Muhammad gori | मुहम्मद गोरी का भारत पर आक्रमण | मुहम्मद गोरी का इतिहास | History of Muhammad gori | Muhammad gori invasion in hindi

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 मुहम्मद गौरी सामान्य परिचय : Introduction of muhammad gori

मुईजुद्दीन मुहम्मद बिन साम, जिसे सामान्यतया मुहम्मद गोरी के नाम से जाना जाता है। उसके पिता का नाम बहाउद्दीन साम था। वह ‘गोर’ प्रदेश के शंसबानी वंश से सम्बन्धित था। ‘गोर’ राज्य गज़नी और हेरात के बीच पहाड़ियों पर स्थित था, जो आधुनिक अफ़गानिस्तान का पश्चिम-मध्यभाग था। 1009 ई० में गज़नी के शासक महमूद गज़नवी ने ‘गोर’ प्रदेश पर विजय प्राप्त कर ली और इसकों अधीनस्थ साम्राज्यवादी राज्य बना दिया।

Muhammad gori
मुहम्मद गौरी का इतिहास

गजनवी साम्राज्य का अंत और गोर साम्राज्य का उदय : Muhammad gori

1030 ई० में महमूद की मृत्यु के साथ ही गज़नवी साम्राज्य उसके दुर्बल उत्तराधिकारियों के अधीन तेजी से विघटित होना प्रारम्भ हुआ। ख़्वारिज्मी और गोरी दो नयी शक्तियों का उदय हुआ। ख्वारिज्मी साम्राज्य का आधार इरान था, जबकि गोरी साम्राज्य का आधार उत्तरी पश्चिमी अफगानिस्तान था। धीरे-धीरे उत्तराधिकारियों की दुर्बलता का लाभ उठाकर गोर के सरदार ख्वारिज्मी शक्तिशाली बन बैठे और अपने प्रभुत्व के लिए उनसे संघर्ष करने लगे।

उस समय गजनी की स्थिति : मुहम्मद गौरी का इतिहास

इस संघर्ष के दौरान गोर के कुत्बुद्दीन मुहम्मद एवं उसका भाई सैफुद्दीन ने कुछ समय के लिए गज़नी पर अधिकार कर लिया था। किन्तु यह अधिकार स्थायी नहीं बन सका और गज़नी के शासक बहरामशाह द्वारा सैफुद्दीन की हत्या कर दी गई। सैफुद्दीन की पराजय और हत्या के बाद उसके भाई अलाउद्दीन हसन ने गजनी नगर को खूब लूटा और इसे सात दिनों तक भयानक बदला लिया। इस कार्य से उसे “विश्व दाहक” (जहाँ सोज) की उपाधि मिली।

बहराम का पुत्र और दुर्बल उत्तराधिकारी खुसरु शाह गुज़तुर्की (तुर्क मानो) के एक दल द्वारा गज़नी से 1158 ई० में भगा दिया गया। वह भागकर पंजाब चला गया जो उस समय उसके पूर्वजों के विस्तीर्ण साम्राज्य का एकमात्र अवशेष था। गज़नी दस वर्षों तक ग्रुज तुर्कमानों के अधिकार में रही। “विश्वदाहक” अलाउद्दीन हसन का पुत्र और उसका उत्तराधिकारी सैफुद्दीन मुहम्मद ग्रुज तुर्कमानों के विरुद्ध लड़ता हुआ मरा। परन्तु उसके चचेरे भाई एवं उत्तराधिकारी गयासुद्दीन मुहम्मद ने 1173 ई० में गज़नी पर स्थायी रूप से अधिकार कर लिया और ग्रुजतुर्कों को गज़नी से भगा दिया।

1173 ई० में गजनी पर अधिकार के बाद गयासुद्दीन मुहम्मद ने अपने भाई शहाबुद्दीन मुहजुद्दीन मुहम्मद बिन साम (मुहम्मद गोरी) को गज़नी का राज्यपाल नियुक्त किया।

मुहम्मद गौरी का भारत पर आक्रमण की योजना :

जिस समय गोर और गज़नी राज्य आपस में संघर्षरत थे, ख्वारिज्म के शासकों ने मध्य एशिया में एक विशिष्ट साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। गोर के शासकों ने अन्ततः 1173 ई० में गज़नी पर अधिकार तो कर लिया, किन्तु ख़्वारिज्म की शक्ति का विरोध करना गोर के लिए संभव नहीं हो सका। [विदित हो कि खुरासान, ख्वारिज्म और गोर राज्य के बीच झगड़े की मुख्य वजह था, जिस पर ख्वारिज्म के शाह ने अन्ततः अधिकार कर लिया] अतः शहाबुद्दीन मुहम्मद बिन साम (मुहम्मद गोरी) ने साम्राज्य विस्तार के लिए उत्तरी भारत को चुना।

इस क्षेत्र में महमूद के आक्रमण पहले हो चुके थे और गोर के शासकों द्वारा गज़नी पर अधिकार किये जाने के पश्चात् उनके द्वारा उत्तरी भारत में महमूद के विजित क्षेत्रों की प्राप्ति का उद्देश्य स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत हुआ। इस प्रकार मुहम्मद गोरी के भरतीय आक्रमण का मुख्य उद्देश्य राजनैतिक था और उत्तर भारत में साम्राज्य विस्तार की इच्छा मुहम्मद गोरी के आक्रगण का मूल कारण थी।

मुईज़ुद्दीन मुहम्मद गोरी के भारतीय अभियान : मुहम्मद गौरी का आक्रमण

प्रथम भारतीय आक्रमण : 1173 ई० में गज़नी के सिंहासन पर बैठने के बाद डेरा इस्माइल के पश्चिम में स्थित गोमल दरें से होता हुआ मुहम्मद गोरी ने मुल्तान पर अपना पहला भारतीय आक्रमण 1175 ई० में किया, जहाँ करमाथियों ने महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद पुनः मुल्तान पर अधिकार कर लिया था। मुहम्मद गोरी ने पुनः उन्हें पराजित कर मुल्तान पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात 1176 ई० में उच्छ पर अधिकार कर लिया और अलीकिमजि को उच्छ प्रदान किया।

गुजरात पर मुहम्मद गौरी का आक्रमण और पराजय :

मुल्तान और उच्छ पर अधिकार करने के लिए मुहम्मद गोरी ने 1178 ई० में राजस्थान की मरुभूमि को पार करता हुआ गुजरात में प्रवेश करने का प्रयास किया लेकिन गुजरात के शासक भीम द्वितीय ने आबू पर्वत के निकट हुए युद्ध में मुहम्मद गोरी को बुरी तरह पराजित किया। मुहम्मद गोरी किसी तरह जान बचाकर अपनी सेना सहित गुजरात से भाग निकला।

पेशावर अभियान : गज़नी साम्राज्य के विरुद्ध अभियान

मुहम्मद गोरी ने अब पंजाब के मार्ग से भारत में प्रवेश करने का फैसला किया। इस दृष्टि से 1179-80 ई० में उसने फुरशोर (पेशाकर) पर आक्रमण किया, जो उस समय संभवतः गज़नी की साम्राज्य के अधीन था और उस पर विजय प्राप्त की। 1181-1184 ई० के बीच तीन महत्त्वपूर्ण अभियानों द्वारा उसने सियालकोट के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। हुसेन बिन खर्मेल को दुर्ग का अधिकारी नियुक्त किया।

1186 ई० में भारतवर्ष में गज़नवी सत्ता के अन्तिम अवशेष नष्ट करने के लिए मुहम्मद गोरी ने लाहौर पर आक्रमण कर विजय प्राप्त करके शासक खुसरो मलिक को बंदी बना लिया और गार्जिस्तान में बालाखाना नामक दुर्ग में भेज दिया जहाँ 1192 ई० में उसकी हत्या कर दी गयी। मुहम्मद गोरी ने अपने सिपहसालार (सैनिक अधिकारी) और वली अली कर्मख को लाहौर का राज्यपाल नियुक्त किया।

पृथ्वीराज चौहान से युद्ध :

लगभग इसी समय दिल्ली और अजमेर का चौहान वंशी शासक राय पिथौरा (पृथ्वीराज चौहान तृतीय) भी पंजाब पर अधिकार करने का प्रयास कर रहा था। मुहम्मद गोरी ने तबरहिन्द (भटिण्डा) पर 1189 ई० में अधिकार कर मलिक जियाउद्दीन तूलाकी को 1200 सैनिक सहित सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रदान की।

राय पिथौरा (पृथ्वीराज तृतीय) को मुहम्मद गोरी द्वारा भटिण्डा पर अधिकार बर्दाश्त नहीं हुआ फरिश्ता के अनुसार, उसने दो लाख अश्वारोही और तीस हजार हाथी लेकर, भटिण्डा की ओर कूच किया। इस प्रकार दो महत्वाकांक्षी राजाओं के बीच तबरहिन्द (भटिण्डा) पर अधिकार को लेकर संघर्ष प्रारम्भ हुआ। पृथ्वीराज चौहान को अधिकतर राजपूत राजाओं का सहयोग प्राप्त हुआ, परन्तु कन्नौज का राजा जयचन्द अलग रहा।

तराइन का प्रथम युद्ध : (1191 ई०)

दो महायोद्धा अपनी-अपनी सेना लेकर 1191 ई० में थानेश्वर के निकट तराइन के मैदान पहुँचे, जहाँ तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई० ) हुआ। इस युद्ध में मुहम्मद गोरी, पृथ्वीराज चौहान से बुरी तरह पराजित हुआ। घायलावस्था में मुहम्मद में गोरी एक खल्जी घुड़सवार की मदद से वापस गजनी लौट गया। तत्पश्चात् पृथ्वीराज चौहान की सेना ने तबरहिन्द (भटिण्डा) पर अधिकार कर लिया।

तराइन का द्वितीय युद्ध – (1192 ई०)

गज़नी पहुँचने पर मुहम्मद गोरी ने रायपिथौरा (पृथ्वीराज चौहान) से पुनः युद्ध करने की तैयारी किया अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए अपनी तैयारी पूर्ण करके मुहम्मद गोरी एक लाख बीस हजार (1,20,000) घुड़सवारों की विशाल सेना जिसमें खारबक, खर्मेल, इलाह तथा मुकल्या, ताजुद्दीन यल्हौज, कुबाचा और ऐबक जैसे प्रसिद्ध सेनानायक थे और प्रत्येक के अधीन विशाल सेना थी, के साथ 1192 ई० में पुनः भारत पर आक्रमण कर तराईन का दूसरा युद्ध (1192 ई०) पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच हुआ, जिसमें पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुईपृथ्वीराज ने हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार होकर युद्धस्थल से भागकर जान बचाने की कोशिश कि किन्तु उन्हें सरसुती (आधुनिक सिरसा, हरियाणा प्रान्त) के निकट बंदी बना लिया गया।

पृथ्वीराज के साम्राज्य के विरुद्ध अन्य विजयें :

तुर्की सेनाओं ने हांसी, सरस्वती और समाना के किलों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद तुर्की सेना ने अजमेर को अपने अधिकार में कर लिया। रायपिथौरा (पृथ्वीराज चौहान) के कुछ सिक्कों में एक तरफ तिथि और पृथ्वीराज का चित्र तथा दूसरी ओर ‘मुहम्मद साम’ शब्द अंकित मिलता है। इसकी पुष्टि एक अर्थ समकालीन संस्कृति विवरण विरुद्ध विधि-विध्वंस’ से भी होती है। इससे पता चलता है कि पृथ्वीराज को अजमेर पर कुछ समय तक शासन करने के लिए छोड़ दिया गया था। लेकिन इसके तुरन्त बाद षड्यंत्र का आरोप लगाकर मार डाला गया।

रायपिथौरा के पुत्र गोविन्दराज को कुछ समय तक मालगुजारी और स्वामीभक्ति के समस्त कर्तव्य स्वीकार्य कराकर अधीनस्थ शासक की भाँति शासन करने दिया गया। लेकिन दिल्ली में तोमर वंश के एक राजकुमार को शासक स्वीकार किया गया। इस प्रकार इन दो राजपूत वंशों की नियुक्ति द्वारा मुहम्मद गोरी ने राजपूतों की एकता को तोड़ने का प्रयास किया। इस प्रकार दिल्ली और पूर्वी राजस्थान के क्षेत्र तुर्की के शासन के अधीन होगें। इस प्रकार के शासन की व्यवस्था करके मुहम्मद गोरी वापस गज़नी लौट गया और भारतीय विजित क्षेत्रों की रक्षा की जिम्मेदारी कुत्बुद्दीन ऐबक पर छोड़ा गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा किये गए भारतीय अभियान/भारत पर आक्रमण :

तराइन का दूसरा युद्ध (1192 ई०) भारत के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण निर्णायक लड़ाई मानी जाती है। चौहानों का राज्य उत्तरी भारत का मुख्य राज्य था और इनकी हार ने उत्तरी भारत में तुर्कों की सत्ता की स्थापना को लगभग निश्चित कर दिया। कुतुबुद्दीन ने भारत में अपने स्वामी मुहम्मद गोरी की इच्छाओं की पूर्ति की। उसने 1192 ई० में हाँसी, मेरठ, बरन (आधुनिक बुलन्दशहर), रणथम्भौर पर तथा 1193 ई० में दिल्ली, 1194 ई० में कोयल (अलीगढ़) पर विजय प्राप्त की। 1194 ई० में मुहम्मद गोरी वापस भारत आया। दोआब में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कन्नौज के शक्तिशाली राजधानी गहड़वाल के राजा जयचंद को पराजित करना जरूरी था।

चंदावर का युद्ध :

मुहम्मद गोरी ने अपने 50,000 अश्वारोहियों सहित कन्नौज और बनारस की ओर कूच किया। ऐबक अग्रिम दल का सरदार नियुक्ति किया गया। 1194 ई० इटावा जिले में यमुना नदी के तट पर चंदावर नामक स्थान पर मुहम्मद गोरी और कन्नौज एवं बनारस के गहड़वाल राजा जयचंद के बीच ‘चंदावर’ का युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध में जयचन्द की पराजय हुई और वह मारा गया। यद्यपि समस्त गहड़वाल राज्य पर अधिकार नहीं किया जा सका किन्तु अनेक स्थानों पर सैनिक चौकियां स्थापित करना आसान हो गया। जैसे – बनारस और अस्नी। गहड़वाल राज्य के अनेक महत्त्वपूर्ण केन्द्र अभी भी स्वतन्त्र बने रहे जैसे – कन्नौज। 1198-99 ई० तक साम्राज्य में नहीं मिलाया जा सका।

कुतुबुद्दीन ऐबक की अन्य विजयें :

1197 ई० में ऐबक ने गुजरात और अन्हिलवाड़ के राजा भीम द्वितीय को पराजित किया और अनेक नगरों की लूट पाट की और हाँसी की मार्ग से दिल्ली वापस लौट आया। 1197-98 ई० में ऐबक ने बदायूँ पर तथा 1198-99 ई० में कन्नौज पर विजय प्राप्त थी। फ़खरे मुदव्विर के अनुसार, 1199-1200 ई० में ऐबक ने बुंदेलखण्ड में कालिंजर के दुर्ग पर आक्रमण किया, जो चंदेल परमार्दिदेव का एक मुख्य सैनिक केन्द्र था। चंदेलों को दुर्ग खाली करने का आदेश दिया गया हजारों पुरुष महिलाएं बंदी बनाये गये। तत्पश्चात् ऐबक ने कालिंजार, महोबा और खजुराहों पर अधिकार कर लिया और हसन अर्नल के अधीन सैनिक डिविजन में रखा गया।

पूर्वी भारत की ओर तुर्कों का प्रसार :

तुर्कों ने पूरब की ओर भी सफलता प्राप्त की बख्तियार खल्जी को बनारस पार के कुछ क्षेत्रों पर शासन करने के लिए ऐबक ने नियुक्त किया था। उसने इसका लाभ उठाकर बिहार पर बारम्बार आक्रमण किया और इन आक्रमणों के दौरान उसने बौद्धमठों पर आक्रमण किया तथा शिक्षा के केन्द्र नालन्दा एवं विक्रमशिला पर अधिकार कर लिया और उदण्डपुर नामक स्थान पर दुर्ग बनवाया बौद्धों की एक परम्परानुसार 1200 ई० में कश्मीर का प्रसिद्ध विद्वान् संत शाक्य श्री भद्र उदण्डपुर और विक्रमशिला के बौद्ध विहारों में आया किन्तु उसने उन्हें नष्ट पाया।

बख्तियार अब अपनी सेना के साथ बंगाल के सेन राजा राय लखमनिया (लक्ष्मणसेन) के विरुद्ध राजधानी नदियां की ओर कूच किया लक्ष्मणसेन की सारी सम्पत्ति, यहाँ तक कि पत्नी और बच्चों को भी कब्जे में कर लिया गया। बख्तियार नदियां पर स्थायी रूप से शासन नहीं करना चाहता था क्योंकि वह उसे अपने मुख्यालय के योग्य नहीं समझता था। अतः बख्तियार ने उत्तरी बंगाल में गौड़ या लखनौती (आधुनिक मालदह जिले) को अपनी राजधानी बनायी।

यद्यपि बख्तियार खल्ज़ी औपचारिक रूप से मुइज्जुद्दीन मुहम्मद गोरी द्वारा प्रान्तीय शासक बंगाल का नियुक्त किया गया था, किन्तु वह वास्तव में एक स्वतन्त्र के रूप में शासन करता रहा। उसने असम में ब्रह्मपुत्र घाटी पर आक्रमण करने की मूर्खता की। दुर्गम पहाड़ियों के बीच मार्ग में उसकी सेना भूख-प्यास से व्याकुल हो गयी। असमी सैनिकों ने उन्हें बुरी तरह पराजित किया। बख्तियार खिलजी की सोते समय हत्या कर दी गयी।

निष्कर्ष :

इस प्रकार 13वीं सही के प्रारम्भ तक पश्चिम में सिन्धु नदी से लेकर पूर्व में गंगा नदी के बीच उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों को तुर्की ने जीत लिया। इसी बीच 1203 ई० में अपने बड़े भाई गयासुद्दीन मुहम्मद जो मध्य एशिया में गोरी साम्राज्य के विस्तार में लगा हुआ था, की मृत्यु हो जाने के बाद अब वास्तव में मुहम्मद गोरी गज़नी, गोर और दिल्ली का शासक नाम में भी बन गया। परन्तु शीघ्र ही कुछ दुर्घटनाओं के कारण उसकी स्थिति संकटपूर्व हो गयी। 1205 ई० में मध्य एशिया में अंदखुई के निकट ख्वारिज्म के शाह अलाउद्दीन मुहम्मद के हाथों मुहम्मद गोरी की भीषण पराजय हुई। यह पराजय तुर्की के लिए वरदान सिद्ध हुई क्योंकि इसके कारण उन्हें मध्यस्थल में विस्तार की आशंका को तिलांजलि देनी पड़ी और उन्होंने अपनी शक्ति को एक मात्र भारत में केन्द्रित करने में लगा दिया।

मुहम्मद गोरी की मध्य एशिया में पराजय का तात्कालिक परिणाम हुआ कि उसके विरोधियों ने भारत में विद्रोह करने का साहस किया। पश्चिमी पंजाब की लड़ाकू जनजाति खोखरों ने लाहौर और गज़नी के बीज यातायात मार्ग को क्षतिग्रस्त कर दिया। विद्रोही खोखरों से निपटने हेतु मुहम्मद गोरी (1206 ई०) द्वारा भारत में किया गया अभियान अन्तिम बन गया। खोखरों की बुरी तरह पराजय हुई। गज़नी वापस लौटते समय मार्ग में 15 मार्च, 1206 ई० को सिन्धु नदी के किनारे दमयक में हत्यारों के एक दल ने उसकी हत्या कर दी। मारे गये सुल्तान के मृत शरीर को गजनी ले जाकर दफन कर दिया गया।

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मुगल शब्द का अर्थ और प्रयोग 

धन्यवाद🙏 
आकाश प्रजापति
(कृष्णा) 
ग्राम व पोस्ट किलहनापुर, कुण्डा प्रतापगढ़ , उ०प्र० 
छात्र:  प्राचीन इतिहास कला संस्कृति व पुरातत्व विभाग, कलास्नातक तृतीय वर्ष, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय

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