Chandragupta maurya | चंद्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय | Chandragupta maurya ka jivan parichay | Chandragupt maurya history in hindi FOR UPSC

 आज इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको भारतीय इतिहास के एक ऐसे महान शासक से अवगत कराएंगे जिसको आज सभी जानते हैं परंतु उसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। 

हम आज आपको जिस महान सम्राट के बारे मे बताएंगे उसे भारत को सबसे पहले एकीकृत करने का गौरव प्राप्त है। उस महान सम्राट का नाम है “चन्द्रगुप्त मौर्य” (Chandragupta maurya). 

(सम्पूर्ण जानकारी के लिए पूरा लेख ध्यान से पढ़ें) यह लेख प्रतियोगी विद्यार्थियों के साथ साथ आम जनमानस के लिए भी बहुत उपयोगी है क्योंकि चन्द्रगुप्त मौर्य केवल एक राजा ही नहीं बल्कि एक प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व भी है।

Contents

चंद्रगुप्त मौर्य (Chandragupta maurya):-

चंद्रगुप्त मौर्य भारत का प्रथम महानतम सम्राट था। उसने पहली बार विखंडित भारत को एकीकृत किया तथा लगभग सम्पूर्ण भारत पर एकक्षत्र शासन सत्ता स्थापित की।

आईये जानते हैं उस महान सम्राट के बारे में―

चन्द्रगुप्त मौर्य की संक्षिप्त जानकारी (Facts about Chandragupta maurya) :-

नाम (Name) : चन्द्रगुप्त  मौर्य(Chandragupta maurya)

संबंधित वंश : मौर्य वंश(Maurya Dynasty) (संस्थापक)

 अन्य नाम : ऐंड्रोकोट्टस, सैंड्रोकोट्टस (यूनानियों द्वारा वर्णित)

उपाधि : सम्राट

जन्म (Date of Birth of chandragupt) : 340 ई०पू० [अनुमानतः] 

जन्मस्थान (birth place of chandragupta): पाटलिपुत्र, मगध (वर्तमान बिहार)

पिता का नाम (Father name of chandrgupta maurya) : सूर्यगुप्त सर्वार्थसिद्धि मौर्य

माता का नाम (Mother name of chandragupt maurya) : मुरा

पत्नी (Chandragupt maurya Wife) : दुर्धरा व हेलेना (सेल्युकस की पुत्री)

पुत्र का नाम (son of chandragupta) : बिंदुसार व जस्टिन 

शासन काल (Ruling period) : 322 ई०पू० से 298 ई०पू० 

मुख्य कार्य : भारत का एकीकरण, नंद साम्राज्य का अंत 

मृत्यु (Death of chandragupt maurya) : 298 ई०पू० (श्रवणबेलगोला, कर्नाटक)

चंद्रगुप्त मौर्य का इतिहास (chandragupt maurya history):-

चन्द्रगुप्त मौर्य को आज लगभग सभी जानते है किंतु आईये आज जानते हैं चंद्रगुप्त मौर्य के जीवनचरित्र के बारे में―

Chandragupta maurya
चंद्रगुप्त मौर्य का इतिहास

चन्द्रगुप्त मौर्य भारतीय इतिहास का महानतम सम्राट था। उसने 322 ई०पू० में नंद वंश का उन्मूलन करके मगध के राजसिंहासन को प्राप्त किया तथा मौर्य वंश की स्थापना की। उसने अब तक के विखंडित भारत को एक सूत्र में बांधकर एकीकृत किया तथा एक विशाल मौर्य साम्राज्य खड़ा किया जो कि तब तक के भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा साम्राज्य था।

बता दें कि चन्द्रगुप्त मौर्य को यूनानी लेखकों (मेगस्थनीज, जस्टिन, प्लूटार्क आदि) ने अपने ग्रन्थों में ऐंड्रोकोट्टस, सैंड्रोकोट्टस नाम से संबोधित किया है जिसकी पहचान विलियम जोन्स ने चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में की।

चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म : चंद्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय

गौरतलब है कि चंद्रगुप्त मौर्य के प्रारंभिक जीवन के संदर्भ में स्रोतों की अल्पता है। फलतः हमें उनके जन्म और प्रारम्भिक जीवन के विषय मे अधिक व स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। इसी वजह से यह विषय विद्वानों में मतभेद का एक कारण भी बना हुआ है। महत्वपूर्ण स्रोतों के अनुसार

चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ई०पू० में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में हुआ था। वे प्रारम्भ में एक बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता सर्वार्थसिद्धि नंदो के साम्राज्य में एक साधारण सी नौकरी करते थे तथा उनकी माता मुरा गृहणी के साथ साथ अन्य काम देखती थीं।

चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रारम्भिक जीवन:- चंद्रगुप्त मौर्य की कहानी

किसी कारणवश चंद्रगुप्त के जन्म के पूर्व ही उनके पिता की हत्या नन्दो द्वारा कर दी गयी अतः उनके घर की स्थिति बेहद दयनीय हो गयी थी। किन्तु ऐसी परिस्थितियों में भी  बचपन से ही उसमें उज्जवल भविष्य के सूचक महानता के समस्त लक्षण विद्यमान थे।

ऐसा उल्लेख मिलता है कि चन्द्रगुप्त किसी गंभीर कारण से बचपन से ही एक गोपालक को प्राप्त हो गया जिसने उसका पालन पोषण अपने गायों के बीच अपने बालक के समान किया।

कालांतर में उसने चंद्रगुप्त को एक शिकारी के हाथों बेच दिया तथा वहीं वह बड़ा हुआ। शीघ्र ही उसने अपने बराबर के लड़कों में प्रमुखता हासिल कर ली। प्रायः वह खुद मण्डली का राजा बनकर छोटे छोटे झगड़ो का फैसला करने का खेल खेलता था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का कुल / वंश:-

चंद्रगुप्त मौर्य के मूल वंश के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। जिसकी विस्तार से चर्चा हम प्राचीन इतिहास के अंतर्गत करेंगे क्योंकि यहां हमारा उद्देश्य उनके जीवन चरित्र की व्याख्या करना है।

उनके वंश के विषय में कुछ विद्वान उन्हें क्षत्रिय तो कुछ उन्हें शुद्र मानते हैं।

वहीं स्पूनर महोदय तो चन्द्रगुप्त मौर्य को पारसीक बता डाला जो कि अमान्य है।

पुराणों, मुद्राराक्षस समेत कई ब्राह्मण ग्रंथो में उन्हें शुद्र और निम्न कुल का बताया गया है।

इसके अलावा बौद्ध साहित्य व जैन ग्रंथ, विदेशी साक्ष्य (जस्टिन, प्लूटार्क, मेगस्थनीज) , कौटलीय अर्थशास्त्र, तथा पुरातात्विक स्रोतों में भी चंद्रगुप्त मौर्य को क्षत्रिय माना गया है जोकि अधिक समीचीन लगता है।

नंदराज द्वारा आचार्य चाणक्य का अपमान:-

जब चन्द्रगुप्त समय के साथ साथ धरती माँ की गोद मे खेलता हुआ बड़ा हो रहा था तभी दूसरी ओर सिकंदर विश्वविजय की अभियान पर था। जिससे भारत पर आक्रमण व असुरक्षा से आशंकित होकर चाणक्य नंदराज धनानंद के दरबार में उसे सचेत करने व मदद मांगने गए थे। क्योंकि उनका सपना था ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’

तभी धनानंद ने अपने रंगीन दरबार में आचार्य चाणक्य का घोर अपमान किया तथा उनकी शिखा पकड़कर महल से बाहर करवा दिया। तभी आचार्य चाणक्य ने उसके राजमहल के सम्मुख खड़े होकर अपनी शिखा खोलकर यह प्रतिज्ञा की कि ‘जब तक मैं सम्पूर्ण नंद सम्राज्य का अंत नहीं कर दूंगा मैं शांत नही रहूंगा’। उन्होंने अपनी इस प्रतिज्ञा को लक्ष्य बनाया तथा उस पर कार्यरत हो गए तथा एक ऐसे कुशल भावी सम्राट की खोज करने लगे जो उनके सपने को पूर्ण करने के योग्य हो।

आचार्य चाणक्य और चन्द्रगुप्त का योग/मिलन:-

एक बार जब चन्द्रगुप्त स्वयं अपनी मण्डली का प्रमुख बनकर फैसले करने वाला ‘राजकीलम‘ खेल खेल रहा था तभी आचार्य चाणक्य की सूक्ष्म दृष्टि उस पर पड़ी। चूंकि वे एक कुशल भावी सम्राट की तलाश में थे। फलस्वरूप उन्होंने चन्द्रगुप्त के भीतर के सारे गुण पहचान लिए तथा 1000 कार्षापण में शिकारी से उसे खरीद लिए। इस प्रकार संयोग से मिलन हुआ उस समय के सबसे विद्वान आचार्य चाणक्य से चंद्रगुप्त का।

चन्द्रगुप्त की शिक्षा दीक्षा:-

जब चाणक्य अथवा विष्णुगुप्त चंद्रगुप्त मौर्य को खरीद लिए तो वे उनको उस समय के प्रमुख शिक्षा केन्द्र तक्षशिला ले गए। क्योंकि वे उस समय तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य हुआ करते थे। चूंकि आचार्य चाणक्य स्वयं राजनीति, कूटनीति, युद्धकला इत्यादि के विद्वान थे अतः उन्होंने स्वयं चंद्रगुप्त को समस्त शिक्षाएं प्रदान की। अर्थात चाणक्य चन्द्रगुप्त के गुरु हुए।

प्रतिभावान चंद्रगुप्त शीघ्र ही समस्त गुणों में पारंगत हो गया।

चन्द्रगुप्त का सिकंदर से मुलाकात:-

तक्षशिला में सैनिक शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही चंद्रगुप्त सिकंदर से मिला जोकि उसके चाणक्य द्वारा दी जा रही सैन्य शिक्षा का ही एक अंग था।

किसी प्रस्ताव पर वाद विवाद के समय ही सिकंदर चन्द्रगुप्त की स्पष्टवादिता से क्रोधित हो गया और उसे मारने का आदेश दिया। किसी प्रकार वह वहां से जान बचाकर भाग निकला। कहा जाता है कि उसकी जान बचाने में सिकंदर के सेनापति सेल्युकस की पुत्री हेलेना ने उसकी सहायता भी की सम्भवतः यहीं से उनके मध्य प्रेम स्थापित हुआ जोकि बाद में हेलेना को चन्द्रगुप्त की पत्नी बनाया।

चाणक्य की योजना:-

कुछ ही समय मे आचार्य चाणक्य ने उसे पूर्ण शिक्षा देकर समस्त कौशलों में निपुण बना दिया था।

चाणक्य ने जिस कार्य हेतु चंद्रगुप्त को इतना तैयार किया था उसके कुछ मुख्य उद्देश्य थे-

(i) यूनानियों को देश से बाहर भगाना

 (ii) नंद साम्राज्य का अंत करके चन्द्रगुप्त को राजा बनाना

(iii) छोटे छोटे राजवंशों(टुकड़ो) में विखंडित भारत को एकीकृत करके ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का निर्माण करना

(iv) नंदो के अत्यधिक करयुक्त आततायी शासन से जनता को मुक्ति दिलाना

इत्यादि।

अब समय था चन्द्रगुप्त को चाणक्य व अपने लक्ष्य को पूरा करने का परिणास्वरूप वे दोनों इस दिशा में अग्रसर हुए।

चन्द्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियां(Achievements of chandragupt maurya):-

चंद्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियों की विस्तार से व्याख्या हम प्राचीन इतिहास के अंतर्गत करेंगे अभी संक्षिप्त में समझेंगे।

इस विषय पर विद्वानों में मतभेद है कि चंद्रगुप्त ने सर्वप्रथम यूनानियों को देश से निष्कासित किया कि नंदो का उन्मूलन किया। निष्कर्षतः यह कहा जाता है कि सर्वप्रथम चाणक्य व चन्द्रगुप्त ने नंद साम्राज्य(मगध) पर आक्रमण किया जो कि विफल रहा।

आईये आपको चन्द्रगुप्त की उपलब्धियों से अवगत कराएं―

1. मगध पर प्रथम आक्रमण:-

ऐसा कहा जाता है कि चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने एक छोटी से सेना गठित की तथा मगध पर सीधे आक्रमण कर दिए और गांव और नगर जीतते हुए आगे बढ़ने लगे। किन्तु इससे पहले नंद साम्राज्य की थोड़ी भी क्षति पहुंचा पाते वहां के लोग और नंद की विशाल सेना ने चंद्रगुप्त की सेना को नष्ट कर दिया। किसी प्रकार चंद्रगुप्त और चाणक्य अपनी जान बचाकर भागने में कामयाब हो गये।

कालांतर में उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ कि इतने विस्तृत नंद साम्राज्य से सीधे मुकाबला करना ठीक नहीं है।

अतः वे जान बचाते बचाते पंजाब-सिंध के क्षेत्र में पहुंचे।

पंजाब व सिंध विजय व यूनानियों का निष्कासन:-

चंद्रगुप्त और चाणक्य पश्चिमोत्तर भारत मे पहुंच कर वहां सिकंदर के प्रतिनिधि/क्षत्रप शासित क्षेत्र की जनता को उनके खिलाफ भड़काया और विद्रोह करा दिया। इसी का लाभ उठाकर चंद्रगुप्त ने कई अलग अलग वर्गों की सेना इकट्ठा करके सिकंदर के प्रतिनिधियों/क्षत्रपों की हत्या कर दी और पंजाब व सिंध के क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित कर लिया।

इतिहासकार जस्टिन के शब्दों में ― ,“सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् भारत ने अपनी गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंका तथा अपने गवर्नरों की हत्या कर दी। इस स्वतन्त्रता का जन्मदाता सान्ड्रोकोटस (चन्द्रगुप्त) था। वहीं जस्टिन ने चंद्रगुप्त की सेना को ‘डाकुओं का गिरोह’ कहा। 

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नंदो का उन्मूलन / मगध विजय:-

क्योंकि अब चंद्रगुप्त मौर्य के अधीन पंजाब व सिंध क्षेत्र आ गया था अतः उसे धन का स्रोत बन गया जिससे सेना इकट्ठे करने में आसानी हुई। सिंध तथा पंजाब में स्थिति सुदृढ़ करने के पश्चात चन्द्रगुप्त और चाणक्य धनानन्द शासित मगध की ओर एक बार पुनः अग्रसर हुए। धनानंद अपने विशाल सेना व अतुल संपत्ति के लिए विख्यात था किंतु वह जानता में लोकप्रिय न हो सका। क्योंकि उसने अनेकों कर जनता पर लगाये हुए था।

इस बार चाणक्य ने और अधिक योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया उन्होंने चंद्रगुप्त की मित्रता हिमालय के एक शासक पर्वतक से करा दी। जिससे पर्वतक समेत उसकी पूरी सेना का लाभ चन्द्रगुप्त को मिला।

इनकी संयुक्त सेनाओं ने अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों को भी विजित किया।

इसके अतिरिक्त चाणक्य ने धनानंद के एक मंत्री शकटार को अपनी ओर मिला लिया था जिससे उन्हें समस्त गुप्त जानकारियाँ मिलती थीं।

सीमावर्ती क्षेत्रों को जीतते हुए चंद्रगुप्त और पर्वतक की सेनाएं मगध की राजधानी पाटलिपुत्र की ओर कूच करके पाटलीपुत्र को घेर लिया। नंद नरेश धनानंद तथा सेनापति भद्रसाल मगध की ओर से संयुक्त सेना का सामना किया। किन्तु चंद्रगुप्त की सेना व साहस के आगे न टिक सके। अंततः चन्द्रगुप्त मौर्य ने नंदो को पराजित कर उन्मूलित कर दिया।

मौर्य वंश व साम्राज्य की स्थापना:-

नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को पराजित करने के पश्चात चंद्रगुप्त मौर्य ने एक नए वंश की स्थापना की जिसे मौर्य वंश कहा गया। इस वंश का राजकीय चिन्ह मयूर था तथा राजभाषा पाली थी।

ऐसा कहा जाता है कि चंद्रगुप्त की मां का नाम मुरा था इसीलिए उसे मौर्य कहा गया तथा उसने मौर्य वंश की स्थापना भी की।

चंद्रगुप्त द्वारा स्थापित यह प्रथम वंश था जिसके शासकों ने सम्पूर्ण भारतवर्ष पर एकक्षत्र राज्य स्थापित किया।

चंद्रगुप्त द्वारा की गई अन्य विजयें:-

शासक बनने के बाद भी चंद्रगुप्त मौर्य की विजयों का सिलसिला जारी रहा। उसने वंश की स्थापना के बाद एक सम्पूर्ण भारत को एकीकृत करने की दिशा में कदम बढ़ाया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने कई विजय अभियान किये।

सेल्युकस निकेटर से युद्ध व संधि :-

सिकंदर की मृत्य के पश्चात उसके पूर्वी प्रदेशों का क्षत्रप नियुक्त हुए उसका योग्यतम सेनापति सेल्युकस। उसने बेबीलोन तथा बैक्ट्रिया को जीतकर पर्याप्त शक्ति अर्जित की तथा निकेटर(विजेता) की उपाधि ग्रहण की। अब वह अपने पूर्ववर्ती शासक (सिकंदर) द्वारा जीते गए प्रदेशों (जिसको चंद्रगुप्त ने यूनानियों से मुक्त करा लिया था) को जीतने के लिए उत्सुक था। इसी उद्देश्य से उसने लगभग 305 ई०पू० में भारत के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के विरुद्ध अभियान किया किन्तु इस बार स्थिति कुछ और थी। परिणाम यह हुआ कि सेल्युकस निकेटर की हार हुई तथा एक संधि हुई।

इसके अंतर्गत

i. सेल्युकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त मौर्य से किया।

ii. अपना एक राजदूत मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबारी सेवा में भेजा।

iii. सेल्युकस ने हेरात, काबुल, कांधार, बलूचिस्तान ये 4 प्रान्त चंद्रगुप्त मौर्य को दिए।

iv. चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस को 500 हाथी उपहार में दिए।

इस विजय के साथ ही चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य हिंदुकुश पर्वत तक फैल गया।

पश्चिमी भारत की विजय:-

इस घटना की सूचना जूनागढ़ अभिलेख से प्राप्त होती है इसके अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का गवर्नर पुष्यगुप्त वैष्य था उसने गिरनार प्रांत में सुदर्शन झील का निर्माण करवाया । अशोक के सोपारा देख तथा गिरनार लेख से भी पश्चिम भारत पर अधिकार की पुष्टि होती है। क्योंकि अशोक इन प्रांतों को जीतने का दावा नहीं करता है तथा बिंदुसार ऐसी स्थिति में नहीं था कि वह क्षेत्रों को जीत सकें। अतः यह सभी क्षेत्र चंद्रगुप्त मौर्य के द्वारा ही जीते गए थे।

दक्षिण भारत की विजय:-

दक्षिण भारत की विजय के विषय में जानकारी अशोक के लेखों तथा जैन व तमिल स्रोतों से मिलती है। तमिल लेखक मामुलनार ने लिखा है कि मोरियर (मौर्य) जाति ने दक्षिण भारत पर विजय हासिल की । इसके अतिरिक्त चंद्रगुप्त ने अपनी अंतिम सासें श्रवणबेलगोला में ली। कोई व्यक्ति वहीं मरने जा सकता है जहां उसका स्वयं का अधिकार हो। अतः चंद्रगुप्त मौर्य ने इस अभियान में कर्नाटक तक के क्षेत्रों को विजित किया।

साम्राज्य विस्तार / विशाल साम्राज्य की स्थापना:-

चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश की स्थापना की तथा कई विजयों के परिणामस्वरूप एक ऐसे साम्राज्य का गठन किये जो कि आचार्य चाणक्य के सपने को लगभग पूर्ण कर दिया। चंद्रगुप्त ने अब तक के मगध के साम्राज्यों में सबसे बड़ा सम्राज्य स्थापित किया जिससे कि भारत विदेशी आक्रमणकारियों से पूर्णतः सुरक्षित होकर प्रगतिशील रह सके। चंद्रगुप्त मौर्य ने जिस विशाल साम्राज्य की नींव डाली उस पर परवर्ती शासक अशोक ने विशाल इमारत तैयार की।

संक्षिप्ततः कहें तो चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य उत्तर पश्चिम में हिंदुकुश से लेकर उत्तर में वर्तमान लद्दाख, उत्तराखंड उत्तरी उत्तर प्रदेश से होते हुए पूर्व में मगध (वर्तमान- बिहार, पश्चिम बंगाल, आधा बांग्लादेश) तथा दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक तक तथा पश्चिम में गुजरात, बलूचिस्तान तक विस्तृत था।

चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा किये गए अन्य लोकोपकारी कार्य:-

चंद्रगुप्त मौर्य एक लोक कल्याणकारी शासक था जो कि घनानंद की कार्य युक्त आदत आई शासन से जनता को न केवल मुक्ति दिलाई बल्कि करो को कम करके उन्हें राहत प्रदान किया।

इसके साथ ही उसने अपने शासनकाल में यात्रा हेतु विशाल राजमार्गों का निर्माण करवाया , किसानों के सिंचाई की सुविधा हेतु सौराष्ट्र में सुदर्शन झील का निर्माण करवाया तथा अनेकों लोक कल्याणकारी कार्य किए।

चंद्रगुप्त मौर्य का अंतिम समय:-

चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में मगध में 12 वर्षीय अकाल पड़ गया। इसी बीच इसने 298 ईसा पूर्व में अपना पद त्याग किया तथा अपने पुत्र बिंदुसार को शासन सत्ता प्रदान की।

यदि जैन अनुश्रुतियों की माने तो जीवन के अंतिम चरण में चंद्रगुप्त मौर्य जैन आचार्य भद्रबाहु से शिष्यत्व ग्रहण करके उसके साथ श्रवणबेलगोला चला गया तथा चंद्रगिरी पहाड़ी पर काया क्लेश द्वारा अपने प्राण त्याग दिए।

चंद्रगुप्त मौर्य का धर्म:-

यदि बात करें चंद्रगुप्त मौर्य की धर्म की तो वह वास्तव में ब्राह्मण धर्मावलंबी शासक हुआ करता था। किन्तु जीवन के  अंतिम समय में भद्रबाहु नामक जैन भिक्षुक के साथ कर्नाटक के श्रवणबेलगोला जाने की तथा संलेखना द्वारा प्राण त्यागने की घटना का उल्लेख मिलता है। साथ ही भद्रबाहु से शिष्यत्व ग्रहण करने की सूचना भी मिलती है। जिससे यह सिद्ध होता है कि जीवन के अंतिम समय मे जैन धर्मावलंबी हो गया था। जो भी हो यह निश्चित रूप से कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य एक धर्मनिरपेक्ष, उदार , सहिष्णु शासक था।

मूल्यांकन:-

यदि उपरोक्त वर्णन के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन चरित्र को देखें तो यह निश्चित हो जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य एक साधारण से परिवार में जन्म लेकर भारत के महान राजा बनने तक का सफर तय किया।  जो कि एक आश्चर्य से कम नहीं है।  उसको साधारण बालक से संपूर्ण भारत का सम्राट बनाने का कार्य आचार्य चाणक्य ने किया। जोकि चंद्रगुप्त मौर्य के राजपुरोहित, प्रधानमंत्री, व प्रशासन निर्माता भी हुए।

उसने अपने जीवन में जिस प्रकार छोटे-छोटे टुकड़ों में भी खंडित भारत को जीतकर संधि कर एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है यह भारतीय इतिहास में पहली बार किया गया था।

इस प्रकार यदि देखें चंद्रगुप्त मौर्य एक साहसी, वीर व महान विजेता, कुशल शासक, महान सम्राट, प्रजा करमुक्तिदाता, कुशल प्रशासक के रूप में भारतीय इतिहास में अमर है जिसे आज लगभग सभी जानते हैं।

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धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक द्वितीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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