Mahajanpad kaal | छठी शताब्दी ई०पू० का इतिहास | History of 600 BC in hindi | महाजनपद काल | Mahajanpada period

छठी सदी ईसा पूर्व (600 B.C.) का काल (Mahajanpad kaal) भारतीय इतिहास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण समय था। इसका महत्व इस कारण से भी है क्योंकि भारत का गौरवपूर्ण इतिहास के रूप में राजनीतिक इतिहास की शुरुआत 6ठी सदी ई०पू० से ही होती है।

महाजनपद काल : Mahajanpad kaal

इस काल में भारत राजनीतिक रूप से 16 इकाइयों में बंटा हुआ था इन्हें हम 16 महाजनपद कहते हैं। इन्ही महाजनपदों के कारण ही इस काल को इतिहासकारों ने महाजनपद काल  (Mahajanpad kaal) कहकर संबोधित किया।

बौद्ध काल | महात्मा बुद्ध का काल : 600 ई०पू०

छठी सदी ई०पू० में ही भारत की धार्मिक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन हुआ। क्योंकि इस समय तक आते आते पूर्व के वैदिक कर्मकांडो में इतनी जटिलता आ गयी थी और सामाजिक ढांचा इतना दोषपूर्ण होता जा रहा था कि इनके परिणामस्वरूप दो नए धर्म उभरकर सामने आए। हालांकि इन धर्मों के उद्भव के कारणों के बारे में हम किसी अलग लेख में विस्तार से चर्चा करेंगे। किन्तु यहां इतना समझना आवश्यक है कि बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उदय ने इस काल को धार्मिक दृष्टि से महात्मा बुद्ध का काल (Buddha period) या बौद्ध काल भी कहा जाता है। इसे जैन काल भी उतना ही प्रासंगिक और सही है जितना कि बौद्ध काल कहना।

द्वितीय नगरीकारण का काल :

इस समय हम देखते हैं कि हङप्पा सभ्यता के बाद दूसरी बार नगरीकरण का स्वरूप हमें भारत में देखने को मिलता है। इसके कई कारण इतिहासकारों ने माने हैं किंतु अभी किसी भी एक कारण पर सहमति न बन पाने के कारण विवाद की स्थिति बनी हुई है। जो भी हो यह काल भारतीय इतिहास का द्वितीय नगरीकरण का काल (Second urbanisation) कहलाता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय इतिहास के इस काल (युग) को हम छठी सदी ई०पू० का काल, बुद्ध काल, महाजनपद काल (Mahajanpad kaal) , द्वितीय नगरीकरण का काल तथा NBPW (उत्तरी काले पॉलिसदार मृदभांड) संस्कृति का काल आदि नामों से जानते हैं।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व का भारत :

यहां हम इस लेख के माध्यम से छठी सदी ई०पू० की राजनीतिक , सामाजिक , आर्थिक , धार्मिक व सांस्कृतिक स्थितियों का वर्णन करेंगे। इतिहास के इस कालखंड से सभी Exams में प्रश्न आते रहे हैं अतः इस article में बताई गई जानकारियां सभी परीक्षाओं की दृष्टि से उपयोगी होंगी।

छठी सदी ई०पू० का राजनीतिक इतिहास | राजनीतिक जीवन

षोडस महाजनपद- उत्तर वैदिक काल के अन्त तक आर्य जनों अथवा कबीलों के परिभ्रमण का युग समाप्तप्राय हो गया और वे विशिष्ट प्रदेशों में बस कर ‘जनपदों’ का रूप धारण करने लगे। छठी शताब्दी ई० पू० के उत्तरार्द्ध में, जब मगध में बौद्ध धर्म और जैन धर्म का उदय हुआ और पश्चिमोत्तर प्रदेश पर नवोदित हखामनी साम्राज्य के आक्रमण प्रारम्भ हुए, समस्त भारत ऐसे ही जनपदों में विभाजित था।

इनमें सोलह जनपदों को उनके महत्त्व के कारण ‘महाजनपद’ कहा जाने लगा था। अनेक बौद्ध और जैन ग्रन्थों में ‘षोडस महाजनपदों’ की सूची मिलती है। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय के अनुसार ये महाजनपद थे—अंग, मगध, काशी, कोसल, मल्ल, वज्ञ्जि, वत्स, चेदि, कुरु, पंचाल, मत्स्य, शूरसेन, अवन्ति, गन्धार, कम्बोज और अश्मक । इनमें कुछ की शासन व्यवस्था गणतन्त्रात्मक थी और शेष की राजतन्त्रात्मक । गणतन्त्र राज्यों में बज्जि और मल्ल संघ प्रमुख थे और राजतन्त्रों में कोसल, वत्स, अवन्ति और मगध । ये राजतन्त्र एक ओर परस्पर संघर्षरत थे तो दूसरी ओर गणतन्त्रों को आत्मसात करने की चेष्टा कर रहे थे। इनमें सफलता अन्ततोगत्वा मगध महाजनपद को प्राप्त हुई

मगध का उत्कर्ष | Rise of magadha in hindi

मगध के उत्कर्ष का प्रारम्भ हर्यक कुल के नरेश श्रेणिक बिम्बिसार (543-490 ई० पू०) से होता है। वह गौतम बुद्ध और महावीर का समकालीन था । उसने अपनी राजधानी गिरिव्रज के स्थान पर राजगृह में स्थापित की। कोसल, लिच्छवि, विदेह तथा मद्र राज्यों से विवाह सम्बन्ध करके अपनी स्थिति को दृढ किया और अंग पर विजय प्राप्त करके मगध राज्य के विस्तार को द्विगुणित किया।

उसके बाद उसके महत्त्वाकांक्षी पुत्र कुणिक अजातशत्रु ने कोसल से सफल संघर्ष किया और वज्जि तथा मल्ल गणराज्यों को पराजित कर आत्मसात किया।

उसके बाद पाटलिपुत्र के संस्थापक उदायिन् और उसके उत्तराधिकारियों ने और तदनन्तर शिशुनागवंशीय राजाओं ने राज्य किया। इस बीच में मगध ने एक-एक करके वत्स, अवन्ति और कोसल आदि को अधिकृत कर लिया था।

मगध के साम्राज्य का और विस्तार नन्दवंश के संस्थापक महापद्मनन्द के शासन काल में हुआ। पुराणों के अनुसार के वह बहुत लोभी परन्तु बलवान और परशुराम के समान क्षत्रियों का संहार करने वाला था। उसने इक्ष्वाकु, पंचाल, कौरव, हैहय एकलिंग, शूरसेन मिथिला तथा अन्यान्य राज्यों को जीतकर हिमालय और विन्ध्य के बीच एकच्छत्र राज्य किया। उसके अन्तिम उत्तराधिकारी धननन्द के समय पश्चिमोत्तर भारत पर एलेक्जेण्डर का आक्रमण हुआ जिससे उत्पन्न अव्यवस्था और असन्तोष का लाभ उठाकर चन्द्रगुप्त मौर्य नामक एक साहसी राजकुमार ने अपने गुरु चाणक्य की सहायता से अपनी शक्ति बढ़ा ली और 322 ई० पू० में मगध को अधिकृत कर लिया और फिर दौर शुरू हुआ मौर्य वंश का।

छठी शताब्दी ई०पू० के धर्म और दर्शन : Religions of 600 BC.

उत्तर वैदिक काल में यज्ञधर्म के दुरूह और व्ययशील में हो जाने और निवृत्तिमार्गी आर्येतर विचारधाराओं के प्रभाव के कारण उपनिषदीय दर्शन का उदय हुआ था। परन्तु उपनिषदों का अमूर्त ब्रह्म और शुष्क उपासना विधि सामान्य जनों के लिए रुचिकर नहीं थे। इसलिए उपनिषदीय दर्शन के साथ कुछ ऐसे सम्प्रदाय भी उदित हुए जो जनमानस के अनुकूल थे। ये सम्प्रदाय दो प्रकार के थे।

एक वे जिन्होंने वैदिक धर्म का खुला प्रतिरोध न कर किसी पुराने देवता अथवा देवी को केन्द्र बनाकर नये सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया और दूसरे वे जो वैदिक धर्म का खुला प्रतिरोध करने लगे। पहले वर्ग के सम्प्रदायों में वैष्णव और शैव सम्प्रदाय उल्लेखनीय हैं।

शैव सम्प्रदाय व वैष्णव सम्प्रदाय : शैव सम्प्रदाय का उदय उत्तर वैदिक काल में ऋग्वेदिक रुद्र द्वारा सैन्धव ‘शिव’ के तत्त्व आत्मसात कर लेने पर हुआ। श्वेताश्वतर उपनिषद् की रचना होने तक शिव ‘महादेव’ माने जाने लगे थे ।

वैष्णव सम्प्रदाय के सर्वोच्च देवता विष्णु की महत्ता के चिह्न खुद ऋग्वेद में मिलते हैं । उत्तर वैदिक काल में कुछ लोग उन्हें सर्वोच्च देवता मानते थे । उस समय उनका सम्बन्ध भक्ति के स्थान पर यज्ञधर्म से अधिक था। लेकिन वेदोत्तर काल में उनको नारायण और वासुदेव कृष्ण से अभिन्न माना जाने लगा, जिससे यह सम्प्रदाय भक्तिमार्गी होने लगा। इस सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रन्थ गीता की रचना सम्भवतः छठी पाँचवी शताब्दी ई० पू० में हुई थी। इसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए निष्काम कर्मयोग का उपदेश वर्णित है।

जैन धर्म:

वेद विरोधी धर्म में सर्वप्रथम जैन धर्म का उल्लेख होता चाहिए।

पार्श्वनाथ – जैनियों के अनुसार जैन धर्म के चौबीस तीर्थकर हुए हैं जिनमें तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की ऐतिहासिकता प्रायः मानी जाती है। वह सम्भवतः नवीं शती ई०पू० में आविर्भूत हुए थे। उन्होंने वेदों की अपौरुषेयता का खण्डन तथा अहिंसात्मक यज्ञों और जाति- व्यवस्था का विरोध किया और अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) तथा अपरिग्रह (सम्पत्ति त्याग) पर बल दिया। छठी शताब्दी ई० पू० में भगवान् महावीर ने उनके द्वारा प्रवर्तित मत को संशोधित कर के जैनधर्म का रूप दिया

महावीर स्वामी : 

जीवन और उपदेश महावीर का जन्म 568 ई० पू० में वैशाली के समीप स्थित कुण्डग्राम के एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। लिच्छवि गणाध्यक्ष चेटक की बहिन त्रिशला उनकी माता थीं। तीस वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग किया और तदुपरान्त तेरह वर्ष तक तपस्या करके जम्भियग्राम के निकट शालवृक्ष के नीचे ‘कैवल्य’ ज्ञान प्राप्त किया। अपनी आयु के शेष वर्ष (मृत्यु 527 ई० पू०) उन्होंने कोसल, अंग, वज्जि, मगध और अन्य राज्यों में धर्म प्रचार और जैन संघ को सुसंगठित करने में लगाए । उनका कहना था कि सभी सांसारिक सुख नश्वर और दुःखमूलक हैं। इस दुःख का मूल है तृष्णा और तृष्णा का मूल है कर्म का बन्धन।

इस बन्धन से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने त्रिरत्न का उपदेश दिया। पहला रत्न है सम्यक् आचरण इसके अन्तर्गत उन्होंने पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह के साथ ब्रह्मचर्य को जोड़ दिया। दूसरा रत्न है सम्यक श्रद्धा, जिसके द्वारा जीव अर्थात् आत्मा, जो संख्या में अनेक हैं, अजीव अथवा भौतिक पदार्थ के बन्धन से मुक्ति पाते हैं। तीसरा रत्न है सम्यक ज्ञान महावीर के अनुसार ज्ञान की अनेक कोटियाँ होती हैं, इसलिए कोई भी दृष्टिकोण न पूर्णतः ठीक होता है न पूर्णतः गलत इस सिद्धान्त को स्यादवाद या अनेकान्तवाद कहते हैं।

● महावीर स्वामी की जीवनी

बौद्ध धर्म:

छठी सदी ई०पू० में ही जैन धर्म के समकालीन एक अन्य वेद विरोधी धर्म उद्भूत हुआ जिसे हम बौद्ध धर्म के नाम से जानते हैं। इसके प्रवर्तक महात्मा बुद्ध थे।

महात्मा बुद्ध-

महावीर के समकालीन धर्मसुधारक गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई० पू० में आधुनिक गोरखपुर के समीप स्थित लुम्बिनी नामक वन में हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के ‘राजा’ थे। अनुश्रुतियों के अनुसार गौतम को राजपुत्रोचित शिक्षा मिली और विवाह यशोधरा अथवा गोपा नामक राजकुमारी से हुआ । लेकिन गौतम की आसक्ति सांसारिक सुखों में न थी 26 वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग कर दिया और आलार कालाम तथा रुद्दक रामपुत्त आदि धर्माचार्यों के पास रहकर साधना की और तदनन्तर उरुवेला के वन में छः वर्ष कठोर तप किया।

लेकिन इनसे भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने तपश्चर्या का परित्याग कर दिया और एक नवीन परन्तु सरलतर साधना प्रारम्भ की। इस बार वह सफल हुए और उन्हें गया के समीप एक वृक्ष के नीचे ‘सम्बोधि’ प्राप्त हुई। तब से वे ‘बुद्ध‘ कहलाए। अपने जीवन के शेष 45 वर्ष उन्होंने भी धर्म प्रचार में व्यतीत किए। सबसे पहला उपदेश उन्होंने सारनाथ (वाराणसी) में दिया था। इस घटना को ‘धर्म-चक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है। उनके शिष्यों और श्रद्धालु भक्तों में बिम्बिसार, अजातशत्रु, प्रसेनजित, उपालि, सारिपुत्त, मौद्गल्यायन तथा आनन्द आदि प्रसिद्ध है । ८० वर्ष की आयु में कुशीनगर के समीप उनका परिनिर्वाण’ हुआ ।

● गौतम बुद्ध की जीवनी

बौद्ध धर्म के सिद्धांत :

बौद्ध धर्म के अनुसार मुख्य समस्या दुःख की समस्या है जिस पर विचार कर के उन्होंने चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन किया । ये हैं दुःख, दुःख समुदय, दुःख निरोध तथा दुःख-निरोध का मार्ग।

(1) दुःख– भगवान् बुद्ध के अनुसार विश्व दुःखों से परिपूर्ण है। जन्म, जरा, के व्याधि और मृत्यु सभी दुःख हैं। जो बातें हमें सुखमय लगती हैं वे भी क्षणिक होने के कारण दुःख का कारण होती हैं

(2) दुःख-समुदाय– बुद्ध ने दुःख की समस्या पर प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धान्त के आलोक में विचार किया। इस सिद्धान्त के अनुसार हर कार्य का कोई न कोई कारण होता है। इस सिद्धान्त को दुःख की समस्या पर लागू करके उन्होंने घोषित किया कि दुःख का मूल कारण है अविद्या जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य अपने को शरीर या मन से अभिन्न मानकर रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श तथा भावनाओं में आसक्त हो जाता है। इससे दृष्णा का उदय होता है जिसके फल उसे अपने बन्धन में जकड़ लेते हैं।

(3) दु:ख-निरोध– प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धान्त के अनुसार यदि कारण को दूर कर दिया जाय तो फल अपने आप दूर हो जाता है वैसे ही जैसे रोग के कारण का निरोध कर देने पर रोग चला जाता है। इसलिए दुःख को दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि दुःख के कारण- -अविद्या, तृष्णा और कर्म के बन्धन को दूर किया जाय ।

(4) दुःख-निरोध का मार्ग– बुद्ध के अनुसार अविद्या, तृष्णा और कर्म के बन्धनों को शील, समाधि और प्रज्ञा स्कन्धों द्वारा दूर किया जा सकता है। शील अर्थात् करुणा, अहिंसा तथा मैत्री आदि से कर्म नियन्त्रित होते हैं तथा समाधि से मन में एकाग्रता आती है जिससे तृष्णा का अन्त होता है। मन की एकाग्रता से प्रज्ञा का उदय भी होता है जिससे अविद्या तिरोहित हो जाती है।

अन्य सम्प्रदाय–

वेदोत्तर काल में उपर्युक्त सम्प्रदायों के अतिरिक्त अन्य अनेक सम्प्रदायों का आविर्भाव हुआ। इनमें चार्वाक और आजीवक विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

चार्वाक वेदों की अपौरुषेयता और कर्मकाण्ड के विरोधी तथा घोर भौतिकवादी थे। आजीवक सम्प्रदाय के संस्थापक मक्खलि पुत्र गोशाल थे। अभाग्यवश उनके उपदेशों का निष्पक्ष वर्णन करने वाला कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, परन्तु उनके सम्प्रदाय की लोकप्रियता निर्विवाद है। इनके अतिरिक्त जैन और बौद्ध साहित्य में अजित केशकम्बलिन, पकुद्ध कवायन तथा सम्बय बेलद्वपुत्त अन्य अनेक धर्माचारियों का उल्लेख मिलता है। ये सब गौतम बुद्ध और महावीर के समकालीन थे।

छठी शताब्दी ई०पू० का सामाजिक जीवन :

उत्तर वैदिक काल के अन्त तक भारतीय समाज की मूलभूत रेखाएँ स्पष्ट हो गई थीं। प्रारम्भिक वेदांग और सूत्र साहित्य की रचना के समय इसको सुसंगठित रूप प्रदान किया गया। इन ग्रन्थों में आश्रम व्यवस्था और पुरुषार्थ सिद्धान्त, जो उत्तर वैदिक साहित्य में बीजरूपेण उल्लिखित हैं, पूर्णतः सुव्यवस्थित रूप में मिलते हैं।

इसके अतिरिक्त इनमें चारों वर्गों के अधिकार और कर्तव्य भी सुनिश्चित कर दिये हैं। इस व्यवस्थापन में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान मिला और शूद्रों को निम्नतम ऐसा प्रतीत होता है कि क्षत्रिय वर्ण ब्राह्मणों के उत्कर्ष से विशेष सन्तुष्ट नहीं था। इस प्रसंग में यह तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि उपनिषद् दर्शन के प्रतिपादक और वर्ण व्यवस्था के विरोधी गौतम बुद्ध एवं महावीर क्षत्रिय थे।

छठी शताब्दी ई०पू० का आर्थिक जीवन :

प्रारम्भिक सूत्र अथवा बौद्धकाल में भी भारतीय संस्कृति प्रकृत्या ग्राम्य थी, यद्यपि मुद्रा प्रणाली, लोहे के आविष्कार एवं उद्योग धन्धों की उन्नति के कारण समृद्ध व्यापारी वर्ग अस्तित्व में आता जा रहा था और कौशाम्बी, चम्पा, राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती, मथुरा तथा उज्जयिनी जैसे नगरों की संख्या बढ़ती जा रही थी।

इन नगरों के श्रेष्ठ (सेठ) स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे थे। वे उधार लेते-देते थे, लेन-देन में हुण्डियों का प्रयोग करते थे और दूरस्थ नगरों में सार्थवाहों द्वारा माल भेजते थे। वे अपने लिए विशाल और भव्य भवन बनवाते थे। जातक कथाओं में अनेक स्थलों पर ‘सत्त भूमक प्रासाद‘ (सात मज्जिल वाले मकान) का उल्लेख है। हाल ही में कौशाम्बी में उदयन के राजप्रासाद’ के अवशेष उपलब्ध हो जाने से यह भी निश्चित हो गया है कि प्रारम्भिक बौद्धकाल में ही भारतीय भवन निर्माण में पाषाण का प्रयोग करने लगे थे और मेहराब के प्रयोग से परिचित हो गए थे।

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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