महापाषाण काल | Megalithic period | ताम्रपाषाण काल | Chalcolithic period | सिंधु घाटी सभ्यता | Indus Valley civilization

महापाषाण काल (Megalithic period)

नवपाषाण काल (Neolithic age) के बाद दक्षिण भारत में महापाषाण संस्कृति (Megalithic culture) का विकास हुआ। पत्थर की बड़ी-बड़ी कब्रों को महापाषाण कहा जाता था। इनमें मानवों को दफनाया जाता था।

◆ इस काल में लोग सामान्य तौर पर पहाड़ों की ढलान पर रहते थे। यह प्रथा दक्कन, उत्तर-पूर्वी भारत एवं कश्मीर के क्षेत्र में प्रचलित थी। यहाँ पर मिली कब्रों में लोहे के औजार, घोड़े के कंकाल तथा पत्थर के गहने भी मिले हैं।

◆ इस काल में आंशिक शवाधान की पद्धति भी प्रचलित थी जिसके तहत शवों को जंगली जानवरों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता था। ब्रह्मगिरि, आदिचन्नलूर, मास्की, चिंगलपत्तु, नागार्जुनकोंडा आदि इसके प्रमुख शवाधान केन्द्र थे।

◆ इस काल के लोग धान के साथ-साथ रागी की भी खेती करते थे। इतिहासकारों द्वारा महापाषाण काल का निर्धारण 1000 ई. पू. से लेकर प्रथम शताब्दी ई.पू. के बीच किया है।

आद्य ऐतिहासिक काल : Proto historical age

पाषाण काल (Stone age) की समाप्ति के बाद धातु युग का प्रारंभ हुआ। इसे ही आद्य ऐतिहासिक काल कहते हैं। ताम्रापाषाण काल, हड़प्पा संस्कृति (Harappan culture) , वैदिक संस्कृति (Vedic culture) को इसी के अंतर्गत शामिल किया जाता है।

गैरिक तथा लाल-काले मृदभाण्ड भी इसी काल से संबंधित हैं।

ताम्रपाषाण काल : Chalcolithic age 

◆ धातुओं में सबसे पहले ताँबे का प्रयोग हुआ। जिसका प्रयोग मानव ने लगभग 5000 ई. पू. में किया।

◆ इस काल में पत्थर एवं तांबे के उपकरणों का प्रयोग साथ-साथ किया जाता था। इसी कारण इसे ताम्रपाषाण काल संस्कृति या कैल्कोलिथिक कल्चर (Chalcolithic culture) कहा जाता है।

ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ कृषक ग्रामीण संस्कृतियाँ थीं। जो भारत में दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाई गई हैं।

अहाड़ – बनास संस्कृति : Ahar – Banas culture

◆ दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में अहाड़, बालाथल और गिलुंद में ताम्रपाषाणिक स्थल प्राप्त हुए हैं।

◆ ये पुरास्थल बनास घाटी में स्थित हैं। इसीलिए इसे बनास संस्कृति भी कहते हैं।

◆ अहाड़ का प्राचीन नाम तांबवती था क्योंकि यहाँ बड़े पैमाने पर तांबा मिलता था। इसका कालक्रम 2100 से 1500 ई.पू. के बीच निर्धारित किया जाता है। यहाँ के लोग पत्थर के बने घरों में रहते थे।

अहाड़ के पास गिलुंद में मिट्टी की इमारत बनी है जिसमें कहीं-कहीं पक्की ईंटें लगी हुई हैं।

◆ यहाँ से तांबे की बनी कुल्हाड़ियाँ, चूड़ियाँ आदि प्राप्त हुई हैं।

◆ इसके अलावा, अहाड़ संस्कृति अन्य ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों से अलग है क्योंकि दूसरे केन्द्रों पर लाल व काले मृदभांड मिले हैं, जबकि यहाँ इन मृदभाण्डों पर सफेद रंग से चित्रकारी की गई है।

कायथा एवं मालवा संस्कृति : Kayatha and Malva culture

◆ पश्चिमी मध्य प्रदेश में मालवा कायथा, एरण तथा नवदाटोली प्रमुख ताम्रपाषाणिक स्थल प्राप्त हुए हैं।

◆ नवदाटोली मध्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण ताम्रपाषाणिक स्थल है। यहाँ मिट्टी, बांस एवं फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं, साथ ही लाल-काले मृदभाण्ड भी मिले हैं जिन पर ज्यामितीय आकृतियाँ बनी हैं।

कायथा संस्कृति के मृदभांडों पर प्राक्-हड़प्पन, हड़प्पन और उत्तर हड़प्पन संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता है। यहाँ स्टेटाइट एवं कार्नेलियन जैसे कीमती पत्थरों के हार प्राप्त हुए हैं।

◆ इसी क्षेत्र में मालवा संस्कृति का भी विकास हुआ जो अपने मृदभाण्डों की उत्कृष्टता के लिए जानी जाती है।

◆ मध्य प्रदेश में कायथा, एरण तथा पश्चिमी महाराष्ट्र में इनामगांव की बस्तियाँ किलेबंद हैं।

जोर्वे संस्कृति : Jorve culture

◆ पश्चिमी महाराष्ट्र के प्रमुख ताम्रपाषाणिक स्थल अहमदनगर जिले में जोर्वे, नेवासा और दैमाबाद तथा पुणे जिले में चंदोली, सोनगांव, इनामगांव, प्रकाश तथा नासिक आदि हैं। इस सामूहिक क्षेत्र को जोर्वे संस्कृति नाम दिया गया।

नेवासा से पटसन का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।

◆ दैमाबाद से भारी मात्रा में काँसे की वस्तुएँ मिली हैं जो हड़प्पा सभ्यता का प्रभाव दिखलाती हैं। साथ ही यहाँ से गैंडा, हाथी, भैंस तथा रथ चलाते मनुष्य की आकृति मिली है।

◆ आरंभिक ताम्रपाषाणिक स्थल इनामगाँव से चूल्हों सहित बड़े-बड़े कच्ची मिट्टी के मकान एवं गोलाकार गड्ढों वाले मकान मिले हैं। यह स्थल किलाबंद एवं खाई से घिरा हुआ था। यहाँ शिल्पी लोग पश्चिमी हिस्से में रहते थे जबकि सरदार प्रायः केन्द्र स्थल में रहता था।

पूर्वी भारत के ताम्रपाषाणिक स्थल :

◆ पूर्वी भारत में गंगा के किनारे चिरांद, पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में महिषदल प्रमुख ताम्रपाषाणिक स्थल हैं। इसके अलावा बिहार में सेनुआर, सोनपुर और ताराडीह तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में में खैराडीह एवं नरहन अन्य ताम्रपाषाणिक स्थल हैं।

1200 ई.पू. के आस-पास ताम्रपाषाणिक संस्कृति का लोप हो गया, केवल जोर्वे संस्कृति 700 ई. पू. तक अस्तित्व में रही। इनके विलुप्त होने का प्रमुख कारण अत्यंत कम वर्षा एवं सूखा था।

सिंधु घाटी सभ्यता (Indus valley civilization) :

सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता उन अनेकों ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों से पुरानी है जिनका वर्णन अभी हाल ही में किया गया। लेकिन यह उन संस्कृतियों से कहीं अधिक विकसित थी।

◆ इस संस्कृति का विकास ताम्रपाषाण काल में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में हुआ।

◆ इसका नाम हड़प्पा सभ्यता पड़ा क्योंकि सबसे पहले 1921 में पाकिस्तान में हड़प्पा नामक स्थल की खुदाई की गई।

यह एक कांस्ययुगीन सभ्यता थी क्योंकि इस सभ्यता के लोगों ने तांबा और टिन को मिलाकर कांसा बनाने की तकनीक विकसित कर ली थी।

सिंधु घाटी सभ्यता का भौगोलिक विस्तार उत्तर में मांडा (जम्मू-कश्मीर) से लेकर दक्षिण में दैमाबाद (महाराष्ट्र) तक तथा पश्चिम में सुत्कांगेंडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर (मेरठ) तक था।

◆ यह सभ्यता त्रिभुजाकार स्वरूप में थी। इसका सबसे पहले पता 1826 में चार्ल्स मैसन ने लगाया। उसके बाद 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अध्यक्ष सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में दयाराम साहनी ने हड़प्पा नामक नगर का पता लगाया।

◆ आगे 1922 में राखलदास बनर्जी ने हड़प्पा सभ्यता के दूसरे महत्वपूर्ण स्थल मोहनजोदड़ो का पता लगाया।

रेडियो कार्बन C14 जैसी नवीन पद्धति के माध्यम से हड़प्पा सभ्यता का काल खण्ड 2400 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व के बीच निर्धारित किया गया।

हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे मेसोपोटामिया के प्रभाव से उत्पन्न मानते हैं जिनमें मार्टीमर, व्हीलर, गॉर्डन चाइल्ड, लियोनार्ड बूली, डी.डी. कोशांबी एवं क्रेमर आदि शामिल हैं।

फेयर सर्विस एवं रोमिला थापर जैसे विद्वान इसे ईरानी बलूची ग्रामीण संस्कृति से उत्पन्न सभ्यता मानते हैं।

◆ तीसरी विचारधारा देशी प्रभाव या सोथी संस्कृति से इसके विकास की है जिसके प्रवर्तक अमलानंद घोष, धर्मपाल अग्रवाल और ब्रिजेट ऑलचिन आदि हैं।

इस प्रकार भारतीय इतिहास की पहली नगरीय सभ्यता की शुरुआत हुई। इसके विषय में आगे की अधिक जानकारियां अगले लेखों में दी गयी हैं।

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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