Bauddha granth Aitihasik srot | प्राचीन भारतीय इतिहास के साहित्यिक स्रोत के रूप में बौद्ध साहित्य का महत्व | बौद्ध ग्रंथ : ऐतिहासिक स्रोत

Bauddha granth Aitihasik srot :  ऐतिहासिक स्रोत के रूप में बौद्ध साहित्य का योगदान 

ब्राह्मण ग्रन्थों के समान ही भारतीय इतिहास के साधन के रूप में बौद्ध साहित्य का विशेष महत्व है। सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक हैं। इनके नाम हैं-सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक।

गौतम बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने करने बाद इनकी रचना हुई। • सुत्तपिटक में बुद्ध के धार्मिक विचारों और वचनों का संग्रह है। • विनयपिटक में बौद्ध संघ के नियमों का उल्लेख है और • अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन का विवेचन है। त्रिपिटक में ईसा से पूर्व की शताब्दियों में भारत के सामाजिक व धार्मिक जीवन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। तीनों पिटकों की भाषा ‘पाली’ है।

बौद्ध ग्रन्थों में जातकों का दूसरा प्रमुख स्थान है। जातकों में बुद्ध के पूर्वजन्मों की काल्पनिक कथाएँ हैं। इनमें 549 कथाएँ हैं। लंका के इतिवृत्त महावंश और दीपवंश भी भारत के प्राचीन इतिहास पर बहुत प्रकाश डालते हैं। परन्तु इन दोनों ही ग्रन्थों में कपोलकल्पित और अतिरंजित सामग्री बहुत है। दीपवंश की रचना सम्भवत: चौथी और महावंश की पाँचवीं शताब्दी में हुई। दीपवंश और महावंश से मौर्यकाल के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है।

मिलिन्दपन्हो में यूनानी राजा मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन का दार्शनिक वार्तालाप है। इसमें ईसा की पहली दो शताब्दियों के उत्तर-पश्चिमी भारत के जीवन की झलक भी देखने को मिलती है। दिव्यावदान में अनेक राजाओं की कथाएँ हैं। इसमें अनेक अंश चौथी शती ई. तक जोड़े गए।

आर्य-मंजु-श्री-मूल-कल्प में बौद्ध दृष्टिकोण से गुप्त सम्राटों का वर्णन मिलता है। प्रारम्भिक बौद्ध धार्मिक साहित्य से हमें प्राचीन भारत के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन की जानकारी तो मिलती ही है, छठी शती ई. पू. की राजनीतिक दशा का भी पर्याप्त वर्णन उपलब्ध होता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि बौद्ध साहित्य प्राचीन भारत की एक संपुष्ट सामग्री प्रदान करते हैं। आज तक के शोधों और बौद्ध साहित्य की उपयोगिता को देखते हुए यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि अगर बौद्ध ग्रंथ ऐतिहासिक सामग्रियां न प्राप्त होती तो हमारा इतिहास (विशेषकर प्राचीन इतिहास) इतना परिष्कृत व पुष्ट न होता।

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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