Vedic literature | वैदिक साहित्य (भाग-2) | vaidik sahitya in hindi | ब्राह्मण ग्रंथ | आरण्यक ग्रंथ |उपनिषद | वेदांग | छ: दर्शन | उपवेद | स्मृतियाँ | महाकाव्य | पुराण आदि

यह वैदिक साहित्य (Vedic literature) का दूसरा भाग है। इसके पहले के भाग (वैदिक साहित्य भाग-1) में वैदिक साहित्य के प्रमुख ग्रंथ वेदों के बारे में विस्तारपूर्वक समझाया गया है जो कि वैदिक साहित्य का प्रत्येक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पक्ष है। आप इस पोस्ट के पढ़ने के बाद उस पोस्ट को अवश्य पढ़ें जिसका लिंक(URL) नीचे दिया गया है। 

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वैदिक साहित्य : Vedic literature

वैदिक साहित्य | Vedic literature
वैदिक साहित्य (Vedic literature)

अब आते हैं वैदिक साहित्य के दृश्य पर― 

 ब्राम्हण ग्रन्थ (Brahmin text) : Vedic literature

ब्राह्मण ग्रन्थों का तात्पर्य ऐसे वैदिक साहित्य से है, जिनमें वैदिक मन्त्रों की व्याख्या की गयी है और यज्ञों के विधि विधान का वर्णन किया गया है। ब्रह्म’ शब्द के अनेक अर्थ माने गये हैं किन्तु ब्राह्मण साहित्य के सन्दर्भ में ‘ब्रह्म’ का अर्थ यज्ञ और मन्त्र के लिए प्रयुक्त किया गया है।

अतः ब्राह्मण साहित्य यज्ञ प्रधान साहित्य है, जिसमें यज्ञीय कर्मकाण्डों का विशद विवरण प्राप्त होता है। इन ग्रन्थों में यज्ञ विधानों के अलावा मन्त्रों के अभिप्राय और विनियोग (प्रयोजन) को विविध आख्यानों और कथाओं से पुष्ट किया गया है। ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना का उद्देश्य मन्त्रों के प्रयोजन और कर्मकाण्डों को स्पष्ट करना था, इसलिए प्रत्येक वेद की अलग-अलग शाखाओं के भिन्न-भिन्न ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना की गयी थी।

ब्राह्मण ग्रन्थ अधिकांशत: गद्यात्मक हैं । वस्तुतः संस्कृत गद्य शैली का प्रारंभ ही ब्राह्मण साहित्य से माना जाता है। वेदों का प्रधान विषय स्तुतियाँ हैं, किन्तु यत्र-तत्र मानव जीवन के सामाजिक आदर्शों का निरूपण भी किया गया है। इसके विपरीत ब्राह्मण साहित्य का मूल विषय यज्ञ विधान’ है । इसमें यज्ञों के प्रकार, यज्ञों के करने का समय, विधि, यज्ञ के अधिकारी व्यक्तियों और यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों आदि का वर्णन किया गया है।

इसके अलावा ब्राह्मण साहित्य में यह भी वर्णित है कि यज्ञ के अवसर पर किस मन्त्र का विनियोग कहाँ किया जाय और उसका प्रयोजन क्या है? इसमें यज्ञों की युक्तियुक्तता को आख्यानों और गाथाओं के माध्यम से स्पष्ट किया गया है। ब्राह्मणों में ऐतिहासिक विषयवस्तु का भी प्रसंगवशात् समावेश किया गया है। ब्राह्मणों को अपौरुषेय या अनादि नहीं माना गया है।

प्रत्येक वेद के अलग-अलग ब्राह्मण साहित्य हैं जो निम्न है―

 1. ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ-

विद्वानों की मान्यता है कि वेदों की प्रत्येक शाखाओं के अलग अलग ब्राह्मण थे जिसके आधार पर ब्राह्मणों की संख्या 1139 होनी चाहिए। किन्तु सम्प्रति 18 ब्राह्मण ग्रन्थ ही उपलब्ध हैं।

ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रन्थ प्राप्त हैं। ऋग्वेद के शाकल शाखा का ऐतरेय ब्राह्मण और वाष्कल शाखा का कौषीतकि (शांखायन) ब्राह्मण ही प्राप्त हुआ है।

(i) ऐतरेय ब्राम्हण-

ऐतरेय ब्राह्मण आठ पंचक में विभाजित है, प्रत्येक पंचक में पाँच-पाँच अध्याय हैं। अध्यायों को कण्डिकाओं में विभक्त किया गया है, इस प्रकार ऐतरेय ब्राह्मण में चालीस अध्याय और दो सौ पचासी कण्डिकाएँ हैं। ऐतरेय ब्राह्मण की रचना महिदास ने की थी, जो राजा के एक दासी का पुत्र था। महिदास के माता का नाम ‘इतरा’ था इसलिए महिदास को ‘ऐतरेय’ कहा गया था और इसी नाम के आधार पर ब्राह्मण का नाम भी ऐतरेय’ पड़ा। ऐतरेय ब्राह्मण के अन्तिम अध्यायों में ऐतिहासिक सामग्री का समावेश मिलता है। इसमें तत्कालीन भारत की भौगोलिक दशा, राजवंशों एवं राजाओं के विवरण, विविध राज्यों की शासन पद्धति आदि का वर्णन किया गया है।

(ii) कौषीतकि-

ऋग्वेद के वाष्कल शाखा का ब्राह्मण कौषीतकि (शांखायन) है, जिसमें तीस अध्याय हैं। अध्यायों को खण्डों में विभाजित किया गया है। इस ब्राह्मण में 226 खण्ड हैं। इस ब्राह्मण से तत्कालीन धार्मिक स्थिति का ज्ञान होता है।

2. यजुर्वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ-

यजुर्वेद की दोनों प्रमुख शाखाओं शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद के अलग-अलग ब्राह्मण साहित्य मिलते हैं।

(i) शुक्ल यजुर्वेद का ब्राम्हण ग्रंथ-

शुक्ल यजुर्वेद का एक मात्र ब्राह्मण ‘ शतपथ’ है, जो इसकी दोनों शाखाओं काण्व और माध्यन्दिनीय से सम्बन्धित है, किन्तु दोनों शाखाओं के ‘शतपथ’ में कुछ अन्तर है। माध्यन्दिनीय शाखा के शतपथ ब्राह्मण में 14 काण्ड, 100 अध्याय, 438 ब्राह्मण और 7624 कण्डिकाएँ हैं, जबकि कांच शाखा के शतपथ ब्राह्मण में 17 काण्ड, 104 अध्याय 435 ब्राह्मण और 6806 कण्डिका संग्रहीत हैं। यद्यपि इन दोनों शाखाओं के विषयवस्तु प्राय: समान हैं, किन्तु विभाग के क्रम में अन्तर अधिक स्पष्ट हैं ।

वेदों के विभिन्न ब्राह्मणों में शतपथ का विशेष महत्त्व है। यह ब्राह्मण अन्य ब्राह्मणों को अपेक्षा विस्तृत है। इसमें ऐतिहासिक सामग्री का भी समावेश अधिक किया गया है। इसी ब्राह्मण में आर्यों के प्रसार से सम्बन्धित माधव विदेध का आख्यान मिलता है। पुराणों और महाभारत के अनेक ऐतिहासिक आख्यानों का सम्बन्ध शतपथ ब्राह्मण से माना गया है।

(ii) कृष्ण यजुर्वेद का ब्राम्हण ग्रंथ-

यजुर्वेद के कृष्ण यजुर्वेद शाखा का ब्राह्मण तैत्तिरीय’ है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में तीन काण्ड हैं, जिनमें प्रथम एवं द्वितीय काण्ड में आठ-आठ अध्याय और तृतीय काण्ड में बारह अध्याय हैं। अध्यायों को अनुवाकों में विभाजित किया गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में 308 अनुवाक् हैं। इस ब्राह्मण में राजसूय, वाजपेय आदि यज्ञों का विस्तृत विवरण मिलता है। इसके अलावा कृष्ण यजुर्वेद के एक अन्य ब्राह्मण के कुछ अंश प्राप्त हुए है, जो काण्व शाखा से सम्बन्धित हैं।

(3) सामवेद के ब्राह्मण ग्रन्थ-

सामवेद के तीन ब्राह्मण पंचविश (ताण्ड्य) ब्राह्मण, षडविंश ब्राह्मण और जैमिनीय ब्राह्मण मिलते हैं।

(i) पंचविश ब्राम्हण-

इसमें पंचविश ब्राह्मण बहुत बड़ा है। इसमें 25 अध्याय हैं। इस ब्राह्मण में भी यज्ञीय अनुष्ठानों का विशद विवरण मिलता है। इसमें वर्णित ‘व्रात्य यज्ञ’ के विधान से आर्येतर लोगों को समाज में सम्मिलित करने का उल्लेख ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

(ii) षडविश ब्राम्हण-

षडविश ब्राह्मण यद्यपि पंचविश ब्राह्मण का ही भाग माना जाता है, किन्तु इसे अलग ब्राह्मण की मान्यता दी गयी है। इसमें प्राकृतिक प्रकोपों भूकम्प, अकाल आदि के निवारण का विधान दिया गया है, इसलिए इसे अद्भुत ब्राह्मण के नाम से भी जाना जाता है। इस ब्राह्मण में अभिचारिक क्रियाओं को भी धार्मिक मान्यता प्रदान की गयी है।

(iii) जैमिनीय ब्राम्हण-

सामवेद के जैमिनीय ब्राह्मण में यज्ञीय विधियों के अभिप्राय और प्रयोजन को विभिन्न आख्यानों से पुष्ट किया गया हैं। इस प्रकार के आख्यान ऐतिहासिक महत्त्व के हैं। सामवेद के उपरोक्त तीन प्रमुख ब्राह्मणों के अलावा अन्य ब्राह्मणों ‘वंश ब्राह्मण’ ‘समविधान’ ‘आर्षेय देवता अध्याय ‘ और ‘संहितोपनिषद’ आदि भी मिले हैं, जिसमें ऋषियों के वंश वृक्ष का विवरण मिलता है। सामविधान ब्राह्मण में व्रतों और अभिचारिक क्रियाओं का वर्णन है। इसका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय वेद मन्त्रों को तान्त्रिक क्रियाओं में कैसे प्रयुक्त किया जाय? बताया गया है।

(4)अथर्ववेद के ब्राह्मण ग्रन्थ-

अथर्ववेद का ब्राह्मण गोपथ है। इसे पूर्व गोपथ और उत्तर गोपथ में विभाजित किया गया है। पूर्व गोपथ में पाँच अध्याय और उत्तर गोपथ में छ: अध्याय है। अध्यायों का विभाजन कोशिका में किया गया है।

(i)गोपथ ब्राम्हण-

गोपथ ब्राह्मण में कुल 258 कण्डिकायें हैं। इस ब्राह्मण में यज्ञ विधियों का वर्णन हैं जिसे आख्यानों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसमें ब्रह्मचर्य के विधि-निषेध और शिक्षा आदि के विषय में भी बताया गया है। इस चाह्मण की रचना गोपथ’ नामक ऋषि द्वारा की गयी थी। विद्वानों ने इसका रचना काल सातवी-आठवीं शताब्दी ई० पू० के आस-पास माना है।

आरण्यक ग्रंथ(Aranyak texts):-

आरण्यक साहित्य का तात्पर्य ऐसे साहित्य से है, जिसका पठन पाठन अरण्य (जंगल) में होता था। वस्तुतः आरण्यक साहित्य ब्राह्मण ग्रन्थों के ही अन्तिम भाग हैं, किन्तु इनका वर्ण्य विषय ब्राह्मणों से बिल्कुल भिन्न है। ब्राह्मण साहित्य में जहाँ यज्ञीय कर्मकाण्डों का विशद वर्णन है वहीं आरण्यकों में यज्ञीय रहस्यों के आध्यात्मिक एवं दार्शनिक तत्वों का निरूपण किया गया है.

प्राचीन ऋषियों ने मानव के आदर्श जीवन को चार भागों में विभाजित किया था- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम। मानव जीवन के इन आश्रमों में ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम का सम्बन्ध शिक्षा ग्रहण करने और यज्ञीय अनुष्ठानों को सम्पन्न करने से था गृहस्थ आश्रम में जिन यज्ञ का अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता था, उनके रहस्य को समझने के लिए वानप्रस्थ आश्रम का विधान किया गया था। मानव को निर्देश था कि पुत्र हो जाने के बाद वह वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करे और नगर या गाँवों से दूर जंगल में एकान्त वास करता हुआ आध्यात्मिक चिन्तन करे। प्राचीन भारतीय परम्परा में दार्शनिक विचारधारा का प्रारंभ आरण्यकों से ही माना जाता है, जिसका पूर्ण विकास उपनिषदों में देखने को मिलता है। उपनिषद् भी आरण्यकों के परिशिष्ट के समान हैं।

ध्यातव्य है कि प्रत्येक वेद की शाखाओं के अलग-अलग ब्राह्मण, आरण्यक और सूत्र साहित्य माने गये हैं इस आधार पर आरण्यकों की संख्या भी सहस्त्र से अधिक होनी चाहिए, किन्तु सम्प्रति प्राप्त आरण्यकों की एक मात्र संख्या आठ है। वर्तमान में उपलब्ध आरण्यकों में ऐतरेय आरण्यक, शांखायन आरण्यक, तैत्तिरीय आरण्यक. बृहदारण्यक, जैमिनीयोपनिषदारण्यक और छान्दोग्य आरण्यक प्रमुख हैं। ऐतरेय और शांखायन आरण्यकों का सम्बन्ध ऋग्वेद से है।

ऐतरेय आरण्यक में पाँच भाग हैं, जिन्हें आरण्यक के नाम से जाना जाता है। इसके प्रत्येक भाग में एक से सात अध्याय हैं। ऐतरेय ब्राह्मण का ही एक भाग ऐतरेय उपनिषद है । ऋग्वेद का दूसरा आरण्यक शांखायन है, जिसका परिशिष्ट भाग कौषीतकि उपनिषद माना जाता है। शुक्ल यजुर्वेद का आरण्यक वृहदारण्यक है, जो शतपथ ब्राह्मण का परिशिष्ट भाग हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् इसी आरण्यक का अन्तिम भाग है। माना जाता है। कृष्ण यजुर्वेद का आरण्यक तैत्तिरीय है।

तैत्तिरीय आरण्यक में दस प्रपाठक या अनुच्छेद हैं, जिन्हें अनुवाकों में विभाजित किया गया है तैत्तिरीय उपनिषद का सम्बन्ध इसी आरण्यक से है। तैत्तिरीय आरण्यक का दसवां प्रपाठक नारायणोपनिषद् के नाम से जाना जाता है, जबकि तैत्तिरीय उपनिषद् सातवें, आठवें और नवें प्रपाठकों से सम्बन्धित है। सामवेद का आरण्यक ‘तवलकार’ (जैमिनीयोपनिषदारण्यक) एवं छान्दोग्य है। केन उपनिषद् का सम्बन्ध बलकार आरण्यक से है।वैदिक संहिताओं में ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के आरण्यक साहित्य सम्प्रति उपलब्ध हैं, किन्तु अथर्ववेद का कोई आरण्यक अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।

उपनिषद(Upnishadas):-

वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण साहित्यों में मूलत: आर्यों के यज्ञीय विधानों और कर्मकाण्डों का ही निरूपण किया गया है, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक ऋषि एक मात्र यज्ञ विधान और कर्मकाण्ड के ही ज्ञान नहीं थे, अपितु आध्यात्मिक, दार्शनिक और पारलौकिक विषयों पर भी चिन्तन किया करते थे उनके आध्यात्मिक, दार्शनिक चिन्तनों की अमिट छाप आरण्यकों पर दिखायी देती है। जिसका विकसित स्वरूप उपनिषदों में परिलक्षित होता है।

उपनिषदों में यज्ञीय कर्मकाण्डों को निरर्थक बताते हुए आत्मा, सृष्टि ब्रह्म, प्रकृति आदि विषयों पर गहन विचार किया गया है, यद्यपि वैदिक सूक्तों में इन विषयों को संकेतित किया गया है तथापि उपनिषद् आध्यात्मिक, दार्शनिक विचार धारा का विशद वर्णन करता है।

उपनिषदों के दो स्वरूप मिलते हैं। जिनमें कतिपय उपनिषद् आरण्यक ग्रन्थों के परिशिष्ट रूप में विद्यमान हैं, जैसे ऐतरेय उपनिषद, कौषीतकि उपनिषद् तैत्तिरीय उपनिषद्, बृहदारण्यक उपनिषद आदि। इसके अतिरिक्त कुछ उपनिषद् स्वतन्त्र रूप से लिखे गये थे, जिनका किसी ब्राह्मण या आरण्यक से कोई सम्बन्ध नहीं है।

ऋषियों ने उपनिषदों की रचना जंगलों के शान्तमय एकान्त स्थानों पर की थी, जहाँ वे लौकिक संसार की समस्याओं से निवृत्त होकर गहन चिन्तन में संलग्न रहते थे।

उपनिषदों की संख्या कितनी है? यह प्रश्न विवादास्पद है। कतिपय विद्वान् उपनिषदों की संख्या दो सौ से अधिक मानते हैं, किन्तु उनमें कुछ की प्रामाणिकता संदेहास्पद है। मुक्तिकोपनिषद में एक सौ आठ(108) उपनिषद बताये गये हैं, जिनमें ऋग्वेद के दस उपनिषद्, शुक्ल यजुर्वेद के उन्नीस, कृष्ण यजुर्वेद के बारह, सामवेद के सोलह और अथर्ववेद के इकतीस उपनिषद् प्रमुख थे।

वर्तमान समय में जो उपनिषद् उपलब्ध है और जिन्हें प्रामाणिक एवं महत्त्वपूर्ण माना गया है उनकी संख्या बारह है―

(1) ईशावास्योपनिषद् (2) केनोपनिषद् (3) कठोपनिषद् (4) प्रश्नोपनिषद् (5) मुण्डकोपनिषद् (6) माण्डूक्य उपनिषद् (7) तैत्तिरीय उपनिषद् (8) ऐतरेय उपनिषद् (9) छान्दोग्य उपनिषद् (10) बृहदारण्यकोपनिषद (11) कौषीतकि उपनिषद (12) श्वेताश्वतर उपनिषद् ।

उपरोक्त उपनिषदों में से कौषीतकि और श्वेताश्वतर को छोड़कर शेष दस उपनिषदों पर शंकराचार्य ने भी भाष्य लिखा है। यद्यपि शंकराचार्य का भाष्य कौषीतकि और श्वेताश्वतर पर नहीं मिलता है, किन्तु इन उपनिषदों के उद्धरणों को ब्रह्मसूत्र के भाष्य में प्रयुक्त किया गया है। इसी प्रकार स्वामी दयानन्द ने भी दस उपनिषदों को ही अधिक प्रामाणिक माना है। इन्हीं उपनिषदों को प्राचीनतम माना जाता है, जबकि अन्य उपनिषद् बाद के काल के माने गये हैं, की दृष्टि से इन उपनिषदों का महत्त्व भी कम नहीं माना गया है।

परन्तु विषयवस्तु उपनिषदों की रचना गद्य और पद्य दोनों शैलियों में की गयी है । कुछ उपनिषद् मूलतः गद्यात्मक हैं जैसे प्रश्न, माण्डूक्य, केन ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, कौषीतकि और वृहदारण्यक उपनिषद्। इसके अतिरिक्त ईश, कठ, और श्वेताश्वतर उपनिषद् पद्यात्मक शैली में हैं, जैसा कि माना जाता है कि अनेक उपनिषद् वैदिक संहिताओं, ब्राह्मणों और आरण्यकों से सम्बद्ध हैं ईशोपनिषद् का सम्बन्ध यजुर्वेद से है।

यजुर्वेद का अन्तिम अध्याय ही ईशोपनिषद् के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार बृहदारण्यक उपनिषद वृहदारण्यक आरण्यक का ही परिशिष्ट है। छान्दोग्य उपनिषद का सम्बन्ध सामवेद के संहितोपनिषद् ब्राह्मण से है। तैत्तिरीय उपनिषद् तैत्तिरीय आरण्यक का और ऐतरेय उपनिषद् ऐतरेय आरण्यक का ही भाग है मुण्डक, माण्डूक्य और प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेद से सम्बन्धित हैं। ध्यातव्य है कि अथर्ववेद का कोई आरण्यक अद्यावधि प्राप्त नहीं हो सका है।

उपनिषदों की विषयवस्तु लौकिक जीवन से सम्बन्धित नहीं है, अपितु पारलौकिक जीवन पर आधारित है। उपनिषद् वैदिक परम्परा के कर्मकाण्ड का विरोध करते हैं और उन्हें मुक्ति का साधन नहीं मानते हैं। प्राचीन मनीषियों ने मुक्ति का द्वार आध्यात्मिक चिन्तन और तात्त्विक ज्ञान में खोजने का प्रयास किया, जिसका विस्तृत वर्णन उपनिषदों में मिलता है। ईशोपनिषद् में ईश्वर के स्वरूप और निष्काम कर्म पर विचार किया गया है।

इसी प्रकार कठोपनिषद् में नचिकेता और यम के आख्यान के माध्यम से ब्रह्मविद्या का उपदेश किया गया है। प्रश्नोपनिषद में पिप्पलाद द्वारा छ: ऋषियों (मुकेश., सत्यकाम नारायणी, आश्वलायन, गांव और कबन्धी) के प्रश्नों का उत्तर देते हुए ब्रह्म ज्ञान का निरूपण किया गया है। मुण्डकोपनिषद् में वैदिक यज्ञीय कर्मकाण्ड की निन्दा को गया है और ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए ब्रह्मज्ञानी गुरू को आवश्यकता पर बल दिया गया है। माण्डूक्य उपनिषद् में ब्रह्म के साकार और निराकार स्वरूप को समझाया गया है।

इसी प्रकार ऐतरेय उपनिषद सृष्टि की उत्पत्ति में आत्मा की भूमिका का वर्णन करता है। केनोपनिषद् में ब्रह्म ज्ञान का निरूपण किया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् में ब्रह्म के स्वरूप और गुरू- शिष्य के आदर्शात्मक सम्बन्धों पर विचार किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद् अद्वैतवाद के सिद्धान्त (सर्वं खल्विदं ब्रह्म) का प्रतिपादन करता है।

वृहदारण्यक उपनिषद् में महर्षियाज्ञवल्क्य द्वारा ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार उपनिषदों से वैदिक युगीन धर्म में अध्यात्म और दर्शन के विकास का ज्ञान होता है, जिसने वैदिक कर्मकाण्ड को कुंठित कर दिया। कालान्तर में उदय होने वाले धार्मिक सम्प्रदायों पर उपनिषदों की विचारधारा का प्रभाव परिलक्षित होता है।

वेदांग(Vedanga)-

वैदिक साहित्य के अन्तर्गत यद्यपि वेदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों और उपनिषदों की ही गणना की जाती है, तथापि वेदांग और उपवेद भी वैदिक साहित्य के अंगभूत साहित्य माने जाते हैं, जिनके अध्ययन के अभाव में वैदिक वाङ्मय का ज्ञान अपरिपक्व रह जाता है। पाणिनीय शिक्षा में वेदांगों को एक के माध्यम से वेदों का अंग स्वीकार किया गया है। उसमें कहा गया है कि छन्द वेद के पर हैं, कल्प हाथ हैं, ज्योतिष आँखें हैं, निरुक्त कान हैं, शिक्षा नासिका है और व्याकरण मुख है।

अत: वेदांगों के साथ ही वेदों का अनुशीलन करने पर ब्रह्मलोक की प्राप्ति संभव है। उपनिषदों और महाभाष्य में भी वेदांगों का उल्लेख किया गया है इस प्रकार वैदिक साहित्य के सम्यक् ज्ञान के लिए वेदांगों का अनुशीलन अतीव महत्त्व रखता है वेदांगों की संख्या छः है: (1) शिक्षा (2) कल्प (3) व्याकरण (4) निरुक्त (5) छन्द (6) ज्योतिष।

(i) शिक्षा-

‘शिक्षा’ का तात्पर्य उस साहित्य से है, जिसमें वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिए वर्णों और शब्दों के सही उच्चारण की विधियाँ प्रतिपादित की गयी हैं। आर्य लोग वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे, क्योंकि स्वर भेद से एक ही शब्द के अर्थ भिन्न-भित्र हो जाते हैं। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य वैदिक पठन पाठन को स्वर, वर्ण, उच्चारण आदि दोषों से गणित बनाना था। निश्चित से ज्ञात होता है कि शिक्षा नामक साहित्य का प्रारंभ बाभ्रव्य नामक ऋषि ने किया था। प्राचीन काल की प्रमुख शिक्षाओं में पाणिनीय शिक्षा, याज्ञवल्क्य शिक्षा, वासिष्ठी शिक्षा, भारद्वाज शिक्षा, नारदीय शिक्षा, माण्डूकी शिक्षा, पाराशरी शिक्षा और माध्यन्दिनी शिक्षा आदि का उल्लेख किया जाता है।

(ii) कल्प-

कल्प वेदांगों के रचना वैदिक यज्ञ के कर्मकाण्डों और मानव जीवन के विविध संस्कारों आदि का निरूपण करने के लिए किया गया था। कल्प साहित्य को सूत्र साहित्य के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इनकी रचना सूत्र शैली में की गयी है।

कल्प सूत्रों की संख्या तीन है-(1) श्रौत सूत्र (2) गृह्यसूत्र (3) धर्म-सूत्र ।

कतिपय विद्वान् शुल्व सूत्र को अलग वेदांग के अन्तर्गत परिगणित करते हैं, किन्तु वस्तु: शुल्व सूत्र श्रौत सूत्र का ही अन्तिम भाग है, जिसमें विविध यज्ञों में प्रयुक्त की जाने वाली नदियों के निर्माण की प्रक्रिया और माप आदि का वर्णन किया गया है। विद्वानों ने शुल्व सूत्र से ही भारत में रेखा गणित का उद्भव माना है। कल्पसूत्रों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है:

श्रौत सूत्र-

प्रीत सूत्रों में यज्ञों विधि-विधानों का वर्णन किया गया है। यद्यपि ब्राह्मण ग्रन्थों का भी वर्ण्य विषय यज्ञ विधान ही हैं, किन्तु उनमें विस्तार अधिक है, जबकि श्रौत सूत्रों में सूत्र रूप में विधानों का उल्लेख किया गया है। श्रौत सूत्रों में यज्ञ कुण्ड में विभिन्न प्रकार की अग्नियों (दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय) के आधान, प्रमुख यज्ञों जैसे-राजसूय, वाजपेय, अश्वमेघ, नरमेघ, सोमयाग, दर्शपौर्णमास यज्ञ, चातुर्मास्य यज, अग्निहोत्र बलिवैश्यदेव, अतिथि यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ आदि का वर्णन विशद रूप से किया गया है ।

यनगान में प्राप्त प्रौत सूत्रों में आश्वालयन और शांखायन का सम्बन्ध ऋग्वेद णन मंत्र व मन्यन्ध शुकत यजूर्त से, बौधायन, आपस्तम्ब, सत्याषाढ़ वैखानस, भारद्वाज और मानव त्रिक सूत्रों का सम्बन्ध कृष्ण यजुर्वेद से आर्षेय, लाट्यायन, द्राह्यायण और जैमिनीय श्रौतसूत्र का सम्बन्ध सामवेद से तथा वैतान श्रौत सूत्र का सम्बन्ध अथर्ववेद से माना गया है।

गृह्यसूत्र-

प्राचीन भारतीय परम्परा में मानव जीवन को आदर्श के उच्चतम शिखर पर पहुँचाने के उद्देश्य से आश्रमों की परिकल्पना की गयी थी विभिन्न आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) में गृहस्थ आश्रम पर ही सभी आश्रमों को आश्रित बताया गया था अत: गृहस्थ आश्रम के मर्यादा को बनाये रखने के लिए विभिन्न कर्तव्यों और धर्मों का प्रतिपादन किया गया। मानव जीवन में उच्च आदर्शों की प्राप्ति के लिए विभिन्न संस्कारों की व्यवस्था की गयी थी जिसके माध्यम से मनुष्य संस्कारित होकर विकास के पथ पर अग्रसर होता था।

गृह्यसूत्रों में मानव के न कर्तव्यों, धर्मों और संस्कारों का वर्णन किया गया है, जो उसके आदर्श जीवन के लिए आवश्यक थे। विभिन्न वैदिक संहिताओं के अपने अलग-अलग गृह्यसूत्र भी हैं। ऋग्वेद के तीन गृह्यसूत्र आश्वालायन, शांखायन और कौषीतकि मिलते हैं। शुक्ल यजुर्वेद का एक मात्र गृह्यसूत्र ‘पार कर गृह्यसूत्र’ प्राप्त हुआ है। कृष्ण यजुर्वेद से सम्बन्धित गृह्यसूत्र बौधायन, भारद्वाज, आपस्तम्ब, हिरण्यकेशि, वैखानस, मानव, अग्निवेश्य और काठक प्राप्त हुए हैं। सामवेद से सम्बद्ध गृहामुत्र गोभिल, खदिर और जैमिनीय हैं। इसी प्रकार अथर्ववेद का एक मात्र कौशिक गृह्यसूत्र प्राप्त होता है।

धर्म सूत्र-

धर्म सूत्रों में मानव के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। धर्म सूत्र निर्दिष्ट करते हैं कि मानव को वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्म का निर्वाह करना चाहिए। इसमें राजा और प्रजा के कर्तव्य, दण्ड-विधान, न्याय, कर व्यवस्था, मानव के आचार विचार, विवाह, उत्तराधिकार आदि विषय पर विधि निषेधों का प्रतिपादन किया गया है । सम्प्रति प्राप्त प्रमुख धर्म सूत्रों में गौतम धर्म-सूत्र, बौधायन धर्मसूत्र, आपस्तम्ब धर्म सूत्र, हिरण्यकेशि धर्म सूत्र, वशिष्ठ धर्म सूत्र, वैखानस धर्मसूत्र और विष्णु धर्म सूत्रों को गणना को जाती है। धर्म सूत्रों से प्राचीन भारत के धार्मिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है।

(iii) व्याकरण:-

वेदांगों के अन्तर्गत व्याकरण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। पतञ्जलि ने व्याकरण के अध्ययन के पाँच प्रयोजन निर्दिष्ट किये हैं : रक्षा, ऊहा, आगम, लघ्वर्थ और असन्देह ।
रक्षा का तात्पर्य वेदों में आये लोप, आगम और वर्ण विकार के ज्ञान से वेदों की रक्षा करना है।
उहा से तात्पर्य वेदमन्त्री में आवश्यकतानुसार लिंग और विभक्ति में परिवर्तन से है, क्योंकि मन्त्र के विनियोग के आधार पर लिंगों और विभक्तियों में परिवर्तन आवश्यक है।


आगम (श्रुति) के ज्ञान के लिए व्याकरण का अध्ययन महत्त्वपूर्ण माना जाता है, ब्राह्मण को बिना कारण भी घडङ्ग वेदों का अध्ययन करना निर्दिष्ट किया गया है क्योंकि व्याकरण सभी वेदांगों में प्रधान है।
लघ्वर्थ’ का तात्पर्य शब्द ज्ञान के लिए लघु उपाय’ व्याकरण का अध्ययन बताया गया है, क्योंकि शब्दकोश असीमित है, अतः शब्दों का उचित ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है।
असन्देह’ से तात्पर्य सन्देह के निवारण से है। अधिकांशतः वैदिक शब्दों के अभिप्राय संदेहास्पद हो जाते हैं। अत: संदेह दूर करने के लिए व्याकरण का ज्ञान अति आवश्यक है ।

वर्तमान में व्याकरण का प्राचीनतम ग्रन्थ पाणिनि का अष्टाध्यायी मिलता है। इसे आठ अध्यायों में विभाजित किया गया है अष्टाध्यायी में सूत्रों की संख्या 3863 है। पाणिनि के अष्टाध्यायी में यद्यपि लौकिक संस्कृत के व्याकरण का समावेश है, किन्तु यत्र-तत्र वैदिक व्याकरण के नियमों को भी दर्शाया गया है। पाणिनि ने अपने ग्रन्थ में दस पूर्व आचार्यों आपिशल, काश्यप, गाय, गालव, भारद्वाज, शाकटायन, शाकल्य आदि का उल्लेख किया है, किन्तु दुर्भाग्य से इन पूर्वाचार्यों की रचनाएँ अप्रापत है पाणिनि का समय पाँचवों छठी शताब्दी ई० पू० निर्धारित किया जाता है।

पाणिनि के बाद व्याकरण के आचार्य कात्यायन हुए, जिन्होंने वार्तिकों की रचना की। ऐसा प्रतीत होता है कि पाणिनि के व्याकरण में कुछ कमियाँ थी जिन्हें वार्तिकों से पूरा किया गया। कालान्तर में द्वितीय शताब्दी ई० पू० में पतञ्जलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी और कात्यायन के वार्तिकों पर टीका लिखी, जिसे महाभाष्य के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार प्राचीन व्याकरण में पाणिनि, कात्यायन और पतंजलि का नाम उल्लेखनीय है। कालान्तर में, इन्हीं विद्वानों के ग्रन्थों पर अनेक टीकाएँ लिखी गयी, जिनमें वामन और जयादित्य की काशिकावृत्ति प्रमुख है।’ हरदत्त ने काशिका वृत्ति पर पदमञ्जरी नामक टीका की रचना की।

(iv) निरुक्त:-

निरुक्त ऐसे साहित्य को कहा जाता है, जिसमें वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति बतायी गयी है। निरुक्त के अनुसार प्रत्येक शब्द ‘धातु’ होता है अर्थात् शब्द की व्युत्पत्ति धातुओं से होती है। शब्द और अर्थ में सम्बन्ध सहेतुक होता है, अकारण नहीं होता है। शब्द और अर्थ के इसी सम्बन्ध पर निरुक्त प्रकाश डालता है। वस्तुतः निरुक्त निघण्टु को व्याख्या करता है। निघण्ट में वेदों के कठिन शब्दों को संकलित किया गया है विद्वानों की मान्यता है कि निरुक्तकार यास्क ने सर्वप्रथम वेदों के कठिन शब्दों का संग्रह निघण्ट के रूप में किया और बाद में निरुक्त के रूप में उसको व्याख्या को ।

कतिपय अन्य विद्वान् निघण्टु को निरुक्त का पूर्ववर्ती मानते हैं महाभारत में निघण्टु को रचना का श्रेय प्रजापति कश्यप को दी गयी है। इस प्रकार निघण्टु के प्रथम रचनाकार कौन थे? यह प्रश्न विवादास्पद हो सकता है किन्तु यह मानना असंगत नहीं है कि प्राचीन काल में वेदों के दुरुह शब्दों के कोश तैयार किये गये थे. जिन्हें निघण्टु कहा जाता था सम्प्रति प्राप्त निघण्टु में तीन काण्ड हैं:
नैघण्टुक काण्ड, नैगम काण्ड तथा दैवत काण्ड। इस निघण्टु में कुल पाँच अध्याय हैं।

यास्क का निरुक्त इसी वर्तमान निघण्टु को व्याख्या करता है । यास्क ने अपने निरुक्त में अपने अनेक पूर्वाचार्यों का उल्लेख किया है, जिनमें आगयण, औदुम्बरायण, और्णनाभ, गाम्य, गालव, चर्मशिरा, ततीकि, शतवलाक्ष, शाकल्य, कौत्स आदि उल्लेखनीय हैं । दुर्भाग्य से यास्क के पूर्वाचार्यों का कोई ग्रन्थ अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। यास्क पाणिनि के पूर्ववर्ती माने जाते हैं, अत: इनका समय सातवीं शताब्दी ई० पू० निर्धारित किया जाता है। कालान्तर में निरुक्त पर अनेक टीकाएँ लिखी गयी, जिनमें दुर्गाचार्य और स्कन्द महेश्वर की टीकाएँ उपलब्ध हैं ।

(v) छन्द:-

वैदिक संहितायें छन्दोबद्ध पद्य आत्मक एवं गद्यात्मक शैली में लिपिबद्ध हैं पद्य रचना में छन्दों का ज्ञान अति आवश्यक है, किन्तु वैदिक संहिताओं के गद्य भाग भी छन्द के नियमों में आबद्ध हैं। अत: सम्पूर्ण वेद छन्दोबद्ध हैं। छन्द का तात्पर्य ऐसे वाक्य संरचना से है, जिसमें अक्षरों या पादों की एक निश्चित संख्या प्रयुक्त की जाती है।

 छन्द दो प्रकार के होते हैं-अक्षर गणनानुसारी और पादाक्षरगणनानुसारी।अक्षरगणना नुसार में अक्षरों की गणना की जाती है, जबकि पादाक्षारगणनानुसारी में छन्द पदों में विभक्त होते हैं और पादों का निर्माण अक्षरों की संख्या पर निर्धारित होता है। वैदिक वाङ्मय में इक्कीस छन्दों का प्रयोग मिलता है, जो निम्नवत् हैं: गायत्री, उष्णिक् अनुष्टप, वृहतो, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती, अतिजगति. शक्वरी, अतिश कुवरी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, अधृति, कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संस्कृति, अभिकृति, उत्कृति ।

इससे ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक ऋषियों को छन्द-शास्त्र का विस्तृत ज्ञान था और उस काल में कोई छन्द-शास्त्र रहा होगा, किन्तु वैदिक काल का कोई छन्द-शास्त्र प्राप्त नहीं है। इस समय जो छन्द शास्त्र मिलता है, वह आचार्य पिंगल का छन्द सूत्र है। आचार्य पिंगल को पाणिनि का अनुज माना जाता है। यदि यह सत्य है, तो पिंगल का समय भी पांचवी-छठी शताब्दी ई० पू० माना जा सकता है। पिंगल ने अपने छन्द शास्त्र में अनेक पूर्ववर्ती आचार्यों-जैसे क्रौष्टकि, यास्क, ताण्डी, सैतव, रात, काश्यप, माण्डव्य आदि का उल्लेख किया है, किन्तु इन आचार्यों की कोई कृति सम्प्रति उपलब्ध नहीं हैं। आचार्य पिंगल ने इन आचार्यों के मतों का उल्लेख अपने छन्दशास्त्र में अवश्य किया है।

(vi) ज्योतिष:-

वेदांगों में ज्योतिष विज्ञान का विकास यज्ञं की तिथि निर्धारण के उद्देश्य से किया गया था। ऐसी मान्यता थी कि नक्षत्र, ऋतु, तिथि, मास, पक्ष और सम्वत्सर के अनुसार यज्ञों को सम्पन्न करने से ही यज्ञ फलदायी होते हैं। इसकी जानकारी के लिए ज्योतिष का ज्ञान अत्यावश्यक माना गया था। ज्योतिष विज्ञान के संकेत ऋग्वेद के मंत्रों से मिलने लगते हैं। ऋ्वेद में बारह राशियों और सप्तर्षि मण्डल के उल्लेख आये हैं।

कालान्तर में वैदिक संहिताओं का विकास जब ब्राह्मणों और उपनिषदों के रूप में हुआ, तो उनमें भी ज्योतिष सम्बन्धी जानकारियों का समावेश किया गया। प्राचीन साहित्य में अनेक ऋषियों के नाम मिलते हैं, जिन्होंने ज्योतिष का विकास किया था उनमें व्यास, वशिष्ठ, पराशर, काश्यप, अत्रि, नारद, अंगिरस, भृगु, शौनक आदि है, किन्तु उन आचार्यों की कृतियाँ अप्राप्त है । ज्योतिष वेदांग की प्राचीनतम कृति ‘ वेदांग ज्योतिष’है वेदांग ज्योतिष के दो पाठ मिले हैं, जिनका सम्बन्ध ऋग्वेद और यजुर्वेद से है। इन दोनों पाठों में अधिकांश श्लोक समान हैं।

इस ग्रन्थ में ज्योतिष के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। वेदांग ज्योतिष के रचनाकार लेगध थे। लगध के जन्मस्थान और समय के विषय में कुछ निश्चित ज्ञात नहीं है। कतिपय विद्वान् इनका समय बारहवीं-चौदहवीं शताब्दी ई० पू० में रखने का मत प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन साहित्य में यद्यपि ज्योतिष के अन्य ग्रंथों का उल्लेख मिलता है, किन्तु सम्प्रति वे प्रा्त नहीं है। कालान्तर में ज्योतिष का विकास गुप्तकाल में दिखायी पड़ता है, जब आर्यभट्ट, वाराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य आदि आचार्य हुए, किन्तु इन आचार्यों को कृतियाँ वेदांगों के अन्तर्गत परिगणित नहीं की जाती हैं।

वैदिक साहित्य से सम्बन्धित अन्य साहित्य-

यद्यपि वैदिक साहित्य के अन्तर्गत वैदिक संहिताओं से लेकर उपनिषदों तक की गणना की जाती है, किन्तु वैदिक वाङ्मय के सम्यक् ज्ञान के लिए जैसे वेदांगों को वैदिक साहित्य का आनुषंगिक साहित्य माना जाता है, उसी प्रकार प्रातिशाख्य, उपवेद और अनुक्रमणी ग्रन्थों को भी वैदिक साहित्य का विकसित रूप स्वीकार किया जाता है। प्रातिशाख्य ग्रन्थों का सम्बन्ध मुख्य रूप से शिक्षा, छन्द और व्याकरण वेदांगों से माना जाता है।

प्रातिशाख्य ग्रन्थों के प्रणयन का मुख्य उद्देश्य वेदों के विभिन्न शाखाओं के शिक्षा, छन्द और व्याकरण के विशिष्ट नियमों का निरूपण करना था, क्योंकि सामान्य नियम वेदांगों में दिये गये थे। प्रातिशाख्यों का सम्बन्ध यद्यपि शिक्षा, छन्द और व्याकरण तीनों से है, किन्तु इनमें अधिक जोर व्याकरण पर दिया गया है, इसीलिए इन्हें विद्वान् वैदिक व्याकरण भी कहते हैं प्रातिशाख्यों के रचना का प्रमुख कारण वैदिक संहिताओं की भाषा और उच्चारण की दृष्टि से शुद्धता बनाये रखना था।
ध्यातव्य है कि समय के साथ भाषा का भी विकास होता है और शब्दों के उच्चारण में भी परिवर्तन होते हैं। अत:प्रातिशाख्यों की रचना के माध्यम से यह प्रयास किया गया कि वैदिक मन्त्रों के छन्द, उच्चारण और स्वरों की शुद्धता बनी रहे। स्वरों की शुद्धता के लिए प्रातिशाख्यों में संहिता पाठ, क्रम पाठ, जटा पाठ आदि विधियों का प्रतिपादन किया गया है। वेदों के जो प्रातिशाख्य सम्प्रति उपलब्ध है, उनमें सर्वप्रथम ऋक्प्रातिशाख्य का उल्लेख किया जा सकता है। इसका सम्बन्ध ऋग्वेद से है ।इसकी रचना का श्रेय शौनक ऋषि को दिया जाता है ।


ऋप्रातिशाख्य में अट्ठारह पटले है, जिनमें स्वर, व्यञ्जन, सन्धि आदि के विशिष्ट नियमों का निरूपण किया गया है शुक्ल यजुर्वेद से सम्बन्धित वाजसनेयी प्रातिशाख्य है। इसकी रचना कात्यायन ऋषि ने की थी। इसमें स्वरों के लक्षण और विशेषताओं, मन्त्रों के पद पाठ, संधियों के नियमों और वों के स्वरूप आदि पर विचार किया गया है। कृष्ण यजुर्वेद का निरीय प्रातिशाख्य है जिसे दो प्रश्नों ( खण्डों) में विभाजित किया गया है इसके प्रत्येक खण्ड में बारह अध्याय हैं। इस प्रातिशाख्य में स्वर, सन्धि, शब्द, उच्चारण, वर्ण आदि के नियमों को प्रतिपादित किया गया है।

सामवेद के दो प्रातिशाख्य पुष्पसूत्र और ऋक् तन्त्र प्राप्त होते हैं। पुष्प सूत्र की रचना वररुचि द्वारा की गयी थी इसमें सामवेद के गेय सामों का निरूपण किया गया है। तंत्र के रचनाकार शाकटायन थे इसमें वैदिक व्याकरण के नियमों का उल्लेख किया गया है। अथर्ववेद के दो प्रातिशाख्य शौनकीया चतुरध्यायिका और अथर्ववेद प्रातिशाख्य सूत्र उपलब्ध हैं। इन प्रातिशाख्यों में भी शिक्षा, छन्द और व्याकरण से सम्बन्धित विशिष्ट नियमों का प्रतिपादन किया गया है।

प्रातिशाख्यों के अलावा वैदिक वाङ्मय के साहित्यिक विकास में चार उपवेदों-आयुर्वेद, धनुर्वेद, शिल्पवेद और गान्धर्ववेद की भी गणना की जाती है। इन उपवेदों पर आधारित अनेक साहित्यों का विकास बाद की शताब्दियों में हुआ, किन्तु मूल उपवेद उपलब्ध नहीं है। उपवेदों पर आधारित साहित्य उत्तर वैदिक काल के बाद के प्रतीत होते हैं। अत: उन रचनाओं को वैदिक साहित्य के अन्तर्गत नहीं माना जा सकता है।

वैदिक साहित्य के विकास में अनुक्रमणी ग्रन्थों का विशेष महत्त्व है, यद्यपि इन ग्रन्थों का रचना काल उपनिषदों के बहुत बाद माना जाता है, तथापि वैदिक संहिताओं को सुरक्षित रखने की दृष्टि से अनुक्रमणी ग्रन्थों का प्रमुख स्थान है। इन ग्रन्थों में वैदिक ऋषियों, देवताओं, छन्दों और सूक्तों तथा मन्त्रों की सूचियाँ तैयार की गयी हैं।

इन ग्रन्थों के रचनाकारों में शौनक और कात्यायन का प्रमुख स्थान है। शौनक ने ऋग्वेद से सम्बन्धित दस रचनाएं प्रस्तुत की, जिनमें आर्षानुक्रमणी, छन्दोऽनुक्रमणी, देवतानुक्रमणी, अनुवादकानुक्रमणी सूक्तानुक्रमणी, ऋग्विधान, पाद विधान, बृहद्देवता, प्रातिशाख्य और शौनक स्मृति आते हैं। इन ग्रन्थों में ऋग्वेद के ऋषियों, छन्दों, देवताओं, अनुवाकों, सूक्तों, मन्त्रों के प्रयोग, देवताओं के परिगणन आदि का विवरण दिया गया है। इसी प्रकार कात्यायन ने सर्वानुक्रमणी”शुक्ल यजु सर्वानुक्रम सूत्र’ की रचना करके वैदिक संहिताओं की शुद्धता बनाए रखने का प्रयास किया था।

अथर्ववेद से सम्बन्धित अनुक्रमणी ग्रन्थ’वृहत्सर्वानुक्रमी’ है, जिसमें अथर्ववेद के ऋषियों, देवताओं, सूक्तों आदि की सूची प्रस्तुत की गयी है। सामवेद से भी सम्बन्धित अनेक ऐसे साहित्य मिले हैं, जो अनुक्रमणियों के समान हैं, जिनमें सामवेद से सम्बन्धित ऋषियों, देवताओं, छन्दों, सूक्तों आदि की सूचियाँ प्रस्तुत की गयी हैं।

छ: दर्शन (Six Darshanas)-

भारतीय दर्शन की छ: शाखाएँ वैदिक साहित्य की आवश्यक अंग हैं। उन छ: दर्शनों के नाम हैं, न्याय, वैशेषिक, साँख्य, योग, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा।
इन दर्शनों का रचना-काल छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर अशोक के समय तक है। दर्शनों की रचना सूत्रों के रूप में हुई। ये सूत्र संक्षिप्त और स्पष्ट हैं।
अविद्या, माया, पुरुष और जीव ये विषय सभी दर्शनों में समान रूप से पाए जाते हैं। वे बौद्धों के सन्देहवाद के विरुद्ध हैं तथा ‘शाश्वत अस्थिर प्रवाह के विपरीत पदार्थ गत सत्य तथा तथ्य का मानदन्ड निर्धारित करते है”A standard of objective reality and truth as opposed to eternal unstable flux”)। वे समस्त विश्व की उत्पत्ति, पालन और विलय में विश्वास करते हैं। पूर्व मीमांसा के अतिरिक्त अन्य दर्शन जीवात्मा की मुक्ति अथवा मोक्ष के लक्ष्य को सामने रखते हैं। उनमें बताया गया है कि ‘चित्त शुद्धि’ तथा निष्काम कर्म से मोक्ष प्राप्त होता है।

(i) न्याय दर्शन:-

 न्याय दर्शन को गौतम ऋषि ने लिखा। इसके अनुसार, तर्क ही समस्त अध्ययन का आधार है। यह विज्ञानों का विज्ञान है। ज्ञान चार उपायों से पाया जा सकता है : प्रत्यक्ष अर्थात् मौलिकता, अनुमान अर्थात् कल्पना, उपमा अर्थात् तुलना, तथा शब्द अर्थात् मौखिक प्रमाण। अनुमान तीन तरह का है : पूर्ववत्, शेषवत् तथा ‘सामान्यतो दृष्टम्। ‘न्याय दर्शन’ सन्देह के सिद्धान्त की चर्चा करता है और इसका कारण स्मृति में कमी या पहचानने में भूल होना है। किसी वस्तु के वास्तविक बोध के विपरीत अवास्तविक बोध त्रुटि है। अनुभवी व्यक्तियों के सामने सत्य अपने-आप को प्रकट कर देता है। आत्मा सत्य है और इच्छाएँ, घृणा, संकल्प इत्यादि इसके लक्षण हैं। चेतना आत्मा से अलग नहीं रह सकती जैसे लौ की दीप्ति उससे भिन्न नहीं रह सकती। न्यायदर्शन चिदानन्द ब्रह्म ईश्वर में विश्वास करता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त उसे मान्य है और वह मानव मात्र को इससे छूटने की प्रेरणा देता है।

(ii) वैशेषिक दर्शन:-

 वैशेषिक दर्शन के लेखक कणाद ऋषि थे। यह दर्शन पदार्थों से सम्बन्धित है। पदार्थों को छः भागों में विभक्त किया गया है : द्रव्य, गुण, कर्म सामान्य, विशेष और समवाय। द्रव्य नौ हैं : पृथ्वी, जल, वायु, प्रकाश, काल, अन्तरिक्ष, आत्मा तथा मनस् । ठोस पदार्थ अणुओं से बनते हैं। अणु नाशवान नहीं हैं उनके विभिन्न रूप धारण करने से ही सब कुछ बनता है। गुण 17 प्रकार के होते हैं। कर्म परिवर्तनशील है तथा किसी-न-किसी सीमा पर अवश्य समाप्त हो जाता है। कणाद ने ईश्वर के विषय में स्पष्ट कुछ नहीं कहा है। कणाद ऋषि का दर्शन ब्रह्माण्ड का सम्पूर्ण दर्शन नहीं है।

(iii) सांख्य दर्शन:-

 सांख्य दर्शन के रचयिता कपिल ऋषि थे। इसका आधारभूत सिद्धान्त पुरुष एवं प्रकृति को पृथक् मानना है। तीन गुणों से प्रकृति का विकास होता है : सत्त्व गुण, रजस् गुण तथा तमस् गुण सत्त्व गुण अच्छाई और आनन्द का स्रोत है। रजस् गुण कर्म तथा दुःख का स्रोत है। तमस् गुण अज्ञान, आलस्य तथा उदासीनता उत्पन्न करता है। यह दर्शन विश्व को यथार्थ नहीं मानता क्योंकि यह शाश्वत नहीं है और कुछ समय बाद नष्ट हो जाता है। केवल प्रकृति शाश्वत है। पुरुष अमर है और जीव पुनर्जन्म के बन्धन में बँधे हुए हैं साँख्य दर्शन ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता प्रकृति और पुरुष ईश्वर पर आश्रित न होकर स्वतन्त्र हैं।

(iv) योग दर्शन:-

योग दर्शन पतञ्जलि ने लिखा था। चित्त को एक स्थान पर केन्द्रित करने अथवा योग द्वारा मनुष्य जन्म-बन्धन से छूट सकता है। जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों का ही विकास करने की चेष्टा करनी चाहिए। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सारे उपाय बताए गए हैं : यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान और समाधि। हठ योग द्वारा शरीर को अत्यधिक कष्ट सहन करने योग्य बनाया जा सकता है। श्वास का नियमन मन को दृढ़ बनाता है। योग का अन्त ध्यान तथा समाधि में होता है। जब मनुष्य समाधि की अवस्था में पहुँचता है तो वह संसार से सम्बन्ध तोड़ लेता है। ईश्वर ही चिन्तन का लक्ष्य है और वही उद्देश्य-प्राप्ति में हमारी सहायता करता है।

(v) पूर्व मीमांसा दर्शन:-

पूर्व मीमांसा दर्शन के लेखक जैमिनी ऋषि थे। यह दर्शन रीति-नीति से सम्बन्धित है इसमें वेदों की महत्ता को स्वीकार किया गया है। यह भी माना गया है कि मनुष्य की आत्मा उसके शरीर, इन्द्रियों तथा ज्ञान से भिन्न है आत्माओं की अनेकता को भी माना गया है। धर्म उचित जीवन का साधन है। मनुष्य दो ब्रकार के कर्म करता है : नित्य कर्म तथा काम्य कर्म। पहला दैनिक क्रम में होता है और दूसरा किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इसके अनुसार विभिन्न देवताओं की उपासना करनी चाहिए। किसी दयालु अथवा सक्रिय भगवान् के अस्तित्व को आवश्यक नहीं माना गया है। पूर्व मीमांसा केवल व्यावहारिक धर्म से सम्बन्धित है तथा परम सत्य की समस्या का हल दूँढ़ने की इसमें चेष्टा नहीं की गई है। यह केवल कर्मकाण्ड तक ही सीमित है।

(vi) उत्तर मीमांसा दर्शन:-

 उत्तर मीमांसा दर्शन के रचयिता बादरायण ऋषि थे। उन्होंने चार अध्यायों में विभक्त 555 सूत्र लिखे हैं। पहले अध्याय में ब्रह्म की प्रकृति तथा विश्व और अन्य जीवों के साथ उसके सम्बन्ध बताये गए हैं दूसरा अध्याय आपत्तियों से सम्बन्धित है। तीसरे अध्याय में ब्रह्म-विद्या-प्राप्ति की चर्चा है और चौथे अध्याय में ब्रह्म-विद्या के लाभ तथा मृत्यु के उपरान्त आत्मा के भविष्य के सम्बन्ध में बताया गया है।

उपवेद(Upvedas):-

 हिंदू धर्म में 4(चार) वेद हैं । तथा कुछ विद्वानों द्वारा उन्हें वेदों से ही एक अलग अलग शाखा निकालकर वेदों के ज्ञान को सरल और परिष्कृत कर दिया गया, वेदों के इसी निकली हुई शाखा के वेदों के सरल व परिष्कृत ज्ञान को उपवेद कहते हैं। दूसरे शब्दों में- उपवेद के अंतर्गत विज्ञान आते हैं जो वेद के अंतर्गत हो तथा वेद पर ही आश्रित होकर वेदों से ही निकले हों।
वेदों की ही भांति मुख्य उपवेदों की संख्या भी 4 ही मानी गयी है। ये निम्न हैं―

1.आयुर्वेद:-

यह ऋग्वेद का उपवेद है। इसके संकलनकर्ता धन्वंतरी हैं। यह मुख्यतः चिकित्सा पर आधारित उपवेद है।  इसमें रसायन शास्त्र, खनिज विज्ञान, वनस्पति- विज्ञान, शल्य-चिकित्सा, विष-चिकित्सा, आयुर्विज्ञान आदि के वर्णन किए गए हैं इसके रचयिताओं में प्रमुख हैं-आचार्य अश्विनी कुमार, धन्वंतरी, बाणभट्ट, सुश्रुत, माधव, जीवन, लोलिम्बराज और पतंजलि आदि।

2.धनुर्वेद:-

यह यजुर्वेद का उपवेद है। इसके कर्ता विश्वामित्र हैं, इसमें अस्त्र-शस्त्र चलाने, उन्हें बनाने और उनमें प्रवीणता प्राप्त करने की विधियों का उल्लेख है। वैदिक काल के युद्ध-विद्या के सुप्रसिद्ध आचार्यों ने इसमें शस्त्रों के संचालन की विधियों पर प्रकाश डाला है। जमदग्नि, परशुराम, विश्वामित्र, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि इसके कतिपय प्रमुख आचार्य हैं।

3.गंधर्ववेद-

 सामवेद का उपवेद है। इसके कर्ता नारद मुनि हैं। कहीं कहीं इसके रचनाकार के रूप में भरत मुनि का नाम आता है। इसमें गान विद्या के प्रमुख अंगों, जैसे गायन, वादन, नृत्य आदि का विशद वर्णन दिया हुआ है।    विश्वावसु, नारद, तुंबुरु, शंकर, शिलालि, भरत आदि इसके आचार्य हैं।

4.स्थापत्य वेद या शिल्प वेद:-

यह अथर्ववेद का उपवेद है। स्थापत्य वेद के कर्ता विश्वकर्मा हैं। इसमें वास्तुशास्त्र, शिल्पकला, स्थापत्य कला, हस्तकला इत्यादि का विवरण है।

स्मृतियाँ:-

वैदिक साहित्य में स्मृतियों का विशेष स्थान है। दूसरे रूप में देखें तो इन स्मृतियों का ऐतिहासिक महत्व भी काफी उच्च है। ये स्मृतियाँ हिन्दू धर्म शास्त्रों के रूप में भी स्वीकृत हैं जिनका विशद विवरण हम धर्म शास्त्र युग वाले पोस्ट में करेंगे अभी स्मृतियों का संक्षेप में अध्ययन वैदिक साहित्य के संदर्भ में कर लेते हैं।

यदि बात करें स्मृतियों की वास्तविक संख्या पर तो यह ज्ञात कर पाना कठिन है लिहाजा इस पर विद्वानों में काफी विवाद भी है। पद्म पुराण के अनुसार स्मृतियों की संख्या 36 है। जिनमें से कुछ निम्नवत् हैं-
मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति, पराशर स्मृति, बृहस्पति स्मृति, कात्यायन स्मृति, अत्रि स्मृति, विष्णु स्मृति, हारीत स्मृति, औशनस स्मृति, अंगिरा स्मृति, यम स्मृति, व्यास स्मृति, दक्ष स्मृति, गौतम स्मृति, वशिष्ठ स्मृति, आपस्तम्ब स्मृति, संवर्त स्मृति, शंख स्मृति, लिखित स्मृति, देवल स्मृति, शतातप स्मृति आदि। इनमें से प्रथम 6 प्रसिद्ध व मुख्य स्मृतियाँ है।

वहीं अगर बात करें स्मृतिकारों की तो गौतम ने सिर्फ मनु को, बौधायन ने स्वयं के अतिरिक्त 7 अन्य लोगों- औपजंघनी, कात्य, काश्यप, गौतम, प्रजापति, मौद्गल्प, व हारित को स्मृतिकार माना है। वहीं वाशिष्ठ ने सिर्फ 5 लोगों- प्रजापति, गौतम, मनु, यम व हारित को तथा आपस्तम्ब ने 10 लोगों को तथा मनु ने अपने अतिरिक्त अन्य 6 लोगों- अत्रि, उतथ्य के पुत्र, भृगु, वशिष्ठ, वैखानस, एवं शौनक को स्मृतिकार के रूप में बताया है। परासर ने अपने अतिरिक्त 19 स्मृतिकारों का उल्लेख किया है।

यद्यपि स्मृतियों का स्थान हिन्दू धर्म मे तो काफी उच्च है किंतु तब भी इन्हें श्रुति साहित्य अथवा वेदों से निम्न स्थान ही प्राप्त हो पाया है किन्तु ये स्मृतियां अधिकांश हिंदुओं द्वारा पढ़ी जाती है क्योंकि वेदों को पढ़ना कठिन है तथा स्मृतियाँ आसान हैं।  गौरतलब है कि स्मृतियों की रचना मनुष्यों द्वारा की गई है तथा इनके अंतर्गत वेद नही आते हैं।

स्मृति का शाब्दिक अर्थ “याद किया हुआ” होता है। इन स्मृतियों की रचना ई०पू० 500 से लगभग 600 ई० तक हुई है।
आचार-व्यवहार की शिक्षा के लिए धर्म सूत्रों (कल्प सूत्र का एक भाग) पर आधारित कई स्मृतियाँ लिखी गईं। इनमें वर्णाश्रम व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, विवाद का निर्णय आदि विविध विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

इन स्मृतियों के आधार पर हिन्दुओं के दीवानी और फौजदारी कानून बने हुए हैं। यद्यपि प्राचीन स्मृतियों के बहुत से नियम आज अपना अर्थ और महत्व खो चुके हैं, तथापि आज भी भारतीय सामाजिक व्यवस्था मूलतः स्मृतियों पर आधारित है।
कुछ महत्वपूर्ण स्मृतियाँ निम्न हैं।

1.मनुस्मृति:

यह स्मृतियों में सबसे प्राचीन एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसे ‘हिन्दुओं की प्रामाणिक विधि संहिता’ कहा जाता है। इसमें व्यापक विषय-वस्तु का प्रतिपादन किया गया है। सृष्टि से आरंभ करके मानव समाज के विकास तथा दैनिक जीवन के कर्तव्यों का विवेचन करते हुए मोक्ष तक का इसमें विवेचन है। मनु को ‘मानव जाति का पिता’ कहा गया है। उन्होंने जीवन की व्यवस्था के लिए अपने नियम दिये हैं। ‘मनुस्मृति’ के टीकाकरण के नाम-विश्वरूप, मेधातिथि 825-900 ई. (‘मनुभाष्य’), गोविन्दराज : 1008-1110 ई. कुल्लूक भट्ट : 1150-1300 ई. आदि।

2.याज्ञवल्क्य स्मृति :

यह स्मृतियों में द्वितीय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसमें अपेक्षाकृत अधिक प्रगतिशील विचार दिए गए हैं। ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ के टीकाकरण के नाम-विश्वरूप 800-825 ई. ( ‘बालक्रीडा’), विज्ञानेश्वर: 1120 ई० (मिताक्षरा’), शिलाहारवंशी राजा अपारक : 12वीं सदी ई. का पूर्वार्द्ध (अपारयाज्ञवल्क्य धर्मशास्त्र निबंध’) आदि ।

3.नारद स्मृति-

इसमें व्यवहार अर्थात् न्याय शासन का विवेचन किया गया है।

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इतिहास क्या है?

●  ऐतिहासिक स्रोत (साहित्यिक स्रोत)

ऐतिहासिक स्रोत(पुरातात्विक स्रोत)

ऐतिहासिक स्रोत (विदेशी विवरण)

ताम्रपाषाणिक संस्कृति

भारत में लौह काल| लोहे की प्राचीनता

भारत की ताम्रनिधियां/ताम्रपाषाण युग

आर्य कौन थे? तथा कहाँ से आये थे?

ऋग्वेद कितना वर्ष पुराना है?/ ऋग्वेद की रचना कब हुई?

वैदिक साहित्य(भाग-1) वेद(ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद)

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महाकाव्य:-

लौकिक संस्कृत में रचित आरंभिक महाकाव्यों में ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ का नाम आता है। दोनों महाकाव्यों का रचनाकाल 400 ई.पू. से 400 ई. माना जाता है। ‘रामायण’ को ‘आदि काव्य’ और इसके रचयिता वाल्मीकि को ‘आदि कवि’ कहा जाता है क्योंकि लौकिक संस्कृत भाषा में काव्य-रचना का आरंभ इन्हीं से हुआ। दूसरी और महर्षि ि वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ को ‘इतिहास काव्य’ कहा जाता है । यह संस्कृत साहित्य का सबसे बड़ा ग्रंथ है। यह विश्वकोश (Encyclopedia) के समान भारतवर्ष के ज्ञान- विज्ञान के सभी पक्षों का निरूपण करता है।
इन दोनों महाकाव्यों ने भारतीय संस्कृति को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है और बाद के विभिन्न कवियों ने इनकी कथा को आधार बनाकर अपने ग्रंथों की रचना की है। इसी कारण इन्हें ‘उपजीव्य काव्य’ कहा जाता है।

(i) रामायण महाकाव्य:-

रामायण आदि काव्य’ है इसके रचयिता का नाम महर्षि वाल्मीकि है।
इसमें 7 काण्ड, 500 सर्ग एवं 2400 श्लोक हैं।
यह एक छंदोबद्ध रचना है। इसमें मूलतः 6000 श्लोक थे, बाद में 1200 श्लोक एवं अंततः 2400 श्लोक हो गये।
इसमें राम कथा वर्णित है। इसके सात काण्डों में 1ला व 7वाँ काण्ड बाद में जोड़ा गया अंश है।
इसके काण्ड निम्नवत् हैं―

i. बालकाण्ड-

इसमें भगवान श्री राम का बचपन, विश्वामित्र के साथ वन जाकर उनके यज्ञ की रक्षा और तदर्थ राक्षसों का वध, जनकतनय सीता के साथ पाणिग्रहण आदि बातों व घटनाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन है।

ii. अयोध्याकाण्ड:-

रामायण के इस काण्ड में अयोध्या के राजप्रासाद की घटनाएँ, राम के राज्याभिषेक की तैयारी, कैकेयी का राम के लिए वनवास और अपने पुत्र भरत के राज्याभिषेक के लिए राजा दशरथ से वर माँगना, राम का वन-गमन, दशरथ का राम के पुनः राजधानी लाने का असफल प्रयास आदि वर्णित है।

iii. अरण्यकाण्ड:-

राम का दण्डकारण्य में निवास, विराध आदि राक्षसों का वध, पंचवटी में निवास, रावण की बहन शूर्पणखा से भेंट, खर आदि अनेक राक्षसों का वध, रावण द्वारा सीता हरण, राम का करुण क्रन्दन आदि का बेहद मार्मिक वर्णन किया गया है।

iv. किष्किन्धाकाण्ड:-

रामायण का यह काण्ड राम व सुग्रीव की मित्रता का साक्षी है। साथ ही इसी काण्ड में बाली का भगवान राम द्वारा वध, हनुमान जी का अन्य वानरों के साथ माता सीता की खोज में निकलना आदि का वर्णन है।

v. सुन्दर काण्ड:-

यह काण्ड लगभग पूर्णतः हनुमान जी की लीलाओं का वर्णन करता है इसी कारण यह काण्ड सर्वप्रचलित है। इसमें लंका द्वीप तथा रावण के राजप्रासाद का वर्णन, हनुमान का सीता को सांत्वना प्रदान करना और सीता विषयक शुभ समाचार सहित वापस लौटना तथा लंका पर चढ़ाई हेतु सागर पर सेतुबंध कार्य आरंभ होने की घटना का वर्णन है।

vi. युद्धकाण्ड या लंका काण्ड:-

यह काण्ड रामायण के सात काण्डों में सबसे बड़ा काण्ड है। इसमें रावण पर राम की विजय का वर्णन आदि है।

vii. उत्तर काण्ड:-

यह रामायण का अंतिम काण्ड है । इसमें रावण वध करने के उपरान्त सीता को लेकर राम की अयोध्या वापसी, सीता के विषय में लोकोपवाद, राम द्वारा सीता को वनवास और वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश का जन्म आदि वर्णित है।

वाल्मीकि ने ‘रामायण’ महाकाव्य के द्वारा जीवन के आदर्शमूलक और शाश्वत मूल्यों का निर्देश किया है। इसमें राजा-अजा, पिता-पुत्र, माता-पुत्री, पति-पत्नी, स्वामी-सेवक आदि संबंधों का एक आदर्शस्वरूप प्रस्तुत किया गया है।  ‘रामायण’ ने न केवल परिवर्तन संस्कृत कवियों को कथानक प्रदान किया अपितु समस्त आधुनिक भारतीय भाषाओं के कवियों को भी राम-कथा लिखने की प्रेरणा दी।

(ii) महाभारत महाकाव्य:-

महाभारत ‘इतिहास काव्य‘ है इसके रचयिता का नाम महर्षि वेदव्यास है। वेदव्यास को ‘कृष्ण द्वैपायन'(द्वीप में के कारण), ‘बादरायण'(बद्रीनाथ में रहने के कारण)  एवं वेदव्यास’ (वेदों का संकलन करने के कारण) कहा जाता है।
इस इतिहास ग्रंथ को प्राचीन भारतीयों ने धर्मग्रंथ की मान्यता दी है तथा इसे ‘पंचम वेद’ कहा है।
इसमें 18 पर्व (अर्थात् खण्ड), 2000 अध्याय एवं 100,000 श्लोक हैं। इसमें मूलतः 8800 श्लोक ये और नाम था ‘जय संहिता’, बाद में 2400 श्लोक हो गये और नाम पड़ा ‘चतुर्विंशतिसहस्त्री संहिता’ या ‘भारत’ और अतत: 100000 श्लोक हो गये और नाम पड़ा ‘शतसहस्त्री संहिता’ या ‘महाभारत’

इसमें कौरव-पांडवों की उत्पत्ति से लेकर पाण्डवों के स्वर्ग गमन तक की कथा वर्णित है। इसमें हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए कौरवों और पाण्डवों के संघर्ष का वर्णन हुआ है। पाण्डव कौरवों से आधा राज्य प्राप्त कर राजसूय यज्ञ करते हैं किन्तु ईर्ष्यालु कौरव पाण्डवों को जुए में हरा करके उन्हें शर्त के अनुसार तेरह वर्षों के लिए वन जाने को विवश कर देते हैं। अंतिम वर्ष में अज्ञातवास की यह शर्त रखी जाती है कि यदि इस अवधि में पाण्डवों का पता चल गया तो उन्हें पुनः वनवास में जाना पड़ेगा। पाण्डव सफलतापूर्वक यह शर्त पूरी कर लेते हैं और अपना राज्य माँगते हैं। किन्तु उन्हें राज्य नहीं दिया जाता है। इसलिए महाभारत का युद्ध होता है जो 18 दिनों तक चलता है। इसमें कौरवों का सर्वनाश हो जाता है और पाण्डवों की विजय होती है।

महाभारत में 18 पर्व हैं ―
1. आदि, 2. सभा, 3. वन, 4. विराट, 5. उद्योग, 6. भीष्म, 7.द्रोण, 8.कर्ण, 9.शल्य, 10. सौप्तिक, 11. स्त्री, 12. शांति, 13. अनुशासन, 14. अश्वमेधिक, 15. आश्रमवासिक, 16. मौसल, 17.महाप्रस्थानिक एवं 18. स्वर्गारोहण।
इन पर्वों के अतिरिक्त एक परिशिष्ट या उपसंहार भी है, जिसे ‘हरिवंश’ कहा जाता है। ‘हरिवंश’ में कृष्ण वंश की कथा और युद्ध के बाद की घटनाओं की समीक्षा वर्णित है।

‘भगवत गीता/गीता’ :

यह महाभारत का एक अंश है। यह महाभारत के 6ठे पर्व भीष्म पर्व से लिया गया है। यह एक क्षेपक है। इसमें 18 अध्याय एवं 700 श्लोक हैं। इसे उपनिषदों का सार’ कहा जाता है। इसमें मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्गों-कर्म, ज्ञान और भक्ति का सुन्दर समन्वय है । भक्ति के सिद्धांत को सबसे पहले ‘गीता’ में ही स्पष्ट रूप से निरूपित किया गया है। हिन्दुओं की ‘गीता’ को मुसलमानों के ‘कुरान’ और इसाइयों के ‘बाइबिल’ के समतुल्य पवित्र धर्म ग्रंथ माना जाता है।

‘गीता’ पर टीका लिखने वाले प्रमुख मध्यकालीन विद्वान शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मधुसूदन सरस्वती, संत ज्ञानेश्वर आदि। आधुनिक काल में भारतीय राष्ट्रवाद के नीतिपरक आधार के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करें के लिए भारत के कई राष्ट्रवादी नेताओं ने भगवद्गीता पर टीकाएँ लिखीं, जैसे—बाल गंगाधर तिलक (‘गीता रहस्य’), अरविन्द घोष (‘एस्येज ऑन द गीता’), महात्मा गांधी (‘भगवद्गीता : महात्मा गांधी के अनुसार’) आदि ।

12वाँ पर्व शांति पर्व ‘महाभारत’ का सबसे बड़ा पर्व है। यह पर्व भारतीय राजधर्मशास्त्र एवं मोक्ष शास्त्र की दृष्टि से पूर्व है। 17वाँ पर्व महाप्रस्थानिक पर्व ‘महाभारत’ का सबसे छोटा पर्व है।

‘महाभारत’ धर्म, दर्शन, राजनीति आदि सभी विषयों का अक्षयकोष है। रामायण के समान महाभारत भी एक ‘उपजीव्य ग्रंथ’ है। बाद के कवियों और लेखकों ने महाभारत से विषय-सामग्री लेकर रचनाएँ की।

पुराण:-

‘पुराण’ का अर्थ है-प्राचीन दर्शन और आख्यान। माना जाता है कि पुराणों का संकलन वेदव्यास ने किया। पुराणों की संख्या 18 है जिन्हें देवता के आधार पर तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है-

1. ब्रम्हा से सम्बद्ध– ब्रह्म, बह्मांड, ब्रह्नवैवर्त, मार्कण्डेय , भविष्य व वामन।

2. विष्णु से संबद्ध : विष्णु, भागवत, नारद, गरुड़, पद्म व वराह।
3. महेश (शिव) से संबद्ध : वायु, लिंग, स्कन्द, अग्नि, मत्स्य व कूर्म ।

जिस प्रकार वैदिक धर्म का आधार वेद है उसी प्रकार उत्तरकालीन हिन्दू धर्म (वैष्णव, शैव आदि) का आधार पुराण है। पुराणों में सामान्यतः पाँच विषयों का वर्णन मिलता है

1. संसार की सृष्टि 2. प्रलय के बाद पुनः सृष्टि 3. राजाओं और ऋषियों के वंशों का वर्णन 4. संसार का काल विभाग और प्रत्येक काल की महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन 5. कलियुग के प्रतापी राजाओं के कार्यों का वर्णन ।
हालाँकि यह विषय-वस्तु सभी पुराणों में नहीं मिलती है।
इतिहास की दृष्टि से 18 पुराणों में से 5 को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इनमें राजाओं की वंशावली (शिशुनाग, नंद, मौर्य, शुंग, सातवाहन, गुप्त वंश आदि) मिलती है। ये हैं—ब्रह्माण्ड, वायु, विष्णु, भागवत एवं मत्स्य ।

प्राचीन भारत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक ज्ञान के लिए पुराण महत्वपूर्ण आधार हैं।  पुराणों की शैली इतनी लोकप्रिय हुई कि ब्राह्मण धर्म के अतिरिक्त जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने भी अपने पुराणों का विकास किया।
ज्ञातव्य है कि 18 पुराणों के अलावा 18 उपपुराण भी हैं।

वैदिक साहित्य का रचना-काल-

वैदिक साहित्य के अन्तर्गत वैदिक संहिताएँ, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् मुख्य रूप से परिगणित किये जाते हैं। इस विशाल साहित्य की रचना किसी एक काल में संभव नहीं प्रतीत होती है। विषयवस्तु के आधार पर सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय को दो भागों में विभाजित किया जाता है-पूर्व वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल।

पूर्व वैदिक काल के अन्तर्गत एक मात्र ऋग्वेद की गणना की जाती है, जबकि उत्तर वैदिक काल के साहित्य में अन्य वैदिक संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् आते हैं। ऋग्वेद की काल गणना से सम्बन्धित अनेक मत विद्वानों ने प्रतिपादित किये हैं भाषा वैज्ञानिक इसका समय एक हजार ई० पू० मानने के पक्ष में हैं, क्योंकि भाषा साम्य के कारण ऋग्वेद और अवेस्ता में समय का बहुत अधिक अन्तर नहीं माना जाता है। ज्योतिषीय गणना के आधार पर वेद का समय तीन हजार ई० पू० निर्धारित किया गया है।

वैदिक संस्कृति के काल निर्धारण में कतिपय विद्वान सिन्धु सभ्यता को उसकी पूर्ववर्ती सभ्यता मानते हैं, और वैदिक आर्यों को सिन्धु सभ्यता के नष्ट करने का साक्ष्यं प्रस्तुत करते हैं।इन विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद की रचना की तिथि सिन्धु सभ्यता के बाद रखी जा सकती है, जिसे स्थूल रूप से 1500-1000 ई० पू० निर्धारित किया जाता है।

इसी प्रकार उत्तर वैदिक काल का समय भी 1000-500 ई० पू० माना जाता है, जब अन्य वैदिक संहिताओं, बाहाणों, आरण्यकों, उपनिषदों आदि की रचनाएं की गयी थी इसके अलावा कतिपय अन्य विद्वान इस विचारधारा से सहमत प्रतीत होते हैं कि वैदिक सभ्यता, सिन्धु सभ्यता की पूर्ववर्ती अथवा समकालीन है। नवीन अनुसंधानों के आलोक में दोनों संस्कृतियों में अतेक समानताएँ परिलक्षित हुई हैं। पाश्चात्य विद्वानों की’ आर्य’ और ‘अनार्य’ प्रजातियों का मत अप्रमाणिक माना जाने लगा है।

इस सन्दर्भ में ज्योतिष विद्वानों के मतों पुरातात्विक अनुसंधान भाषा शास्त्रीय मतों और नृतत्त्वशास्त्रीय परिप्रेक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर देते हुए प्रो० गोविन्द चन्द्र पाण्डे के शब्दों में, “वेदों की रचना गंगा और सरस्वती से अफगानिस्तान तक फैले हुए प्रदेश में वहीं के चिरन्तन निवासियों द्वारा आज से पाँच हजार वर्ष या और अधिक पहले की गयी मानना इस समय उपलभ्य साक्ष्यों के अनुकूल प्रतीत होता है।

इस प्रकार यदि देखें तो वैदिक साहित्य भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व मे ख्याति प्राप्त किये हुए है। यह साहित्य का एक ऐसा भण्डार है जिसमें समस्त विषय, समस्त क्षेत्र, व समस्त संसार समाहित है। इसके अलग अलग ग्रंथों की रचना अलग अलग समय में हुई जिनमें सबसे प्राचीन वेद या संहिताएं हैं।

वैदिक साहित्य(भाग-1) वेद(ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद)

ध्यान दें यह वैदिक साहित्य का दूसरा भाग है इसके पहले के वैदिक साहित्य को पिछले भाग में बताया गया है आप उसे उपर्युक्त लिंक(url) से जाकर अवश्य पढें तभी वैदिक साहित्य का ज्ञान पूर्ण होगा। 

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” न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥ “

अर्थ:- विद्यारुपी धन को कोई चुरा नहि सकता, राजा ले नहि सकता, भाईयों में उसका भाग नहि होता, उसका भार नहि लगता, (और) खर्च करने/ बाँटने से बढता है । सचमुच, विद्यारुपी धन सर्वश्रेष्ठ है ।

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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वैदिक काल , वैदिक साहित्य

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