

इनका आकार आयताकार है। इसमें एक ओर धार बनी है जो सिरे की अपेक्षा चौड़ी है। इनका निर्माण सम्भवत: खुले साँचे में किया गया है क्योंकि  कुल्हाडियाँ एक और चपटी और दूसरी ओर उभरी हुई (उन्नतोदर) हैं, जबकि गुंगेरिया प्रकार की कुल्हाड़ियाँ बन्द साँचे में ढाली गयी है इन कुल्हाड़ियों का प्रयोग सम्भवतः लकड़ी काटने के लिए किया जाता था।

(4) स्कन्ध कुल्हाड़ियाँ-

इन कुल्हाड़ियों में काम करने वाले सिरे की चौड़ाई दूसरे सिरे से अधिक है। कार्य करने वाले चौड़े सिरे में धार बनायी गयी है। इनका प्रयोग भी लकड़ी काटने के लिए किया जाता था।

(5)दुधारी कुल्हाड़ियाँ-

इन कुल्हाड़ियों में दोनों ओर धार है। धार का सिरा अर्द्धचन्द्राकार है। ये कुल्हाड़ियाँ बीच में संकरी हैं। इनका निर्माण अण्डाकार चादर से गोलाकार टुकड़ा काटकर किया गया है।

अग्रवाल महोदय का मत है इनका प्रयोग कुल्हाड़ी के रूप में करने से पतला होने के कारण मुड़ जाने का डर था। अतः इनका प्रयोग सम्भवतः भूमि अनुदान करने के पट्टों की तरह प्रयोग किया गया रहा होगा।

(6) सब्बर या छड़-कुल्हाड़ी-

इनका आकार छड़ की तरह आयताकार है। ये सपाट और चिकने हैं। छड़ कुल्हाड़ी के फलक का एक भाग चिपटा और दूसरा भाग उन्नतोदर है। इनमें किनारों को छाँटकर धार बनायी गयी है।

इनकी लम्बाई 12 सेमी० से लगभग 45 सेमी० तक मिलती है। गुंगेरिया के छड़-कुल्हाड़ी में आरे की तरह दाँते कटे हुए हैं।

अग्रवाल महोदय का मत है कि इनका प्रयोग सब्बर की तरह खुदाई (संभव: ताँबे की खानों की खुदाई) में किया जाता था।

(7) परशु-

इनका आकार खुरपी की तरह है। ये उपकरण सपाट है। इन उपकरणों में अर्द्धवृत्ताकार-धार बनी हुई है। धार के कोनों को मोड़ दिया गया है।

(8) मत्स्य भाला-

इनका आकार त्रिभुज की तरह है। ताम्र निधियों में दो प्रकार के मत्स्य भाले प्रकाश में आये हैं। प्रथम प्रकार के मत्स्य भाले का निर्माण ताँबे की चादर को काट कर किया गया है।

इस उपकरण का ऊपर का भाग नुकीला और रीढ़ वाला है। इसमें ऊपर के कुछ भाग को छोड़कर चार या पाँच जोड़ी तिरछे दाँतों को बनाया गया है।

द्वितीय प्रकार के मत्स्य भाले का आकार तीर की तरह है। इसके नीचे के भाग में नुकीले कांटे निकले हुए हैं। धार के नीचे दोनों ओर नुकीले काँटे बने हैं जिनकी संख्या चार से लेकर आठ तक है।

मूठ के ऊपर और काँटों के बीच दोनों तरफ एक उभार होता है। एक ओर के उभार में एक छिद्र होता है। पुरातत्त्वविदों की मान्यता है कि इस प्रकार के मत्स्य भाले का निर्माण साँचे में किया जाता रहा होगा।

(9) काँटेदार तलवार-

इस उपकरण के फलक समानान्तर पार्श्व वाले हैं इसके फलक में रीढ़ स्पष्ट बनी हुई है। इसमें एक मूठ है जिसकी लम्बाई लगभग 10 सेमी है। यह उपकरण लगभग तीस से सत्तर सेमी० लम्बा हैं।

मूठ के नीचे बाहर की ओर एक काँटा है, जिसे ढलाई के बाद छेनी से बनाया गया है। तलवार का निर्माण ढाल कर किया गया है।

(10) छल्ले-

ताम्रनिधि संस्कृति में छल्लों का निर्माण भी किया गया है। इन छल्लों का निर्माण ताँबे के छड़ों को मोड़कर गोल आकार देकर किया गया है।

इस प्रकार के छल्ले मध्य प्रदेश के पोण्डी से मिले हैं जिनकी संख्या 37 है। धर्मपाल अग्रवाल के मतानुसार छल्लों का प्रयोग तौलने में बाँट के रूप में किया जाता रहा होगा।

ताप्रनिधियों का सम्बन्ध- chalcolithic culture in hindi

देश के विभिन्न भागों से ताम्रनिधि संस्कृति के मिलने के पश्चात् पुरातत्त्वविदों के लिए इसे सम्बन्धित संस्कृति की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक हो गया था। ताम्र निधियों से किसी अन्य प्रकार के पुरावशेष मृद्भाण्ड आदि नहीं प्राप्त हुए हैं।

बी० बी० लाल महोदय ने ताम्र निधियों से सम्बन्धित पुरास्थलों राजपुर पशु और बिसौली का उत्खनन करवाया, जिसके फलस्वरूप गैरिक मृदभांड के अवशेष प्राप्त हुए किन्तु दोनों पुरास्थल एकल संस्कृति के हैं; अत: समय निर्धारण में कठिनाई यथावत बनी रही।

तत्पश्चात् अनेक पुरास्थलों (जिनका सम्बन्ध ताम्र निधियों से था) का उत्खनन कार्य किया गया, जिनमें लाल किला, अतरंजीखेड़ा, बहदराबाद, बड़ागाँव, आँबखेड़ी, सेफई, बहरिया आदि उल्लेखनीय हैं।

इन सभी पुरास्थलों से गैरिक मृदभांड के पुरावशेष उपलब्ध हुए। सेफई में गैरिक मृदभांड के साथ ताँबे का एक मत्स्य भाला भी मिला है।

अत: अधिकांश पुरातत्वविद् ताम्र निधियों का सम्बन्ध गैरिक मृद्भाण्ड परम्परा से जोड़ते हैं।

काल निर्धारण- Chalcolithic age

सामान्य: ताम्र निधियों का सम्बन्ध गैरिक मृदभांड परम्परा से माना जाता है। सेफई (इटावा जिला, उ० प्र०) से गेरुए रंग के पात्रों के साथ ताँबे का मत्स्य भाला भी प्राप्त हुआ है।

अन्य गैरिक मृदभांड पुरास्थलों से भी ताम्रनिधियाँ प्राप्त हुई हैं (यद्यपि इनका पुरातात्त्विक सम्बन्ध प्रत्यक्ष नहीं है) किन्तु अधिकांश विद्वान ताम्र निधियों का समय 2000 ई० पु० से 1500 प० निर्धारित करने का सुझाव देते हैं।

ताम्र निधियों के निर्माता-

ताम्र निधियों का सामान्यतः सम्बन्ध गैरिक मृदभांड परम्परा से जोड़ा जाने लगा है किन्तु ताम्र निधियों के वास्तविक निर्माता कौन थे? पुरातत्वविदों में यह प्रश्न आज भी विवादित है। विभिन्न विद्वानों ने इस सम्बन्ध में अपने भिन्न-भिन्न मत प्रतिपादित किये हैं

(1)ताम्र निधियों के सूत्रधार आर्य थे-

इस मत का प्रतिपादन हाइन गेल्दर्न ने किया है। उनका मत है कि आर्य भाषा का प्रयोग करने वाले लोगों का सम्बन्ध तामनिधियों से था।

गेल्दर्न महोदय के मत का समर्थन प्रारम्भ में स्टुअर्ट पिग्गट ने भी किया, किन्तु पिगॅट महोदय ने बाद में अपने मत में संशोधन किया और इसका सम्बन्ध सिन्धु सभ्यता के विस्थापितों से जोड़ने का प्रयास किया।

गैलरी महोदय अपने मत के समर्थन में ट्रान्स काकेशिया, मध्य एशिया, पश्चिमी एशिया, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से प्राप्त धातु उपकरणों के अध्ययन को आधार बनाया है।

उनके अनुसार टेकदार-कुल्हाड़ी ट्रान्स काकेशिया से ईरान होते हुए 1200-1000 ई० पू० में आयी। कुल्हाड़ी-बसूला का आगमन डेन्यूब क्षेत्र से ईरान होते हुए 1200-1000 ई० पू० में हुआ।

फोर्ट मुनरो तलवार का आगमन 1200-1000 ई० पू० में ईरान से हुआ और इसी प्रकार कोबान से प्राप्त सपक्षतलवार का प्रभाव शृंगिका तलवार पर दिखाई पड़ता है जिसका समय 1200-1000 ई० पू० माना जाता है ।

 गैलरी महोदय ने आर्यों के मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख पुरास्थलों के धातु उपकरणों की समानता ताम्र निधियों से करने का प्रयास किया है।
उल्लेखनीय है कि गेल्दर्न महोदय जिन स्थानों का विवरण देते हैं वे सभी आर्यों के भारत आने के मार्ग में पड़ते है, किन्तु हाइन गेल्दर्न के इस मत को मान्यता नहीं मिल सकी।
इस मत का खण्डन करते हुए बी० बी० लाल का मत है कि गेल्दर्न महोदय जिन धातु उपकरणों की समरूपता ताम्र निधियों से करते हैं वे कांस्य धातु के बने हैं जबकि ताम्र निधियों के उपकरण शुद्ध तांबे के हैं।
बी० बी० लाल के अनुसार कोबान की सपक्ष तलवार का सम्बन्ध श्रृंगिका तलवार से नहीं किया जा सकता, क्योंकि दोनों में तकनीकी अन्तर है। कोबान की तलवार में मूठ अलग से जोड़ी गयी है जबकि शृंगिका तलवार में मूठ को तलवार के साथ ही ढाला गया है।
लाल महोदय ने यह भी कहा है कि मत्स्य भाले, शृंगिका तलवारें और मानवाकृतियाँ जो ताम्र निधियों के विशेष उपकरण हैं, ऊपरी गंगा घाटी के बाहर कहीं से भी नहीं मिले हैं।
साथ ही टेकदार कुल्हाड़ी, फोर्ट मुनरो तलवार और छिद्रयुक्त बसूले भी गंगा के दोआव से नहीं प्राप्त हुए हैं। अत: ताम्र निधियों का सम्बन्ध आर्यों से जोड़ना तर्कसंगत नहीं लगता है।

(2) ताम्र निधियों के निर्माता सिन्धु सभ्यता के विस्थापित लोग थे-

इस मत का प्रतिपादन स्टुअर्ट-पिग्गट ने किया है। पिग्गट महोदय ने पहले हाइन गेल्दर्न के मत का समर्थन किया था, किन्तु बाद में अपने मत को संशोधित किया और कहा कि सिन्ध सभ्यता के विस्थापित लोग ही. ताम्र भण्डारों के सूत्रधार थे। पिगॉट के इस मत का खण्डन बी० बी० लाल ने किया है।

लाल महोदय का मत है कि ताम्र भण्डारों के स्तरों से सिन्धु-सभ्यता के मृद्भाण्ड नहीं मिले हैं, साथ हो सिन्धु सभ्यता का कोई पुरावशेष ऐसा नहीं है जिसका सम्बन्ध ताम्रनिधियों से जोड़ा जा सके।

लाल ने सम्भावना व्यक्त की है कि नगरीय सभ्यता से जुड़े लोगों के विस्थापित होने के बाद सभ्यता के सामान्य तत्त्व का भी न मिलना आश्चर्यजनक है।

सिन्धु सभ्यता और ताम्रनिधियों में किसी प्रकार की समानता नहीं मिलती है। अत: ताम्र निधियों का सम्बन्ध सैन्धव सभ्यता के विस्थापित लोगों से जोड़ना औचित्य पूर्ण नहीं लगता है।

(3) ताम्र निधियों के सूत्रधार दोआब के आदिम कबीले के लोग थे-

इस मत का प्रतिपादन बी० बी० लाल ने किया है। उनके अनुसार भारत के दोआब में आयों के आने से पुर्व यहाँ आदिम कबीलों का निवास था जिनमें शबर, निषाद आदि का उल्लेख किया जा सकता है।

लाल महोदय उत्तर प्रदेश के गढ़वाल से लेकर बिहार तक प्रोटो-आस्ट्रेलायड प्रजाति के तत्त्व का आज भी होना स्वीकार करते हैं।

उनके अनुसार आर्यों के आगमन के साथ ये आदिम कबीले के लोग दोआब का मूल स्थान छोड़कर दक्षिण-पूर्व की ओर चले गये, जहाँ इन्हें ताँबे की खानों से धातु और वनों से पर्याप्त ईधन सुलभ था, जिसने कबीलों के लोगों को धातुकर्म में संलिप्त कर दिया।

 कालान्तर में धातु शिल्प में पारंगत कुछ लोग कबीलों से स्वतंत्र होकर यायावरीय जीवन अपना लिये। इन्हीं यायावरीय पेशेवर धातु शिल्पियों ने दोआब में भी ताम्र निधियों का प्रसार किया।

लाल महोदय के उक्त मत से स्वराज प्रकाश गुप्ता भी सहमति व्यक्त करते हैं किन्तु गुप्त महोदय का संशोधन यह है कि बिहार को ताम्र निधियों के उपकरणों की तकनीक और बनावट साधारण कोटि की है। अत: इन्हें दोआब को ताम्र निधियों से पहले का माना जाना चाहिए।

इस प्रकार ताम्रनिधियों का निर्माण बिहार के पठारी भाग में हुआ होगा जहाँ ताम्र अयस्क और इंधन सहज सुलभ था, जो धातुकर्म के लिए उपयुक्त वातावरण प्रस्तुत करता था।

(4) ताम्र निधियों के सूत्रधार उत्तरकालीन हड़प्पा के लोग थे-

इसका प्रतिपादन कृष्णदेव, यज्ञदत्त शर्मा और प्रो० विद्याधर मिश्र आदि विद्वानों ने किया है। इन विद्वानों ने अपने मत के समर्थन में परवर्ती हड़प्पा संस्कृति के कतिपय साक्ष्यों की और विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया है। विद्वानों के अनुसार-

(1) गैरिक मूद्भाण्ड परम्परा और परवर्ती हड़प्पा मृदभाण्ड परम्परा के पात्र प्रकारों में समानता देखी जा सकती है।

(2) अंबा खेड़ी में प्रौढ़ हड़प्पा संस्कृति के पात्र-प्रकारों का अभाव है किन्तु उत्खनन से प्राप्त साधार तश्तरियों की तुलना आलमगीरपुर के परवर्ती हड़प्पा संस्कृति के पात्रों से की जा सकती है।

इसी प्रकार आँबखेड़ी के ककुदमान बैल, खिलौना गाड़ी के पहिये, और टेराकोटा की समानता भी उत्तरकालीन हड़प्पा संस्कृति के पुरावशेषों से की जा सकती है।

(3) गैरिक मृत्भाण्ड चाक निर्मित है, अत: उनका जीवन स्थायी रहा होगा, जबकि ताम्रनिधियों के लोग यायावरीय जीवन बिताते थे ऐसी स्थिति में यदि ताम्रनिधियों के निर्माताओं को दोआव का मूल निवासी माना जाय, तो गैरिक मृद्भाण्ड का चाक निर्मित होना, सिद्ध नहीं हो पाता है।

विद्वानों का मत है कि जिन लोगों ने बर्तन बनाने की शुरूआत की, वे प्रारम्भ में ही चाक का प्रयोग कैसे करने लगे?

(4) ताम्रनिधियों के अधिकांश उपकरण (मानवाकृति और छल्लों के अलावा) साँचे में ढाले गये हैं। उपकरणों को ढालने के लिए एकल अथवा दोहरे साँचे (बन्द साँचे) का प्रयोग किया गया है ऐसी स्थिति में इनके धातुकर्म की विकसित तकनीक का ज्ञान होता है। उल्लेखनीय है कि लोथल भी हड़प्पा स्तर से मानवाकृति का खण्डित पुरावशेष प्राप्त हुआ है।

निष्कर्ष:-

उपरोक्त मतों से पुरातत्त्वविदों ने निष्कर्ष निकाला है कि संस्कृति के निर्माताओं और परवर्ती हड़प्पा संस्कृति के लोगों में सम्बन्ध माना जा सकता है। यद्यपि ताम्रनिधि पुरास्थलों से सैन्धव सभ्यता के नगरीय अवशेष नहीं मिले हैं, किन्तु यह भी सच है कि सैन्धव सभ्यता का आदि से अंत तक स्वरूप नगरीय नहीं था।

पुरातत्विदों की मान्यता है कि दूसरी सहस्राब्दी ई० पू० के आस पास सिन्धु सभ्यता का नगरीय स्वरूप परिवर्तित होने लगा था। इसका परवर्तो स्वरूप ग्राम्य संस्कृति के अधिक नजदीक दिखाई पड़ता है। अत: हड़प्पा के उत्तरकालीन लोगों को ताम्रनिधियों के सूत्रधार का श्रेय दिया जा सकता है।

उपरोक्त मतों के आलोक में कहा जा सकता है कि ताम्रनिधियों के कतिपय पुरावशेषों को समता के आधार पर उनके निर्माताओं का निर्धारण करना तर्कसंगत नहीं है।

पुरातत्त्वविदों ने सम्भावना व्यक्त की है कि गैरिक मृदभांड पात्र परम्परा के लोगों और ताम्रनिधियों के लोगों द्वारा अलग-अलग संस्कृतियों का विकास किया गया और कालान्तर में संभवत: इनके सांस्कृतिक सम्पर्क आपस में हुए।

पिछली पोस्ट्स : इन्हें भी देखें

  1. ताम्रपाषाणिक संस्कृति | 5 Chalcolithic cultures
  2. प्राचीन भारत के ऐतिहासिक पुरास्थल

धन्यवाद🙏
कृष्णा प्रजापति
(आकाश)

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