Sikandar ka jivan parichay in hindi | सिकंदर का जीवन परिचय | Biography of Alexander the great in hindi

इस वेबसाइट GS Center पर चलाई गई एक नई सीरीज (ऐतिहासिक जीवनचरित्र) के अंतर्गत इतिहास के कुछ विशेष लोगों के जीवन वृतांत अथवा जीवन परिचय की व्याख्या की जा रही है। इसमें अब तक महात्मा बुद्ध की जीवनी तथा महावीर स्वामी की जीवनी व्याख्यायित हो चुकी है।

इसके अगले क्रम में आज हम इस पोस्ट में बात करेंगे एक ऐसे ऐतिहासिक पुरुष की जो सम्पूर्ण संसार को जीतने की लालसा रखता था। आज हम सिकन्दर की जीवनी की तथा उसके जीवनवृत्त की चर्चा करेंगे।

Contents

सिकंदर का जीवन परिचय(Biography of Alexander the great):-

आईये जानते हैं सिकन्दर  महान (Alexander the great) के बारे में ―

Sikandar ka jivan parichay सिकन्दर का जीवन परिचय
सिकंदर का जीवन चरित्र

सिकन्दर का जन्म ― 356 ई०पू० 

सिकंदर का अन्य नाम ― अलेक्जेंडर 

उपाधि – सिकंदर महान

सिकंदर के पिता का नाम― फिलिप द्वितीय

माता का नाम ― ओलम्पियाज़ / ओलंपियाज़्ता

पत्नी ― रुखसाना, स्ट्रैटेयरा द्वितीय, बैक्ट्रिया

गुरु ― अरस्तु 

जन्म स्थान ― मकदूनिया / मेसीडोनिया , यूरोप महाद्वीप

शासन काल – 336 ई०पू० से 323 ई०पू० तक (मकदूनिया में) 

जीवन का लक्ष्य― विश्व विजय

भारत पर आक्रमण किया ― 326 ई०पू० में 

मृत्यु ― 323 ई०पू० (बेबिलोनिया , एशिया महाद्वीप में)

अंतिम संस्कार अथवा दफन ― सिकंदरिया (Alexandaria), अफ्रीका महाद्वीप में

उपरोक्त महत्वपूर्ण तथ्य को जानने के बाद आइए आप जानते हैं-

सिकंदर की जीवनी (Biography of Alexandar):-

सिकंदर जिसे अलेक्जेंडर (Alexander) के नाम से जाना जाता है,  वह यूनान का एक राजा था। वह यूनान(ग्रीस) और भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में महान विजेता और कुशल नेता के रूप में प्रसिद्ध है।

सिकन्दर का प्रारंभिक जीवन ―

सिकंदर (Sikandar) का जन्म 356 ईसा पूर्व में यूनान के मकदूनिया नामक स्थान पर एक राजपरिवार में हुआ था। उसके पिता का नाम फिलिप द्वितीय था तथा माता का नाम ओलंपियाज था। जिस समय इसका जन्म हुआ उसके पिता फिलिप 2nd मेसिडोनिया (Macedonia) या मकदूनिया का शासक या क्षत्रप था। इसके एक बहन भी थी।

सिकंदर का पालन पोषण बहुत ही शाही ढंग से यूनान के पेला नामक स्थान पर हुआ। वह बचपन से ही बहुत साहसी, प्रतिभावान और महत्वकांक्षी था। उसके पिता के ही शासन काल मे ही वह युध्दों और विजयों को देखते देखते ही समय के साथ साथ बड़ा हो रहा था। अर्थात को अपने पिता को युद्ध अभियान में ही ज्यादा देखा था फलतः उसका और उसकी बहन का पालन पोषण उसकी माता के द्वारा किया गया।

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सिकन्दर की शिक्षा / सिकन्दर का गुरु ―

शुरुआती शिक्षा सिकंदर ने अपने रिश्तेदार दी स्टन लियोनीडास ऑफ एपिरुस से ली थी। सिकंदर के पिता फिलीप चाहते थे कि सिकंदर को पढ़ाई के साथ-साथ युद्ध विद्या का भी पूरा ज्ञान हो।

इसलिए उन्होनें अपने एक अनुभवी और कुशल रिश्तेदार को सिकंदर के लिए नियुक्त किया था, जिससे सिकंदर ने गणित, घुड़सवारी, धनुर्विद्या ली थी। दरसअल सिकंदर, बचपन से भी बेहद बुद्धिमान था लेकिन वह अपने उग्र स्वभाव के लिए जाना जाता था, इसलिए इसके ये गुरु उसे संभाल नही पाए।

इसके बाद अलेक्जेंडर के शिक्षक लाईसिमेक्स हुए, जिन्होंने एलेक्जेंडर के विद्रोही स्वभाव पर नियन्त्रण किया और उसे युद्ध की शिक्षा दीक्षा दी।

 ~ क्या गुरु अरस्तू ने दिखाया थो दुनिया जीतने का सपना ?

Alexander the Great Teacher वहीं जब सिकंदर 13 साल के हुए तो उनके लिए एक निजी शिक्षक एरिसटोटल (अरस्तु) की नियुक्ति की गई, जिन्हें भारत का अरस्तु भी कहा जाता है। वे एक प्रसिद्ध और महान दार्शनिक थे।

दर्शनशास्त्र, गणित, विज्ञान और मनोविज्ञान में अरस्तू के विचारों का उल्लेख जरूर देखने को मिलता है। इसी से अरस्तू की योग्यता और उनके महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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सिकन्दर ने अरस्तु से लगभग तीन (3) सालों शिक्षा ग्रहण की।  अरस्तु ने ही उसे साहित्य की शिक्षा दी इसके साथ ही वाक्पटुता भी सिखाई। अर्थात सिकंदर जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति को निखारने का काम भी अरस्तू ने ही किया।

वहीं कई इतिहासकार तो मानते हैं कि उनके गुरु अरस्तू ने ही सिकंदर के मन में पूरी दुनिया को जीतने का सपना दिखाया था। क्योकि अरस्तू के मार्गदर्शन से भी सिकंदर योग्यता की सीढ़ियां चढ़ता चला गया और अपने दुनिया जीतने के सपने और लक्ष्य की ओर पूरे आत्मविश्वास से बढ़ता चला गया।

सिकन्दर : प्रारंभ से ही एक महान योद्धा

सिकंदर बचपन से ही (अपने पिता के ही शासन काल से ही) युद्ध, विजय तथा अभियान इन सभी चीजों को देखते देखते पला बढा था। चूंकि वह एक राजपरिवार से ताल्लुक रखता था। और ऐसे राजपरिवार से जिसका उस समय काफी वर्चस्व था।

12 वर्ष की ही अल्पायु में उसने अपने प्रारंभिक गुरु से ही घुड़सवारी, धनुर्विद्या तथा अन्य युद्ध कौशल सीख लिया था। एक बार की बात है फिलिप का एक प्रशिक्षित घोड़ा था जिसका नाम ब्यूकेफेलस (बुकेफेला) / Bucephalus था, वह घोड़ा बहुत ही उग्र था तथा कोई उस पर नियंत्रण नहीं कर सकता था। सिकंदर ने उस घोड़े पर नियंत्रण स्थापित कर के अपने कौशल का प्रमाण अपने पिता को दिया। तभी से यह घोड़ा अपनी मृत्यु तक सिकन्दर की सेवा करता रहा।

प्लूटार्क का विवरण―

इस घटना की जानकारी प्लूटार्क के विवरण से उपलब्ध होती है। वह लिखता है कि – “फिलिप और उनके दोस्त पहले चिंता भरी ख़ामोशी से परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे, और ये मान रहे थे की फिलीप के पुत्र का करियर और जीवन अब ख़त्म होने वाला हैं, लेकिन अंत में उन लोगों ने जब सिकन्दर की जीत को देखा, तो खुश होकर तालियाँ बजाने लगे, सिकन्दर के पिता की आँखों से आंसू आ गये, जो कि ख़ुशी और गर्व के आंसू थे. वो अपने घोड़े से नीचे उतरे और उन्होंने अपने बेटे को किस करते हुए कहा “मेरे पुत्र तुमको खुद की तरफ और इस महान साम्राज्य की तरफ देखना चाहिए, ये मेक्डोनिया का राज्य तुम्हारे सामने बहुत छोटा है,तुममे असीम प्रतिभा हैं।” 

ई०पू० 340 में जब सिकंदर 16 वर्षीय अल्पवयस्क बालक था तो उसके पिता फिलिप ने उसे अपने राज्य का संरक्षक बनाकर थ्रेस के अभियान पर गया था। उसी समय यूनान पर प्रतिआक्रमण भी हुआ किन्तु सिकन्दर ने उसे अपने अदम्य साहस से न केवल विफल किया बल्कि जीत भी हासिल की। इससे भी सिकन्दर की वीरता सिद्ध होती है।

फिलिप ― क्लियोपेट्रा का विवाह:-

सिकन्दर के बड़े होने के बाद भी उसके पिता फिलिप ने अपना विवाह क्लियोपेट्रा नामक लड़की से किया। बता दें कि फिलिप ने अपने जीवनकाल में कुल 7 विवाह किए था।  उसके विवाह के समय ही क्लियोपेट्रा के चाचा ने फिलिप से उसके उचित उत्तराधिकारी का प्रश्न किया जिससे उसको सिकन्दर के क्रोध का सामना करना पड़ा ।

बीतते समय के साथ साथ सिकंदर अब 20 वर्ष का हो गया था। 20 वर्ष की उम्र में सिकन्दर के जीवन में एक ऐसी घटना घटित हुई जिसने उसे वहाँ का शासक बना दिया।

पिता (फिलिप) की हत्या/मृत्यु  और सिकन्दर का शासक बनना:-

ई०पू० 336 में जब सिकन्दर 20 वर्ष का था तो फिलिप द्वारा अपनी पुत्री का विवाह आयोजित किया गया। इसी वैवाहिक आयोजन में फिलिप को उसके शाही अंगरक्षकों के प्रमुख (पॉसनीस) द्वारा मार दिया गया। [हत्यारा व हत्यारे का नाम संदिग्ध है यह केवल संभावित है] (हालांकि बाद में सिकंदर के 2 आदमी ने उसे भी मार डाला।) उसकी मृत्यु सिकन्दर के लिए एक बड़ी घटना थी।  पिता की मृत्यु के पश्चात सिकन्दर अपने पिता द्वारा स्थापित मेसिडोनियन साम्राज्य का शासक बना।

शासक बनने के बाद राज्यारोहण हेतु सिकंदर का संघर्ष:-

उसके शासक बनते ही आस पास के राज्य उस पर आक्रमण करने लगे तथा फिलिप द्वारा विजित राज्य अपने को स्वतंत्र घोषित करने लगे। उधर दूसरी ओर उसके सौतेली माताओं से उत्पन्न पुत्रों ने भी शासक बनने के भरसक प्रयास किए। सिकंदर ने अटलूस की हत्या का भी आदेश दिया, जो कि क्लियोपेट्रा के चाचा हुआ करते थे। राज्यारोहण हेतु उसे अपने चचेरे भाई की भी हत्या करवानी पड़ी जो कि सिकन्दर के प्रतिद्वंदी के रूप में सामने आ रहे थे।

अंततः सिकन्दर इतना प्रतिभावान, साहसी था जितना उसको शासक बनने के लिए काफी था, फलतः सिकन्दर ने अपना राज्यारोहण करा कर मकदूनिया का शासक 336 ई०पू० में बन बैठा।

राज्यारोहण के बाद सिकन्दर:-

सिकंदर अपने प्रतिद्वंदियों का अंत कर शासक बनने के उपरांत अपने विश्व विजेता बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर हुआ तथा एक के बाद एक विजय अभियान किये।

सिकन्दर द्वारा की गई विजयें व साम्राज्य / Alexander the great empire:-

उसने सबसे पहले आस पास के क्षेत्रों को जीता जो फिलिप की मृत्यु से विद्रोह करने तथा खुद को स्वतंत्र घोषित करने लगे थे। धीरे धीरे सिकन्दर की सेना विजित क्षेत्र के साथ साथ बडी होती जा रही थी।

उसने पहले ई०पू० 335 में थ्रासियन जनजाति को पराजित करके मेक्डोनिया के उत्तरी सीमा को सुरक्षित किया। उत्तरी अभियान के पूर्ण होने के बाद उसने दक्षिणी क्षेत्रों की ओर ध्यान दिया। ग्रीस के थेबेस शहर पर उसने अपना वर्चस्व स्थापित किया। थेबेस विजय के बाद डर के एथेंस के साथ साथ अन्य शहर भी ग्रीस से संधि कर लिए।

इसके पश्चात उसने एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की देश) पर विजय हासिल की।

इसके बाद उसने पर्सिया अथवा फारस पर आक्रमण किया तथा वहाँ के साम्राज्य को, जो कि हखामनी वंश के शासक अन्तर्जरक्सीज तृतीय (दारा तृतीय या डेरियस तृतीय) के शासनाधीन था, उसको विजित कर लिया।

कहा जाता है सिकंदर के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण और बड़ी विजय थी क्योंकि यह साम्राज्य उसके मेसिडोनियन साम्राज्य के 40 गुना था जिसमें वर्तमान के ईरान, इराक, सीरिया, तथा तत्कालीन भारत की पश्चिमोत्तर सीमा तक का क्षेत्र आता था। यहाँ सिकंदर ने अन्तर्जरक्सीज तृतीय को कई बार (लगभग 3 बार) पराजित किया।

सिकंदर की ऐसी वीरता देखकर दारा तृतीय या अन्तर्जरक्सीज III ने अपनी पुत्री रुक्साना का विवाह सिकंदर से कर दिया।  फारस में उसे एस्कंदर-ए-मक्दुनी अथवा मॅसेडोनिया का अलेक्ज़ेंडर कहा जाता है।

इस महत्वपूर्ण विजय के बाद सिकंदर मिस्र पर विजय पाने के उद्देश्य से वर्तमान के जॉर्डन, लेबनान तथा साउदी अरब के क्षेत्रों को जीतते हुए मिस्र पहुँचा। उसने 332-31 ई०पू० में मिस्र देश को तथा वहां की सभ्यता को नष्ट कर दिया।  इसी के साथ मिस्र की सभ्यता का भी अंत हो गया। वहां उसने अलेक्जेण्डरिया नामक नया नगर भी बसाया।

उसने इस शहर को तत्कालीन व्यापार व संस्कृति का नया केंद्र बनाया । कहीं कहीं उल्लेख मिलता है कि सिकन्दर वहां एक विश्वविद्यालय की भी स्थापना की।

ये सिकंदर की कुछ विशेष विजयें थीं। इनके अलावा सिकंदर ने बहुत सारी विजयें और विजय अभियान किये।

इस प्रकार सिकन्दर अपने जीवनकाल में इरान, फिनीशिया, सीरिया, मिस्र, मसोपोटेमिया, जुदेआ, गाझा, बॅक्ट्रिया और भारत में पंजाब तक के प्रदेश पर विजय हासिल की थी। 

ऐसा माना जाता है कि उस समय जितने क्षेत्रों, देशों, साम्राज्यों की जानकारी यूनानियों को थी उनमे से अधिकांश (आधे से अधिक) पर सिकंदर विजय हासिल कर लिया था। संभवतः इसी से उसको विश्व विजेता भी कहा जाता है। यह कहाँ तक न्यायसंगत है इसकी चर्चा हम प्राचीन इतिहास के अंतर्गत करेंगे।

सिकन्दर का पश्चिमोत्तर भारत पर आक्रमण :-

पर्सिया अथवा फारस (ईरान) के विशाल हखामनी साम्राज्य को विजित करने से उसे ईरानियों के माध्यम से ही भारत देश की समृद्धि का पता चला। तो फिर होना क्या था , सिकन्दर के विश्व विजेता लक्ष्य तथा उसकी लोलुप दृष्टि से पश्चिमोत्तर भारत भी न बच सका।

इसके बाद उसने बैक्ट्रिया(बल्ख) की विजय की तथा भारत पर आक्रमण की योजना बनाई और 327 ई०पू० में निकल पड़ा। बल्ख से चलकर वह काबुल के मार्ग से होते हुए हिंदुकुश पार करके कोहिदामन घाटी में प्रवेश किया।

यहाँ से वह भारतीय छोटे छोटे देशद्रोही व स्वार्थी राजाओं की मदद से आगे बढ़ा।

उसने अपनी सेना को 2 भागों में विभाजित कर कुशल नेतृत्व का परिचय दिया। सेना के एक भाग का निर्देशन करते हुए वह भारत की ओर बढ़ रहा था।

326 ई०पू० में सिकन्दर ने सिंधु नदी पार की तथा तक्षशिला की ओर बढ़ा जिस पर आम्भी का राज्य (सिंधु तथा झेलम नदी के बीच) था। आम्भी सिकन्दर के समक्ष नतमस्तक होकर अपनी कायरता का पूरा परिचय देते हुए आत्मसमर्पण कर दिया। क्योंकि वह अपने पड़ोसी वीर शासक पोरस से बदला लेना चाहता था।

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आम्भी के आत्म समर्पण करने के बाद सिकंदर अगले राज्य ,जो कि पुरु राज्य कहलाता था, उसके तत्कालीन शासक पोरस से आत्मसमर्पण की मांग की किन्तु पोरस आम्भी जैसा देशद्रोही नहीं था। उसने संदेश भिजवाया कि वह सेना समेत सीधे युद्ध के मैदान में ही सिकंदर से मिलेगा।
सिकंदर इससे क्रोधित हुआ और युद्ध के लिए निकल पड़ा। Finally लगभग बरसात के मौसम मे दोनों की सेनाएं वितस्ता (आधुनिक नाम-झेलम) के दोनों तट पर आ पहुँची।
तेज़ बारिश होने लगी तथा नदी में बाढ़ आ गयी थी। पोरस यह सोच रहा था कि वर्षा बन्द होने तथा बाढ़ कम होने के बाद सिकन्दर सेना नदी पार कराकर इस पार आएगा। किन्तु हुआ इसके विपरीत,। सिकंदर ने बरसात में ही, तथा बाढ़ आई नदी में ही अपनी सेना सामने से न उतारने के बजाय दूर बगल से उतार दिया, जिसका पोरस को अंदाज़ा नहीं था।
इससे पोरस अचानक हुए आक्रमण का सामना करने में अंततः विफल साबित हुआ। पोरस की सेना में रथ और हाथी हुआ करते थे जो कि बारिश के दलदल में नाकाम साबित हो रहे थे। वहीं दूसरी ओर सिकन्दर की सेना में तीव्रगामी घोड़े थे जो बारिश में भी युद्ध लड़ने और लड़ाने में सक्षम थे। जिसका लाभ सिकन्दर को पूर्णतया मिला।
अभी तक प्राप्त स्रोतों से यह पता चलता है कि अंततः इस झेलम या वितस्ता के युद्ध में पोरस सिकन्दर के द्वारा पराजित हुआ। हालांकि आधुनिक इतिहासकारों द्वारा यह कल्पना की जाती है कि इस युद्ध में सिकंदर विजयी नही अपितु पराजित हुआ था। जिसका विस्तार पूर्वक तर्क और वर्णन हम प्राचीन इतिहास की Catagory के अंतर्गत करेंगे।

सिकन्दर का भारत से वापस लौटना:-

पोरस से विजयी होने के पश्चात सिकंदर व्यास नदी के किनारे आ गया। जिसके उस पास विशाल नंद साम्राज्य स्थापित था। सिकन्दर की सेना अब तक युद्ध युद्ध कर कर के थक गयी थी तथा अपने घर लौटना चाहती थी। सिकंदर के बार बार जोशपूर्ण वक्तव्यों से भी उसकी सेना आगे बढ़ने  से मना करती रही।
वहीं दूसरी ओर सिकन्दर को यह समाचार मिला कि पर्सिया में विद्रोह हो रहा है तथा क्षत्रप फिलिप की हत्या कर दी गयी। सिकंदर उस विद्रोह को दबाने के लिए तुरंत लौट पड़ा।
अंततः सिकन्दर अपने द्वारा जीते गए क्षेत्र को प्रान्तों में विभाजित करके प्रत्येक पर अलग अलग प्रान्त अधिपति नियुक्त करके 324-23 ई०पू० में भारत से लौट गया। अतः भारत पर विजय न पा सका , इसी के साथ उसका विश्व विजयी होने का सपना भी पूरा न हो सका।

सिकन्दर की मृत्यु :-

वापस लौटते समय सिकंदर 323 ई०पू० में बेबीलोनिया पहुँचा। वहां उसे भीषण मलेरिया बुखार का शिकार होना पड़ा। इसी बुखार के कारण सिकन्दर जून 323 ई०पू० में बेबिलोनिया में मृत्यु को प्राप्त हो गया। वह मात्र 33 वर्ष की उम्र में इतनी विजयें हासिल की।

सिकन्दर द्वारा बसाये गए नगर:-

अपने पिता के ही शासन काल में सिकंदर ने यूनान में एक नगर अलेक्जेन्ड्रोपोलिस(Alexandropolis) की स्थापना की। यह उसके द्वारा बसाया गया प्रथम नगर था।
सिकन्दर शासक बनने के बाद जब मिस्र अभियान पर गया था तो वह मिस्र की सभ्यता को नष्ट करके अलेक्जेण्डरिया(Alexandria) 【जिसे सिकंदरिया भी कहा जाता है】 नामक नगर बसाया तथा वहां एक विश्वविद्यालय की स्थापना भी की।
सिकंदर जब भारत अभियान पर आया था तो वह 2 शहरों की स्थापना की। एक नगर उसने अपने घोड़े व्युकेफेला  (जोकि युद्ध मे मर गया था) के नाम पर ब्युकेफेलस(Bucephelus) नामक नगर बसाया जोकि वर्तमान में पंजाब,पाकिस्तान में स्थित है। दूसरा उसने निकैया(nikaiya) नामक नगर बसाया [निकाया-विजय] जो कि विजय के उपलक्ष्य में था।
इस प्रकार सिकंदर अपने जीवनकाल मे 4 नगरों की स्थापना की।

निष्कर्ष:-

इस प्रकार हम देखते हैं कि सिकंदर विश्व में ऐसा एकलौता शासक था जो विश्व विजय की कल्पना कर सका। हालांकि वह अपने इस लक्ष्य में पूर्णतः सफल न हो सका फिर भी वह तत्कालीन यूनान द्वारा ज्ञात देशों के आधे से अधिक क्षेत्र पर आधिपत्य कायम कर चुका था। ऐसा माना जाता है कि वह अपने जीवनकाल में एक भी युद्ध नही हारा। सम्भवतः इसी लिए वह सम्पूर्ण विश्व में Alexander the great (सिकंदर महान) कहलाता है। हालांकि कुछ आधुनिक विद्वानों द्वारा इसे खंडन किया जाने का प्रयास किया जाता है। फिर भी वह जिस प्रकार अपने से 40 गुना अधिक बड़े पर्सियन साम्राज्य को विजित किया यह ही उसे महान कहलाने के लिए पर्याप्त है।
संक्षिप्ततः कहें तो वह एक निर्भीक व वीर योद्धा , कुशल प्रशासक, महान शासक के रूप में सम्पूर्ण इतिहास में अमिट है।
धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलाहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय
 

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