सोहन संस्कृति | Sohan culture in hindi | सोहन संस्कृति की विशेषता | Soan valley culture in hindi

Sohan culture in hindi : भारत में आदि पुरापाषण कालीन संस्कृति का मुख्य केन्द्र पंजाब (पश्चिमी पाकिस्तान) में है। फलकों के साथ-साथ पेबुल उपकरण और पेबुल काल पाये गये ही हैं, हैण्डेक्स भी एक स्थान से मिले हैं। इन पेबुल उपकरण एवं फलक प्रधान संस्कृति को सोहन परम्परा कहा गया है। सिन्धु की सहायक सोहन नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में पाए जानेवाले पुरापाषाण उद्योग को सोहन संस्कृति कहा गया है। जिस प्रकार पाषाण उपकरण के तकनीकी विकास के आधार फ्रांस में एबेविलियन, शेलियन एशूलिएन तथा क्लैक्टोनियम संस्कृतियों (सभी फ्रांस के स्थान-विशेष के नाम पर) का विकास हुआ, उसी प्रकार भारत में पुरापाषाण काल के पाषाणोपकरणों के क्रमिक विकास परिलक्षित होता है।

सिन्धु की सहायक नदी है ‘सोहन’ – सोहन संस्कृति

सिन्धु नदी की एक सहायक नदी सोहन है (जो पाकिस्तान में है) जिसकी घाटी ने उत्तर भारतीय परम्परा के पुरापाषाणिक उपकरण उपलब्ध होते हैं, उन उपकरणों में चॉपर-चपिंग का बाहुल्य है। इसीलिए इसे ‘चॉपर-चपिंग’ संस्कृति भी कहते हैं। सर्वश्री डी. एन. वाडिया, के. आर. यू. टॉड तथा टी. टी. पैटर्सन प्रभृति पुरातत्ववेत्ताओं ने सोहन घाटी का पुरातात्विक अनुसंधान पर प्रारम्भिक संस्कृतियों को प्रकाशित किया। तदुपरान्त इसी परम्परा में आलफ रूफर ने सतलज की सहायक सरिता सिरसी की घाटी में भी पाषाण उपकरणों का पता लगाया। श्री धरणी सेन को यहाँ तीन वेदिकाएं उपलब्ध हुई हैं।

डॉ. वाई. डी. शर्मा ने व्यास की सहायक एक अन्य सोहन नदी की घाटी से सोहन परम्परा के पाषाणोपकरणों को ढूँढ़ा। बी. बी. लाल ने क्षेत्र में स्तुत्य कार्य किया है तथा हिमालय प्रदेश के अनेक स्थलों से पुरापाषाणिक सोहन परम्परा के पेबुल, चॉपर-चॉपिंग, हथकुल्हाड़ तथा कोर इत्यादि प्राप्त किया है। इसी प्रकार आर. वी. जोशी, जी. सी. महापात्र तथा एच. डी. सांकलिया इत्यादि पुरातत्व एवं भू-तत्ववेत्ताओं ने कांगड़ा घाटी से कश्मीर घाटी तक सोहन संस्कृति के उपकरणों का पता लगाया है।

सोहन संस्कृति के पुरास्थल – Sohan culture in hindi

इनके अतिरिक्त राजस्थान में चित्तौड़, उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर एवं इलाहाबाद, मध्य प्रदेश में नर्मदा घाटी, उड़ीसा में मयूरभंज, गुजरात में साबरमती एवं माही घाटियों तथा आन्ध्र प्रदेश में गिद्दलूर एवं नैल्लौर से भी सोहन संस्कृति के अवशेष उपलब्ध होते हैं। इससे इसे भारत में निम्न पुरापाषाणकाल का आदि चरण कह सकते हैं।

इस संस्कृति का विस्तार हिमालय क्षेत्रों में हुआ। यह संस्कृति प्रातिनूतन युग की है। इस संस्कृति का आरम्भ प्रातिनूतन युग के द्वितीय हिमावर्तन काल से होता है। सोहन नदी द्वारा निर्मित नवी सोपानों की संख्या पाँच है। इन्हीं सोपनों से सोहन संस्कृति के अवशेष मिले हैं। सर्वप्रथम डी. ढेरा और टी. टी. पैटरसन ने सोहन पाटी से प्राप्त उपकरणों को प्रकाशित कराया। सोहन नदी के प्रथम सोपान की ऊँचाई दो सौ बीच फुट और (पाँचव सोपान की ऊँचाई बीस फुट बताई गई है। इन्हीं सोपानों से सोहन संस्कृतिक के उपकरण मिले हैं।

सोहन संस्कृति की विशेषताएं –

सोहन घाटी से मिलने वाले सम्पूर्ण उपकरणों को पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है

1. प्राक् सोहन अथवा सोहन अ –

तिथिक्रम की दृष्टि से प्राक् सोहन उद्योग के उपकरण सर्वाधिक प्राचीन हैं। ये भारत के आदि पुरापाषाणकालीन संस्कृति के प्राचीनतम् उपकरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। सोहन नदी की घाटी में पाए जाने वाला मानव निर्मित प्राकृ सोहन फलक संस्कृति उद्योग के उपकरण काफी घिसे हुए बेढंगे और बड़े-बड़े हैं। ये पिण्ड के ऊपरी सतहों से प्राप्त हुए हैं। इनका काल द्वितीय हिमावर्तन काल माना गया है।

किन्तु डॉ. एच. डी. सांकलिया का विचार है कि ये सर्वप्रथम भारतीय उपकरण प्रथम हिम प्रत्यावर्तन के अन्त होते-होते बनाए गये होंगे। इन उपकरणों का निर्माण घिसे हुए बेढंगे पेबुल पत्थरों पर किया गया है। प्राक् सोहन फलक बहुत बड़े, मोटे और भद्दे हैं। फलकों की मुख्य सतहों पर चिपटे संघात का अर्ध-शंकु है। इन फलक उपकरणों के ऊपरी सतह पर बिना गढ़ा हुआ अंश या कारटेक्स इन उपकरणों का कार्यांग काफी पैना है। इन फलकों के किनारा पर किसी प्रकार का पुनर्गठन नहीं मिलता। सोहन घाटी में ‘आदिया’ और चौनतरा आदि स्थलों से प्राक् सोहन उपकरण उपलब्ध हुए हैं।

डी. टेरा ने प्राक सोहन उद्योग को केवल कालक्रम के आधार पर ही इस नाम से सम्बोधित किया किन्तु प्राक् सोहन उद्योग का रक्त सम्बन्ध बाद में विकसित आदि सोहन, अंत सोहन और विकसित सोहन उद्योग से नहीं है। डी. टेरा और पैटरसन प्राकू उद्योग को आदि सोहन उपकरणों से पूर्णतया भित्र माना है।

2. आदि सोहन (अ-ब-स)-

सोहन के प्रथम नदी सोपान से पाये गये उद्योग को सोहन उद्योग कहा गया है। इस उद्योग का काल द्वितीय प्रत्यावर्तन काल माना गया है। आदि सोहन उद्योग के उपकरण अपने पूर्ववर्ती वेल्डर (पिण्डवाले सतह) से तथा बाढ़ के द्वितीय नदी सोपान से प्राप्त हुए हैं। वहाँ से काफी घिसे हुए तथा ताजे दोनों प्रकार के उपकरण प्राप्त हुए हैं। कुछ उपकरणों पर पैटिनेशन या रासायनिक विरंजन तथा कुछ उपकरण टूटे या घिसे अवस्था में है। उपकरणों की दशा और पैटिनेशन के आधार पर पैटरसन ने आदि सोहन उपकरणों को निम्नवर्गों में विभाजित किया है। यद्यपि इस वर्ग विभाजन का तिथिक्रम या स्तर क्रम से कोई सम्बन्ध नहीं है।

वर्ग-अ में रासायनिक विरंजन है और काफी घिसे हुए उपकरणों को देखा गया वर्गव के उपकरणों पर गहरी पैटेनिशन है। लेकिन ये कम घिसे हुए उपकरण हैं। वर्ग-स के उपकरणों पर रसायनिक विरंजन भी कम है और ये उपकरण ताजे हैं। इन उपकरणों का उपर्युक्त प्रकार से विभाजन, स्तरीकरण या काल क्रमानुसार नहीं हुआ है, बल्कि उनकी दशा और पैटिनेशन के आधार पर हुआ है।

इस उद्योग के मुख्य उपकरण चिपटे आधारवाले और गोलाकार पेबुल उपकरण हैं। ये उपकरण क्वार्टनाइट पत्थरों पर बनाये गये हैं। वर्ग ‘अ’ के उपकरणों से लेकर वर्ग ‘ब’ और वर्ग ‘स’ के उपकरणों तक क्रमिक विकास स्पष्ट है। क्योंकि ये उपकरण पहले की अपेक्षा छोटे और परिष्कृत बनते गये हैं। वर्ग ‘अ’ में केवल पेबुल उपकरण ही हैं, फलक बिल्कुल नहीं है। कहा “व” में पेबुल उपकरणों के साथ कुछ फलक उपकरण भी है- वर्ग ‘स’ में पेबुल उपकरणों के साथ-साथ विकसित फलक उपकरण भी हैं

(i) चिपटे आधार वाले पेबुल उपकरण-

इन उपकरणों की निचली सतह लगभग चिपटी होती है। इसे कृत्रिम ढंग से बनाया गया है। इनमें फलकीकरण प्रायः चिपटे आधार की ओर से करवे कार्यांग का निर्माण किया गया है। इनमें फलकीकरण प्रायः एक ही तल से किया गया है। सोवियत ने इन चिपटे आधारवाले पेबुल उपकरणों को ‘चॉपर’ (Chopper) अथवा ‘स्क्रैपर‘ कहा है।

(ii) गोलाकार पेबुल उपकरण-

गोलाकार पेबुल उपकरण चिकने, गोल या अण्डाकार पेबुल को एक किनारे से गढ़कर तैयार किया जाता था। कार्यांग बनने के लिए दोनों ओर से फलकीकरण किया गया है। इन गोलाकार पेबुल उपकरणों में कुछ ऐसे उपकरण भी हैं, जिन पर फलकीकरण एक तल से दोनों तल पर एकान्तर फलकीकरण के द्वारा निर्मित हुए है, चॉपिंग उपकरण कहा गया है। इन्हीं चपटे आधारवाले और गोलकार पेबुल उपकरणों के कारण सोहन संस्कृति को चॉपर-चॉपिंग उपकरणों की संस्कृति भी कहा गया है।

3. अंत सोहन (अ-ब)-

तृतीय हिमावर्तन काल में सोहन नदी के द्वितीय सोपान से अंत सोहन उद्योग के उपकरण मिले है। इस उद्योग का अपने पूर्ववर्ती उद्योग आदि सोहन उद्योग से रक्त सम्बन्ध प्रतीत होता है। अतः आदि सोहन उद्योग अंत सोहन उद्योग एक ही परम्परा के विकसित और आरम्भिक हैं। स्तरीकरण और उपकरण प्रकार के आधार पर अंत सोहन उद्योग को वर्ग-अ और वर्ग-ब इन दो भागों में विभाजित किया गया है। द्वितीय नदी सोपान के निचले जैवेल सतह के अंत सोहन-अ के उपकरणों के साथ आदि सोहन उद्योग के उपकरण मिले थे। लेकिन ये काफी घिसे हुए अवस्था में है।

अंत सोहन वर्ग-अ में काफी पेथुल उपकरण है। उनका विकास आदि सोहन-स के पेबुल उपकरणों से हुआ प्रतीत होता है। किन्तु अंत सोहन वर्ग-अ के उपकरण आदि सोहन-स के उपकरणों से छोटे और अच्छे बने हैं। अंत सोहन वर्ग-अ में फलकों और कोरों की संख्या उपकरण हैं। इस उद्योग के ताजे और बिल्कुल बिना घिसे हुए उपकरण मुख्य रूप से फलक और ब्लेड हैं फलकों पर पुनर्गठन के चिह्न नहीं दिखायी पड़ते। अधिकांश कोर (Core) क्लैक्टर प्रकार के हैं।

4. चौन्तरा उद्योग-

सोहन घाटी के चौन्तरा नामक स्थल से सोहन संस्कृति के ‘चॉपर’, चॉपिंग उपकरणों के साथ मद्रासीन परम्परा से निर्मित हैण्डेक्स भी मिले हैं। ये उपकरण तृतीय हिमावर्तन काल के तृतीय नदी सोपान के स्तर से मिले हैं। सोहन घाटी में चैन्तरा ही एक ऐसा स्थान है जहाँ मुद्रासीय हैण्डेक्स परम्परा और सोहन पेबुल उपकरण तथा फलक परम्परा को साथ-साथ विकसित होते देखा गया है। यद्यपि दोनों परम्पराएँ एक-दूसरे सके स्वतन्त्र हैं। उपकरण प्रकार और उपकरणों की दशा के आधार पर चौन्तरा उद्योग के उपकरणों को तीन वर्गों, में विभाजित किया गया है- (1) प्राचीनतम् वर्ग, (2) मध्य वर्ग (3) नवीनतम वर्ग

5. विकसित सोहन-

सोहन घाटी की तृतीय वेदिका से किसी प्रकार के पाषाण नहीं प्राप्त हुए हैं। ‘घोरव पठान’ नामक स्थान से पुरापाषाण उद्योग के कुछ उपकरण मिले हैं। डी. टेरा ने इस स्थल से प्राप्त उपकरणों को विकसित सोहन उद्योग के अन्तर्गत रखा ये उपकरण सोहन नदी के चतुर्थ नदी सोपान से मिले हैं। इस चतुर्थ सदी सोपान का निर्माण चतुर्थ हिमार्वन काल होगा। इस उद्योग के पेबुल उपकरण आदि सोहन उद्योग के पेबुल उपकरणों से काफी मिलते-जुलते हैं। ये उपकरण अन्त सोहन उद्योग के उपकरण के भिन्न नहीं, किन्तु इनक आकार पहले के उपकरणों की अपेक्षा बहुत छोटा है।

आदि सोहन प्रकार के पेबुल उपकरण चित्तौड़, मिर्जापुर, बेलन घाटी तथा मयूरभंज (उड़ीसा) जिसे से उपलब्ध हुए हैं।

निष्कर्ष –

सोहन संस्कृति की विशेषता यह है कि इसमें उपकरण शृंखला के तीन लक्षण हैं: पेबुल कोल, पेबुल टूल, फलक निश्चित रूप से पाये गये हैं और चौन्तरा नामक स्थल को छोड़कर सोहन संस्कृति हैण्डेक्स के प्रभाव से सर्वथा मुक्त है। सम्पूर्ण सोहन संस्कृति द्वितीय हिमावर्तन काल से लेकर चतुर्थ हिमावर्तन काल तक चलती रही। मोवियस का कथन है कि “सोहन उद्योग आदि पुरापाषाण संस्कृति समूह का अंग है। इसका प्रसार उत्तरी भारत, दक्षिणी एशिया-पूर्वी. एशिया और चीन में हुआ। यह चॉपर, चॉपिंग उपकरण परम्परा इससे पूर्ववर्ती आदिम पेबुल उपकरणों से सम्बन्धित है।”

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धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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