16 संस्कार | 16 Sanskar in hindi | प्राचीन भारत में किये जाने वाले संस्कार | सनातन हिन्दू धर्म के 16 संस्कार

प्राचीन भारतीय इतिहास के उत्तर वैदिक साहित्य ‘सूत्र साहित्य’ में हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों (16 Sanskar in hindi) का उल्लेख मिलता है।

यदि और स्पष्टतः कहा जाय तो विभिन्न गृह्य सूत्रों में प्राचीन हिन्दू धर्म के संस्कारों का वर्णन किया गया है। ये भिन्न भिन्न ऋषियों व सूत्रकारों द्वारा अलग अलग ढंग से व्याख्यायित किया गया है।

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हिन्दू धर्म के 16 संस्कार : 16 Sanskar in hindi

16 संस्कार | 16 Sanskar in hindi
16 Sanskar in hindi

हिन्दू धर्म (सनातन धर्म) भारत का ही नहीं अपितु समस्त विश्व का प्राचीनतम और सर्वप्रमुख धर्म है। यह धर्म बौद्ध , जैन , ईसाई , इस्लाम या अन्य धर्मों की भांति किसी एक व्यक्ति द्वारा स्थापित नहीं किया गया अपितु यह चिर काल (सनातन) से चला आ रहा है।

गृह्य सूत्रों में वर्णित संस्कार ही हिन्दू धर्म के संस्कार माने जाते हैं। ये संस्कार व्यक्ति के जन्म से पूर्व से लेकर मृत्युपर्यन्त अंत्येष्टि तक सम्पन्न होते थे।

संस्कार का अर्थ :

संस्कार शब्द का अर्थ है- शुद्धता अथवा पवित्रता। संस्कार शब्द ‘कृअ’ धातु में ‘ध’ प्रत्यय के योग से युत्पन्न हुआ है। मुख्यतः संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों से था जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय (समाज) का पूर्ण रुप से योग्य सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके मन, मस्तिष्क और शरीर को पवित्र करने के लिए किए जाते थे, किन्तु हिंदू संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति में अभीष्ट गुणों को जन्म देना भी था। संस्कार वे क्रियाएं या रीतियाँ हैं जो योग्यता प्रदान करती हैं। 

प्राचीन भारत के संस्कारों के उद्देश्य :

प्राचीन भारतीय इतिहास के विशाल कालखंड में मनुष्य के जीवन मे संस्कारों का विशेष महत्व था। हम बता चुके हैं कि व्यक्ति के संस्कार उसके जन्म के पूर्व (गर्भाधान संस्कार) से लेकर उसकी मृत्यु के बाद (अंत्येष्टि) तक सम्पन्न होते थे। 

मनुष्य के पूर्व जन्मों के कर्मों का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर अवश्य पड़ता है। उसी कर्मों के प्रभाव के परिष्कृत करने एवं चतुर्मुखी विकास के लिए संस्कारों की सृष्टि की गयी है।

शबर का मत है कि संस्कार वह है जिसके होने से कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के योग्य हो जाता है।

तन्त्रवार्तिक के अनुसार संस्कार वे क्रियाएँ तथा रीतियां हैं जो योग्यता प्रदान करती है।

वीरमित्रोदय के अनुसार संस्कार एक विलक्षण योग्यता है जो शास्त्र विहित क्रियाओं के करने से होती है।

कुमारिल के अनुसार व्यक्ति 2 प्रकार से योग्य बनता है। प्रथम- पूर्व कर्मों के दोषों को दूर करने से तथा द्वितीय- नए गुणों के उत्पादन से।

व्यक्ति के किये गए संस्कार उसे पूर्व कर्मों के दोषों को मुक्त करके उसमें नए गुणों का उत्पादन करते हैं।

संस्कारों की संख्या : हिन्दू धर्म में कितने संस्कार होते हैं ?

संस्कारों की संख्या के विषय में विद्वानों में मतभेद बना हुआ है। अलग अलग विद्वानों द्वारा लिखे गए गृह्य सूत्रों में इनकी संख्या भिन्न भिन्न मिलती है।

गौतम ने संस्कारों की संख्या 40 बताई है। मनु ने 13 संस्कारों का उल्लेख किया है। याज्ञवल्क्य ने 10 संस्कारों का उल्लेख किया है। 

इसके अलावा पारस्पर गृह्यसूत्र के अनुसार संस्कारों की संख्या 13 , आश्वलायन गृह्यसूत्र में 11 , बौधायन गृह्यसूत्र में 13 संस्कार बताए गए हैं।  अंगिरा ने 25 संस्कार, व्यास ने व्यासस्मृति में 16 संस्कार एवं स्मृतिचन्द्रिका में भी 16 संस्कार गिनाये गये है , तथा परवर्ती अन्य स्मृतियों में भी 16 संस्कार ही देखने को मिलते हैं। 

गौतमस्मृति के 40 संस्कार –

1. गर्भाधान 2. पुंसवन 3. सीमन्तोन्नयन 4. जातकर्म 5. नामकरण 6. अन्नप्राशन 7. चौल 8. उपनयन, 9-12. चार वेदव्रत, 13. स्नान, 14. सहधर्मचारिणी संयोग, 15-19. पंचमहायज्ञ, 20-26. अष्टक, पार्वण श्राद्ध, श्रावणी आग्रहायणी, चैत्री, आश्रयुजी, 27-33. अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास्य, चातुर्मास्य, आग्रयाणेष्टि, निरुढ पशुबन्ध, सौत्रामणि, 34-40. अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र आप्तोर्याम।

प्राचीन भारतीय इतिहास में कितने संस्कार थे : 16 संस्कार

उपरोक्त मतभेदों के विवेचन के बाद वर्तमान समय में अधिकांश धर्मशास्त्रियों द्वारा संस्कारों की संख्या 16 मानी गयी है। ये निम्न हैं―

1. गर्भाधान 2. पुंसवन 3. सीमन्तोन्नयन 4. जातकर्म 5. नामकरण 6. निष्क्रमण 7 .अन्नप्रशासन 8. चूड़ाकर्म 9. कर्णवेध 10. विद्यारम्भ 11. उपनयन 12. वेदारम्भ 13. केशांत 14. समावर्तन 15. विवाह 16. अन्त्येष्टि।

सनातन / हिन्दू धर्म के 16 संस्कार :

इनके विस्तृत वर्णन निम्नवत् हैं―

1. गर्भाधान संस्कार : 

गृहस्थ जीवन में प्रवेश के बाद इसे व्यक्ति का सर्वप्रमुख कर्तव्य माना गया है। यह सभी संस्कारों में प्रथम (व्यक्ति के जन्म से पूर्व) संस्कार है जिसे व्यक्ति के माता-पिता द्वारा किया जाता है।

इस संस्कार का प्रचलन वैदिक काल से हुआ। गर्भधान संस्कार सांस्कृतिक रूप से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है

स्त्री और पुरुष के शारीरिक मिलन को गर्भाधान-संस्कार कहा जाता है। इस गर्भाधान संस्कार के अंतर्गत पुरुष द्वारा स्त्री के साथ सं*भोग करके स्त्री में शुक्राणु का निक्षेप किया जाता है। स्त्री का गर्भवती होना ही गर्भाधान कहलाता है।

गर्भाधान संस्कार का मुख्य उद्देश्य स्वस्थ, सुंदर, सुशील , गुणवान (गुणवती) , सदाचारी , मानवीय संतान का जन्म होना।

गर्भधान संस्कार के माध्यम से शास्त्र (सूत्र साहित्य) हमें यह बताता है कि मनुष्य का जन्म पशुवत न होकर वंशवृद्धि हेतु भी होना चाहिए। साथ ही यह भी बताता है कि मानसिक और शारीरिक  रूप से स्वस्थ होने और मन प्रसन्न होने पर गर्भधारण करने से संतति स्वस्थ और बुद्धिमान होती है।

➙ अलबरूनी लिखता है कि यदि वह अपनी पत्नी से सन्तान पाने के लिए सहवास करता है तो उस ब्राह्मण को गर्भाधान के लिए अग्नि पर बलि देनी होती थी, इसमें स्त्री का उपस्थित रहना अनिवार्य थी।

➙ हेमचन्द्र ने लिखा है कि विवाहोपरान्त कर्णदेव अपनी पत्नी मयल्ल देवी के साथ स*म्भोग करने लीलोपवन में गया था।

2. पुंसवन संस्कार :

यह संस्कार स्त्री के गर्भधारण के तीसरे माह में किया जाता है। इसको करने से गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास की कामना की जाती है। पुराणों के अनुसार इसका मुख्य उद्देश्य पुत्र (तेजस्वी पुत्र) की प्राप्ति था। क्योंकि प्राचीन भारतीय इतिहास के कुछ काल में समाज में पुत्रों की स्थिति  काफी महत्वपूर्ण थी ऐसा अनेक स्रोतों से विदित होता है।

इस संस्कार के तीसरे माह में (तीन माह बाद) किए जाने का मुख्य कारण यह है कि गर्भधारण के तीन माह तक शिशु के भौतिक शरीर का निर्माण प्रारंभ होने लगता है और मस्तिष्क विकसित होने लगता है। इसी समय गर्भस्थ शिशु में संस्कारों की नींव रखी जाती है।

हिन्दू मान्यता व वैज्ञानिक शोधों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति गर्भ से ही सीखना शुरू कर देता है। उदाहरण स्वरूप हम अभिमन्यु को ले सकते हैं जिसने माता द्रौपदी के गर्भ में ही रहकर चक्रव्यूह भेदन की शिक्षा पा ली थी।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कार : 

यह पवित्र संस्कार लाघ्वाश्वालायन स्मृति के अनुसार चौथे माह में , वेद व्यास स्मृति के अनुसार आठवें महीने में , शंख स्मृति के अनुसार छठवें या आठवें माह में होने की जानकारी मिलती है। क्योंकि इस मास में गर्भपात होने की संभावनाएं सबसे अधिक होती हैं।

सीमन्तोन्नयन शब्द का शाब्दिक अर्थ है- “सीमन्त” अर्थात ‘केश और ‘उन्नयन’ का अर्थ है ‘ऊपर उठाना’। इसके अंतर्गत पति अपनी गर्भिणी पत्नी के केशों को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इसलिए इस संस्कार का नाम ‘सीमंतोन्नयन संस्कार’ पड़ गया।

अधिकतर सीमन्तोन्नयन संस्कार का सम्पादन गर्भ के चौथे माह में किया जाता था जब तक शिशु का शारीरिक और मानसिक विकास प्रारम्भ हो चुका रहता है। यह एक प्रकार से गर्भ की शुद्धि प्रक्रिया है।

इस समय तक गर्भ में पल रहा भ्रूण सीखना प्रारम्भ कर देता है। इस समय जैसे मां आचरण करेगी वैसे ही संस्कार शिशु को प्राप्त होंगे। उसमें अच्छे गुण , स्वभाव , आचार-विचार , अच्छे कर्म आदि पुष्पित/पल्लवित हों इस लिए मां को उसी प्रकार आचार-विचार , रहन सहन और व्यवहार करना चाहिए। यदि मां ऐसे वातावरण में रहती है जहां अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म किए जाते हैं, तो निश्चित ही शिशु के मतिष्क और रूप पर उसका सकारात्मक असर होता है।

इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। गर्भस्थ शिशु और माता की रक्षा करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। स्त्री का मन प्रसन्न करने के लिए यह संस्कार किया जाता है।

• कहा जाता है कि भक्त प्रह्लाद की माता कयाधू को देवर्षि नारद भगवदभक्ति के उपदेश दिया करते थे. इसे प्रह्लाद ने गर्भ में ही सुनकर धारण कर लिया था।

4. जातकर्म संस्कार : 

पुत्र के जन्म के समय यह संस्कार किया जाता है। संस्कार तत्व में उल्लेख है कि पुत्र प्रसव होने पर पिता वस्त्र सहित स्नान, दानादि की क्रिया करता था। मनुस्मृति में कहा गया है कि- नाभिच्छेदन के पहले जातकर्म संस्कार किया जाता है और सोना से घी तथा मधु का मंत्रों से प्राशन कराया जाता है। इसके बाद से माता बालक को बालक को स्तनपान कराना शुरू करती है।

याज्ञवल्क्य ने भी इस संस्कार का उल्लेख किया है। विष्णुपुराण में कहा गया है कि जातकर्म संस्कार करने के पश्चात पिता विधिपूर्वक स्नान करके नान्दीमुख श्राद्ध और पूजन करता है। आश्वलायन और मित्रमिश्र का विचार है कि जब पुत्र जन्म लेता है तब उसे स्वर्ण की शलाका से पिता शहद और घी चटाता है।

अलबीरूनी लिखता है जब पत्नी बच्चा पैदा कर देती है तो तीसरा यज्ञ किया जाता है जो बच्चे के जन्म और बच्चे के पालन पोषण क्रिया के बीच में किया जाता है। यह ‘जातकर्म’ कहलाता है।

जातकर्म संस्कार के बारे में अभिलेखों में भी प्रमाण मिलते हैं। कमौली ताम्रपत्र में गहडवाल नरेश जयचन्द्र ने अपने पुत्र हरिश्चन्द्र के जातकर्म के अवसर पर पुरोहित प्रहराजशर्मन को वदेसर ग्राम दान में दे दिया था।

अनिष्टकारी कुप्रभाव बच्चे पर न पड़े इस उद्देश्य से यह संस्कार कराया जाता है। इस संस्कार का एक अन्य उद्देश्य शिशु को स्वास्थ्य, बुद्धि , और दीर्घायु प्रदान करना होता था।

5. नामकरण संस्कार : 

यह शिशु के जन्म के बाद दूसरा संस्कार होता था। सन्तान को नाम प्रदान करना ही नामकरण संस्कार है। नाम का प्रभाव व्यक्ति के चरित्र पर झलकता है।

ब्राह्मण ग्रन्थों, गृहसूत्रों आदि में नामकरण संस्कार पर विस्तार से व्याख्या की गयी है।

बौधायन गृहसूत्र में यह संस्कार बालक के जन्म के दसवें या बारहवें दिन किया जाता है।

मनु स्मृति के अनुसार जन्म से दसवें या बारहवें दिन ज्योतिष शास्त्रों में कहे गये शुभ तिथि, मुहुर्त और गुणयुक्त नक्षत्र में बालक का नामकरण संस्कार किया जाता है।

लेकिन भाष्यकार विश्वरूप और कुल्लूक के अनुसार 11वें दिन और मेधातिथि के विचारानुरूप यह संस्कार 10वें दिन होना चाहिए।

याज्ञवल्क्य ने इस संस्कार को ग्यारहवें दिन करने के लिए निर्देश दिया है।

साधारणतया यह संस्कार 11वें दिन होता था क्योंकि शास्त्रों में बच्चे के जन्म से 10 दिन तक का काल सूतक काल माना गया है। इस संस्कार में किसी मंगल घड़ी में देवपूजन , यज्ञाहुति , बलि आदि का आयोजन होता है तत्पश्चात पिता शिशु के दाहिने कान में आचार्यों द्वारा निर्धारित उसका नाम बोलता था।

अलबीरूनी लिखता है कि जब नवजात बच्चा बिस्तर से उठता है तब उसका एक नाम रखा जाता है। इस समय जो बलि दी जाती है वह नाम रखने की बलि होता है। जिसको नामकरण उत्सव कहते हैं।

अभिलेखों में भी इस संस्कार का उदाहरण मिलता है कन्नौज के महाराज जयचन्द्र ने अपने पुत्र हरिश्चन्द्र के नामकरण के संस्कारोत्सव पर (1175 ई०) महापण्डित ऋषिकेश शर्मन को दो ग्राम दान में दिये थे एवं नामकरण, जातकर्म संस्कार के तीन सप्ताह बाद किया था।

6. निष्क्रमण संस्कार : 

जन्म के बाद जब पहली बार सन्तान को घर से बाहर निकाला जाता है तो निष्क्रमण कहा जाता था। यह संस्कार जन्म के चौथे मास में होता था। उक्त मास में किसी मंगलमय तिथि को शुभ मुहूर्त में पूजा हवन आदि सम्पन्न कर सन्तान को दर के बाहर प्राकृतिक वातावरण में लाया जाता था।

तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए।

इस अवसर पर शिशु को माँ की गोद में देकर सर्वप्रथम उसे सूर्य और तत्पश्चात चन्द्रमा और अन्य नक्षत्र देवताओं का दर्शन कराया जाता है। इस अवसर पर इन्द्रादि देवताओं से प्रार्थना की जाती है कि वे बालक/बालिका की सदैव रक्षा करें।

इस संस्कार का व्यावहारिक अर्थ यह प्रतीत होता है कि एक निश्चित समय के पश्चात् बालक को दर के बाहर उन्मुक्त वायु में लाना चाहिए और यह अभ्यास निरन्तर प्रचलित रहना चाहिए।

7. अन्नप्रासन संस्कार : 

इस संस्कार शिशु की शारीरिक व मानसिक विकास व आवश्यकता की पूर्ति से संबंधित था। क्योंकि शिशु के भूख की पूर्ति माता के स्तन से प्राप्त दूध से ही हो पाना असम्भव था। अतः यह आवश्यक है कि इसके लिए अन्य खाद्य पदार्थों की भी व्यवस्था की जाए शिशु को पहली बार भोजन कराने की इस क्रिया को अन्नप्राशन संस्कार का नाम दिया गया।

अन्नप्राशन संस्कार के दिन सर्वप्रथम यज्ञीय भोजन के पदार्थ अवसरोचित वैदिक मंत्रों के साथ स्वच्छ किए और पकाए जाते थे और भोजन तैयार हो जाने के बाद वाग्देवता को आहुति की जाती थी तथा शिशु की समस्त इन्द्रियों की सन्तुष्टि के लिए प्रार्थना की जाती थी जिससे वह सुखी और सन्तुष्ट जीवन व्यतीत कर सके। इस संस्कार का महत्व था कि माता उचित समय पर शिशु को अपना दूध पिलाना बन्द कर दे।

8. कर्णवेध संस्कार : 

संस्कार के रूप में कर्णवेध तथा उससे सम्बन्धित विधि-विधानों का उद्भव आधुनिक काल में हुआ गृह्यसूत्रों में इसका उल्लेख नहीं पाया जाता। किन्तु मध्य युग में यह अनिवार्य संस्कार था देवल ने कहा है कि जिस ब्राह्मण का कर्णवेध न हुआ हो उसे श्राद्ध में आमंत्रित नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसको देखने वाले का पुण्य नष्ट हो जाता है।

यह संस्कार शिशु को सुशोभित तथा उसे अलकृत करने के निमित्त किया जाने वाला धार्मिक संस्कार था जो सन्तान के जन्म के सातवें या आठवें मास में किया जाता था। किसी शुभ दिन के पूवार्द्ध में यह संस्कार देव पूजन आदि धार्मिक क्रियाओं के साथ सम्पन्न किया जाता था।

कर्णवेध संस्कार का अर्थ होता है कान को छेदना। इसके पांच कारण हैं, पहला आभूषण पहनने के लिए, दूसरा कर्णछेदन से ज्योतिष के अनुसार राहु-केतु के बुरे प्रभाव नष्ट हो जाते हैं। तीसरा इससे एक्यूपंक्चर होता जिससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होने लगता है। चौथा इससे सुनने की शक्ति बढ़ती है और कई अन्य रोगों की रोकथाम हो जाती है। पांचवां इससे यौन इंद्रियां पुष्ट होती है।

9. चूड़ाकर्म संस्कार : चौल संस्कार

शिशु के सिर के केश को जब सर्वप्रथम काटने का आयोजन किया जाता था तब यह संस्कार चूडाकर्म कहा जाता था । इसे मुण्डन संस्कार भी कहा जाता है। 

चूडाकरण वह कृत्य है जिसमें जन्म के उपरान्त पहली बार सिर पर एक बाल गुच्छ (शिखा) रखा जाता है। मनु बौधायन, पराशर ने इस संस्कार को वेद के अनुसार पहले से तीसरे वर्ष में कर देना चाहिए। याज्ञवल्क्य ने इसे निश्चित अवधि न बताकर कुल की रीति के अनुसार करने की बात कही है।

अलबरूनी लिखता है कि बच्चे का प्रथम बार बाल कटवाने का उत्सव तीसरे वर्ष में मनाया जाता था। विक्रमांकदेव चरित में भी चौलकर्म संस्कार का उल्लेख मिलता है। इस संस्कार से बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। साथ ही शिशु के बालों में चिपके कीटाणु नष्ट होते हैं जिससे शिशु को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है।

इस संस्कार का प्रयोजन दीर्घ आयु तथा कल्याण की प्राप्ति था, इस संस्कार में शिखा को छोड़कर सिर के केश मुण्डन करवा दिये जाते थे। प्रायः यह संस्कार देवालायों में सम्पन्न किए जाते थे जहाँ विधिपूर्वक हवन पूजन के साथ मातृकाओं और देवों की स्तुति की जाती थी। हिन्दू समाज में आज भी मुण्डन संस्कार का आयोजन बड़े ही विधि-विधानपूर्वक तथा प्रसन्नता के साथ किया जाता है।

10. विद्यारम्भ संस्कार : 

सन्तान की अवस्था जब पाँच वर्ष की होती थी तब उसे शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जाती थी। इस संस्कार के द्वारा यह प्रयास किया गया है कि धर्म के हर व्यक्ति को अपने धर्म का वैज्ञानिक ज्ञान होना चाहिए। यह जीवन के चतुर्खी विकास के लिए बहुत उपयोगी हैं। यह संस्कार सन्तान के जन्म के 5वें से 8वें वर्ष के मध्य किया जाता था।

किसी भी शिक्षा को ग्रहण करने के लिए पहले एक बालक को अक्षर तथा भाषा का ज्ञान करवाना अति-आवश्यक होता है। इसलिये इस संस्कार के माध्यम से माता-पिता व अन्य संबंधी उसे मौखिक भाषा, अक्षर, लेखन तथा अन्य प्रारम्भिक ज्ञान देते थे।

बालक की अवस्था जब पाँच वर्ष की हो जाती थी तब उसे शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जाती थी, अर्थात् पहले पहल बच्चे द्वारा वर्णाक्षर सीखा और पढ़ा जाना विद्यारम्भ संस्कार कहा जाता था। यह संस्कार प्रायः चौल संस्कार के बाद ही किया जाता था।

किसी शुभ मुहूर्त में शिक्षक के द्वारा पट्टी पर तथा स्वस्तिक के साथ वर्णमाला स्वर तथा व्यंजन लिखे जाते थे । सूर्य उत्तरायण रहने पर शुभ दिन और शुभ मुहूर्त में विनायक, सरस्वती बृहस्पति देवता की पूजा की जाती थी। पूजा हवन सम्पन्न कर अक्षरारम्भ कराया जाता था।

11. उपनयन संस्कार अथवा यज्ञोपवीत संस्कार : 

यज्ञोपवीत का शाब्दिक अर्थ होता है ‘यज्ञ की उपवीत’।  यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है। हिन्दू समाज में उपनयन संस्कार का काफी महत्व है जिसका उद्देश्य बौद्धिक उन्नति है।

हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक  शोधों से भी ज्ञात हुआ है गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इसके बाद बालक वेदशास्त्रों के विशेष अध्ययन के लिये गुरु के समीप (गुरुकुल) जाता था।

शास्त्रों (मनु स्मृति) में इसके लिए समय का निर्धारण इस प्रकार किया गया है कि ब्राह्मण बालक का गर्भ से आठ वर्ष , क्षत्रिय का ग्यारहवे वर्ष और वैश्य का बारहवें वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार कराना चाहिए। शुद्र इससे सर्वथा वंचित रहे। साथ ही मनु ने यह भी बताया कि ब्राह्मण बालक के लिए मूञ्ज की, क्षत्रिय के लिए धनुष की डोरी की अर्थात् सन की , और वैश्य के लिए ऊन के धागे की मेखला (जनेऊ) धारण करने का विधान निर्धारित है।

इस संस्कार का उल्लेख अलबरूनी ने भी किया है तथा इसका अभिलेखों में उल्लेख नहीं मिलता है।

आज भी यह परंपरा विद्यमान है। जनेऊ यानि यज्ञोपवित में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से शिशु को बल, ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है। साथ ही उसमें आध्यात्मिक भाव जागृत होता है।

यज्ञोपवीत संस्कार के बाद जनेऊ को किसी भी परिस्थिति में अपने से अलग नहीं होने देने का निर्देश है। यदि ब्राम्हण बिना यज्ञोपवीत धारण किये भोजन करता है तो उसे प्रायश्चित करना चाहिए।

12. वेदारम्भ संस्कार : 

यह संस्कार ज्ञानार्जन से संबंधित है। इस संस्कार को गुरुकुल जाकर वेदों के अध्ययन को आरंभ करने के पूर्व किया जाता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था।

इस संस्कार के आरम्भ में मातृपूजा आभ्युदिक श्राद्ध तथा अन्य आवश्यक कृत्य किये जाते थे। इसके बाद गुरु लौकिक अग्नि की प्रतिष्ठा करता था और विद्यार्थी को बुलाकर अग्नि के पास बैठाता था। इसके बाद आहूतियों को प्रारम्भ किया जाता था। यदि ऋग्वेद आरम्भ करना होता था तो घृत की आहूतियाँ अग्नि और पृथ्वी को दी जाती थी. यदि यजुर्वेद हो तो अन्तरिक्ष और वायु को यदि सामवेद हो तो धी और सूर्य को यदि अवैद हो तो दिशाओं तथा चन्द्र को और यदि सभी वेदों का अध्ययन एक साथ आरम्भ करना होता था तो उक्त सभी आहूतियों साथ दी जाती थी। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण पुरोहित को पूर्ण पात्र और दक्षिणा देकर वेद का अध्ययन आरम्भ किया जाता था।

13. केशान्त अथवा गोदान संस्कार :

यह संस्कार विद्यार्थी के 16वें वर्ष किया जाता था। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि केशान्त (केश+अंत) अर्थात केशों का  अंत (क्षौर कर्म)। और गोदान का अर्थ ‘गाय का दान’।

इस संस्कार के अंतर्गत शिक्षार्थी का दाढ़ी , बाल , शिखा आदि समेत सम्पूर्ण सिर का मुंडन कर दिया जाता था तथा  तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था। तदुपरांत ब्रम्हचारी विद्यार्थी अपने गुरुदेव को एक गाय का दान करता था।

14. समावर्तन संस्कार : 

यह संस्कार शिक्षा की समाप्ति पर किया जाता था। समावर्तन शब्द का अर्थ वेदाध्ययन के पश्चात् गुरुकुल से घर की और प्रत्यावर्तन। यदि कोई बालक अपने ही पिता से शिक्षा प्राप्त करता था तो उसका समावर्तन संस्कार नहीं होता था।

समावर्तन के समय ब्रह्मचारी गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा देते थे तथा घर जाने की अनुमति लेते थे। समावर्तन संस्कार केवल उन्हीं का किया जाता था जो अपने सम्पूर्ण अध्ययन की समाप्ति तथा व्रतों का पालन कर चुकते थे।

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गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति को फिर से समाज में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसके बाद व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था। इसका आशय  ब्रह्मचारी व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया जाना था।

आज गुरुकुल परम्परा समाप्त हो गई है, इसलिए यह संस्कार अब नहीं  किया जाता है।

15. विवाह संस्कार : 

हिन्दू संस्कृति में स्त्री व पुरूष दोनों के लिए विवाह संस्कार बहुत महत्वपूर्ण है। विवाह के बाद ही व्यक्ति जीवन के विस्तृत क्षेत्र में प्रवेश करता है। गृहस्थ जीवन का वास्तविक प्रारम्भ यहीं से माना जाता है।

वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृहस्थ्य जीवन में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में विवाह को धार्मिक संस्कार माना गया है, इसमें धर्म का स्थान प्रधान है। यज्ञ होम, मन्त्रपाठ, देवताओं का आवाहन तथा वेद मन्त्रों के साथ वैवाहिक क्रिया सम्पन्न करना हिन्दू विवाह संस्कार के प्रधान अंग है । मनु ने विवाह के आठ प्रकारों की चर्चा की है।

इस संस्कार का प्रमुख उद्देश्य धर्म का पालन , पुत्र/पुत्री प्राप्ति व रति सुख था।

16. अंत्येष्टि संस्कार : 

अन्त्येष्टि मनुष्य का अन्तिम संस्कार है जो उसकी मृत्यु के बाद किया जाता है। इसमें मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर का दाह संस्कार किया जाता है। शवदाह के बाद अशौचकाल प्रारम्भ होता है जिसकी अवधि साधारणतः तेरह देनों की होती है।

पिण्डदान श्राद्धकर्म और ब्राह्मण भोजन के बाद मृतक का परिवार शुद्ध माना जाता है। अन्त्येष्टि क्रिया से सम्बन्धित ये नियम पूर्व में भी थे और आज भी है। अन्त्येष्टि संस्कार होने से व्यक्ति अपने उक्त संस्कारों के द्वारा परलोक में विभिन्न परिस्थितियों में विजय प्राप्त कर सकता है।

इस संस्कार का उल्लेख अलबरूनी , सुलेमान तथा अल-ईद्रीसी समेत अन्य विद्वानों ने भी किया है।

निष्कर्ष :

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन काल से ही हमारे धर्म ग्रंथ , जो कि ऐतिहासिक ग्रंथ भी हैं, हमें संस्कारों की शिक्षा देते आये हैं। उपरोक्त संस्कारों को यदि देखें तो हमें पता चलता है कि अगर उपरोक्त व्यवस्थाओं का पालन व्यक्ति के द्वारा यदि नियमित किया जाय तो वह एक नियमित , संयमित , अनुशाषित , समृद्ध व सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है।

किन्तु आधुनिक समय में विवाह उपनयन, अन्नप्राशन, नामकरण तथा अन्त्येष्टि नामक संस्कारों को छोड़कर अन्य संस्कार बहुत नहीं किये जा रहे हैं। साधारणतया लोग समझते हैं कि प्राचीन काल की प्रत्येक बात अन्धविश्वासपूर्ण है। किन्तु ऐसा बिल्कुल भी नहीं है , लोगों को धर्म तथा संस्कार में छिपे हुए अनुशासन, नैतिकता तथा धैर्य तथा कर्मों के उद्देश्य को समझना चाहिए।

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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