Purasthalo ki khoj | पुरास्थलों की खोज कैसे की जाती है ? | How to discover archaeological sites in hindi

Purasthalo ki khoj : उत्खनन एक क्रिया है जिसके द्वारा हम पुरावशेषों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। पर इस क्रिया के लिए आवश्यक है कि पहले हम पुरास्थलों का ज्ञान प्राप्त करें। आज न जाने कितने पुरास्थल इसी आशा में पड़े है कि कोई खोजी आकर हमारी भी सुधि लेगा और जो हम सदियों, सहस्राब्दियों से अपने अन्तर में इस धरती के लोगों को देने के लिए संजोए हैं। बताने के लिए मूळ स्वर में कहना चाहते हैं उसको हमसे लेगा और हमारी सुनेगा।

पर हम इस अहं अर्थ से वंचित हैं। यदि इस प्रकार का खोज किया गया तो हमारे इतिहास का स्वरूप ही कुछ और होगा। इतिहास के अध्ययन की एक विधा है स्थानीय इतिहास (Local History)। पर यह इतिहास दन्तकथाओं से ही हमें अधिक पता चलता है क्योंकि प्रत्येक स्थान का कोई लिखित इतिहास तो है नहीं किन्तु समय ने दन्तकथाओं के तथ्यों को वक्ता, श्रोता, परम्परा आदि के प्रभाव में सदा बदला है। जो होता है उसका बा आकलन यदि करना है तो वहाँ के पुरास्थलों की छाती को चीर कर ही हम देख सकते हैं। पर इन पुरास्थलों की पहचान कैसे की जाय ? यह समस्या है।

Purasthalo ki khoj

पुरातत्व के अध्ययन का यह प्रथम सोपान ही नहीं एक अहं विषय है। कई दृष्टियों से यह अहम है क्योंकि इसमें समय, समर्पित लोग, पैसा, बहुमुखी ज्ञान आदि अनेक चीजों की आवश्यकता पड़ती है। कोई भी राज्य या समाज इतना करने को तैयार नहीं है। इसी से हमारा आज भी इतिहास आधा-अधूरा है, अपनी पुरानी लीक और मात्र तर्क की उड़ान पर अधकचरे तथ्यों को जोड़कर गढ़ा गया है। भारत सरकार ने इसीलिए एक योजना के विषय में विचार किया या ग्राम-ग्राम परिमार्गण या अन्वेषण (Village-Village exploration) । कुछ कार्य शुरू भी हुआ। पर किन्ही कारणों से शैशवावस्था में ही रुक गया। जब पैदल या स्थानीय साधनों से गांव-गांव घूम कर अन्वेषण करना एक कठिन एवं दुःसाध्य कार्य था तो फिर अन्वेषण की अन्य विधियाँ क्या हो?

इस सम्बन्ध में दो विधियां सुझाई गई है अर्थात पुरास्थलों के खोज की 2 पद्धतियां हैं-

(I) परम्परागत पद्धति
(II) वैज्ञानिक पद्धति

इन्हीं दो प्रकारों से आसानी से बहुत कुछ सर्वेक्षण किया गया है और किया जाता है।

खोजी कौन हो ? : Purasthalo ki khoj

यहाँ यह जानना आवश्यक है कि सर्वेक्षणकर्ता कौन हो सकता है? इस प्रश्न का सीधा उत्तर है जिसको इस कार्य में रुचि हो । इतिहासकार ही नहीं कोई भी ऐसा कर सकता है। बक्सर में गंगा के घाट के पण्डा थे पं० सीताराम उपाध्याय जो अभी हाल में ही मरे है। कचहरी घाट पर गांजा का दम लगाए पड़े रहते थे पर अपने मित्रों को साथ लेकर रुचि के कारण बक्सर (बिहार) का चप्पा-चप्पा धूम गए थे और अपने प्रभाव, साधनों से वहाँ की पुरातात्विक सामग्रियों को एकत्रित कर एक भव्य संग्रहालय बनाए थे, प्रत्येक स्थान के पुरातात्विक केन्द्रों की सूची रखते थे और उसके बारे में स्थानीय विवरण साहित्यिक उल्लेख, नई सूझ आदि के द्वारा उसका एक परिचय अपने पास तैय्यार किये थे। वे साधन विहीन थे। अत: समर्पण उनकी सबसे बड़ी विशेषता रही।

इनके साथ क्या हो ?

खोजी के साथ उसका मित्र हो। प्रायः लोग उसको चोर उचका, पागल समझ कर भगा देते हैं। मेरा छात्र सूरज यादव बक्सर में भी अन्वेषण कर रहा था एक क्षेत्र में वहाँ उसका सम्बन्ध था। पड़ोस के लोगों ने सम्बन्धी के घर हल्ला कर दिया कि रिश्तेदार तो पागल हो गए हैं. टीले पर घूम रहे हैं। इससे दो लोग होने से ऐसी समस्या नहीं आएगी और जो कुछ एक से छूट जायगा तो दूसरा उसकी ओर आकृष्ट हो जायगा।

उनके पास क्या हो ?

खोजी या अन्वेषक के लिए आवश्यक है वहाँ अपना परिचय स्थापित करने के लिए प्रमाणपत्र या किसी परिचित का पत्र रखना कि उसको वहां के लोगों का सहयोग मिले। उसके पास उस स्थान का मानचित्र होना चाहिए, भले ही हाथ से ही बना हो, कि उसमें स्थानों का संकेत बना सके उसके साथ टेप या फीता होना चाहिए जिससे मिली हुई सामग्री या टीले का माप-जोख कर सके। साथ में नोट बुक होना चाहिए कि जो कुछ भी यह देखे उसको नोट करके तथा उसका सतही चित्र बना ले। एक कैमरा रहे तो और भी अच्छा है।

बहुत सी ऐसी चीजे है जिनका चित्र लेना पड़ता है क्योंकि अन्वेषक को रुचि देखकर गांव वाले पड़ी सामग्री को महत्व का मानकर उसे हटा देते हैं। कुछ पालीथिन के लिफाफे, कार्ड, मुतली और बड़े बैग होने चाहिए कि ऊपर जो छिटकी, बिखरी छोटी चीजें हो उसे उठाकर लिफाफे में भर सके, कागज से उस के प्राप्ति स्थान, परिवेश अपनी पहचान, लोगों के विवरण आदि का उल्लेख करके उसके साथ उसे बांध दे। यदि एक छोटी खुरपी या खन्ती रहे तो सामने गड़ी सामग्री को आसानी से निकाला जा सकता है। ऐसे हाथ से जबरदस्ती करने पर वह टूट जाता है। फिर इन सभी को एक बैग में भर कर बांध देना चाहिए।

क्या विवरण अन्वेषक तैय्यार करें?

वह नोट बुक पर स्थान, जिला और प्रान्त का नाम लिखे तथा पहुंच का मार्ग भी जिसकी वह खोज कर रहा है। उसका सतही नक्शा बनावे। वहाँ के लोगों से उस विशेष स्थान के इतिहास और मिली सामग्रियों का विवरण प्राप्त कर उल्लेख करे जो अब वहाँ उपलब्ध नहीं है। पुरास्थल के आकार, प्रकार, स्थिति और पुरावशेषों के विषय में संक्षिप्त परिचय अंकित करें। जिन सामग्रियों का संग्रह वहाँ से उसने किया हो उसका विवरण लिखे, जो अचल स्मारक हों उनका भी विवरण लिखे। यह भी नोट करे कि वह पुरास्थल किसके अधीन है। उसका मालिक उस की खुदाई या वहाँ की सामग्रियों के प्रति क्या रुख रखता है। फिर अपना नाम और तिथि उस पर अन्त में लिख दे।

पुरास्थलों के खोज की विधियाँ :

ऊपर दो विधियों का संकेत किया गया है जिनमें प्रायः प्रथम विधि का ही प्रयोग व्यवहारिक जीवन में किया जाता है क्योंकि दूसरी विधि एक तो खर्चीली है तथा दूसरे इसके प्रयोग में प्रशिक्षण की आवश्यकता है। साथ ही बहुत सटीक परिणाम उससे निकल जाय इसकी भी गारंटी नहीं दी जा सकती। फिर भी दोनों विधियों के प्रयोग को हम यहाँ देखेंगे। यह भी सूचा है कि ये दोनों विधियां अनेक प्रकार की उपविधियों में विभक्त की जा सकती हैं।

परम्परागत विधि : पुरास्थलों की खोज की विधि

इस विधि में अन्वेषक निम्न रीतियों का सहारा लेता है जो अधिक सरल, सुलभ, विशिष्ट ज्ञान रहित और कम खर्चीली हैं:

अ. सहसा प्राप्त सामग्रियों
ब. आधार पर मिली सामग्रियों
स. स्थानीय विचरण
द. साहित्यक विवरण

अ. सहसा प्राप्त सामग्रियां

प्रायः ऐसा होता है कि कहीं जाते, खेत जोतते, नींव काटते आदि किसी दूसरे कार्य को करते कोई पुरातात्विक संकते या सामग्री मिल जाती है। दलिया (उ० प्र०) के खैराडीह में कुआं खोदते समय एक दीवाल का भाग दिखाई पड़ा। इसके आधार पर मैंने डॉ० के० के० सिन्हा को खैराडीह के विषय में परिचय दिया और उस टीले को दिखाया। पटना के महुआ टोली नामक मुहल्ले में जहाँ सड़क पर पहले पटना विश्वविद्यालय का छात्रावास था यहाँ की नींव खोदते हुए आहत सिक्कों का निधान निकल गया। इसी प्रकार राजस्थान के “बयाना निधि’ की प्राप्ति हल जोतते हुए एक किसान द्वारा हुई। लखनेश्वरडीह (बलिया, उ० प्र०) में हलवाहे के हल के फाला से लग कर विष्णु की मूर्ति का निकलना, केरात में नदी के तट पर हलके फाल से लग कर शंकर की लिंग निकलना ऐसी ही घटनाएं हैं। प्रायः नींव खोदते लोगों को सिक्के मिल जाते हैं। यह बात दूसरी है कि लालची प्रकृत्ति के कारण वे इसको छिपा लेते हैं और चुपचाप बाजार में सुनारों के यहाँ बेच आते हैं।

ब. आधार पर मिली सामग्रियां

हड़प्पा संस्कृति का पता शायद न लगा होता अगर वहाँ सिन्धु मुल्तान रेलवे लाइन के बनाने के लिए मजदूरों के कटाव के कारण ऊपरी आधार पर पुरावशेषों तथा मृण्भाण्डों के टुकड़ें बिखर न गए होते। बलिया (उ० प्र० ) में वयना नामक स्थान की पहचान अनयना गढ़ (ह्वेनसांग द्वारा वर्णित बौद्ध मठ) से नहीं हुआ होता अगर वहाँ के कृषकों द्वारा टीले की मिट्टी में जमी मृद्भाण्डों के टुकड़े खेत की सफाई के समय बाहर सड़क पर इकट्ठा न किए गए होते।

कभी कभी ऊंचा आधार ऊबड़-खाबड़ सतह, ठिकड़ों का आधिक्य आदि दर्शक को स्वतः किसी बस्ती का आभास देते हैं खराडीह (बलिया उ० प्र०) जिसकी खुदाई अभी काशी हिन्द विश्वविद्यालय द्वारा की गई है वहाँ घाघरा की ओर बने कगारों पर मिट्टी के बर्तनों के सजे टुकड़े नीचे से ऊपर तक तथा रिंग वेल ( Ring-well) के चिन्ह इसकी पुरातनता और विस्तार के बोधक हैं।

फसल बोने के बाद यदि आप ध्यान से देखें दो जहाँ पुरातन सभ्यता के अवशेष भूमि में छिपे होते हैं वहाँ की फसल कमजोर, बिरल, पीली होती है जब कि गड्ढा, खाई आदि जहाँ होते हैं उसी बीच में वहीं हरी, धनी तथा विकसित होती है। इस अन्तर से स्पष्ट होता है कहां की मिट्टी के तल में पुरावशेषों का अंश छिपा है।

खेत में शाम की छाया को देखकर भी पुरास्थल का पता लगाया जा सकता है। दीवाल आदि के अन्दर होने पर शाम की छाया में वह स्पष्ट दीखने लगती है।

स. स्थानीय विवरण

बहुत से स्थानों के विषय में वहाँ के स्थानीय लोगों द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है। बलिया (उ० प्र०) के बसन्तपुर गांव में मझरी ताल का वर्णन वहां के निवासी करते हैं। इस स्थान पर ताल है और पुरावशेषों के चिन्ह भी मझरी लोरिक की स्त्री थी। इससे स्पष्ट होता है कि यह उसकी पत्नी का गांव था और उसका तालाब जहाँ वह नहाती थी। इसी प्रकार स्थानीय लोग सुरथ नामक एक राजा का नाम लेते है जिसका सम्बन्ध यहाँ के सुरहा ताल से जोड़ते हैं। उन्हीं के प्रसंग में मोचटा ताल का सुरहा में ही उल्लेख करते हैं। वहाँ कई ऋषियों के नाम के साथ जुड़े ताल हैं। इस मोचटा से स्पष्ट है कि मच्छन्दर नाथ
(मत्स्येन्द्र नाथ) जो बाबा गोरखनाथ के गुरु थे जिनसे नाथ सम्प्रदाय की परम्परा चली यहीं के रहने वाले थे। सुरथ को कोलो का विनाशक भी कहा जाता है। वहीं कोलिय खुर्द मौजा गांव वाले बताते हैं और उसका विवरण देते हैं।

द. साहित्यिक विवरण

● कुछ साहित्यिक विवरणों के आधार पर पुरास्थलों की खोज प्रायः की जाती है। अभी दिन पहले डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक शोध प्रबंध कराया डॉ० श्याम नारायण पाण्डेय से ‘Geography in Mahabharat, जो K. B. Degree Collage मिर्जापुर में भूगोल के अध्यक्ष थे। उनको उन्होंने स्थलों के विवरणों के आधार पर खोज के लिए विभिन्न स्थानों पर भेजा था और उसी के निशान पर इतिहास के इस अतीत के भूगोल को उजागर किया गया।

ह्वेनसांग के यात्रा विवरण के आधार पर कनिषंग ने अनेक पुरास्थलों की खोज की। पहले उन्होंने विशेषतः बौद्ध स्थलों को ही महत्व दिया तथा उसके यात्रामार्ग पर चलकर अनेक पुरास्थलों का पता लगाया। इसी प्रकार पालि ग्रंथों के आधार पर राजगिर में अनेक स्थानों की पहचान की गई। उसके सेट पर्वत श्रृंखला के बाहर पत्थरों की ईंट से जुड़ा अवशेष राजगृह की चाहारदीवारी पहचानी गई, वहाँ की सबसे ऊंची चोटी से गृधकूट पर्वत की पहचान की गई जहां बुद्ध वर्षावास करते थे आदि। इसी प्रकार पौराणिक ग्रंथों और उनके विवरणों के सहारे अनेक पुरास्थलों की पहचान हुई जैसे सीतापुर में नीमसार, कानपुर के विदूर में श्रृष्टि के उदब का स्थान जहाँ से मनु सतरूपा ने सृष्टि का प्रारम्भ किया था। इसे गंगा घाट पर स्थित सृष्टिकालीन मन्दिर से की गई।

वैज्ञानिक विधि : पुरास्थलों की खोज की विधि

यह विधि आधुनिक वैज्ञानिक युग की देन है वह भी बड़े योग्य लोगों के लिए जो इस विधि के सम्पादन में अधिक निष्णात हो इस विधि में निम्न उपविधियों का सहारा लिया जाता है, यद्यपि ये विधियां कारगर होते हुए भी खर्चीलेपन तथा तकनीकी विशेषता के कारण अत्यन्त दुरुह हैं:

  1. हवाई छायांकन
  2. लौह शलाका डालना
  3. ध्वनि द्वारा
  4. मेटल डिटेक्टर
  5. विद्युत प्रतिरोध मापक
  6. मैगनेटोमीटर
  7. मृदाविश्लेषण
  8. सागरतलीय सर्वेक्षण

1. हवाई छायांकन

इसमें हवाई जहाज पर बहुत शक्तिशाली फोटे कैमरा लगाया जाता है। जब हवाई जहाज उड़ान भरती है तो एक बड़े क्षेत्र का फोटो उसमें उतर आता है। उतने बड़े क्षेत्र में खोज के लिए जाने वाले दल पर बहुत अधिक व्यय करना होता तथा एक लम्बा समय लगता। यह सारी समस्या एक उडान ने तय कर दिया। इस छायांकन में उपज के दृश्य, पृथ्वी तल का स्वरूप, मृद्भाण्डों के टुकड़ों का फैला होना, पुरावशेषों का उजागर होना आदि स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पर इस विधि में एक दोष भी है। जो स्थल मकानों के बीच, बागों के बीच या बस्ती के बीच, बगल के घर और दीवार से छायांकन में स्पष्ट नहीं आते उनकी पहचान कठिन है। दूसरे हवाई जहाज के उड़ान का खर्च, इतने शक्तिशाली कैमरे का प्रयोग, कैमरा चालक के कौशल आदि के बिना यह सम्भव नहीं है। साथ ही इसमें स्थानीय इतिहास.. लोक परिचय आदि का अभाव रहने से केवल बाहरी जानकारी होती है। विषयगत जानकारी के लिए फिर पैदल सर्वेक्षण वा पता लगाने कार्य करना शेष ही रह जाता है।

2. लोह शलाका डालना

अंग्रेजी के टी (T) आकार की एक मीटर लम्बी तथा 10 से० मी० मोटी लोहे की सरिया से यह शलाका तैयार की जाती है। उसको हथौड़े या किसी भारी चीज़ से पीट कर जमीन में गाड़ा जाता है। इसमें डंडा वाला निचला भाग नुकीला रहता है उसी को जमीन में धंसाते हैं और ऊपर के चिपटे सिर पर प्रहार द्वारा अन्दर भूमि में उसको प्रवेश कराते हैं। यदि भूमि के अन्दर कोई आवासीय अवशेष छिपा होगा तो इसका अन्दर प्रवेश सहज नहीं होगा बल्कि बाधित होगा। इसके द्वारा प्राप्त जानकारी को व्यापक बनाने के लिए पुरास्थल के भाग को वर्गों में बांट कर एक वर्ग में कई स्थानों पर इसको अन्दर घुसाकर दीवार तथा रिहायशी भवन के अवशेषों के छिपे रहने का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। पर इसमें भी एक कठिनाई है कि केवल भवनों के अवशेषों से होने वाली रुकावट का ही ज्ञान प्राप्त हो सकता है। सभ्यता के स्वरूप, काल आदि का कोई ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता।

3. ध्वनि द्वारा

जिस स्थान पर पुरानी सभ्यता के अवशेष भूमि में बने रहते हैं यहीं की मिट्टी कसी तथा भारी होती है, उस स्थान को अपेक्षा जहाँ कोई वस्तु पृथ्वी के अन्दर जमा नहीं हो। जहां कुछ अन्दर होता है तो वहां से आवाज भारी निकलेगी जहां कुछ भी नहीं होगा तब आवाज हल्की निकलेगी। यही रीति इच्चे, बक्से आदि में कुछ है या नहीं इसकी जानकारी के लिए उसे बजाकर पता किया जाता है दैनिक जीवन में भी इसी आधार पर इस विधि को निकाली गई होगी। इसके लिए दुरमुस या किसी भारी चीज से जमीन को ठोकते है और दूर खड़े होकर आवाज को सुनते हैं। इससे अन्तर स्पष्ट होता है। इस आधार पर संचयित भूमि और खाली भूमि के पहचान द्वारा इसका पता चलता है। पर किसकी और कथकी सभ्यता यहाँ हो सकती है? ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं किया जा सकता इस विधि से।

4. मेटलडिटेक्टर द्वारा

यह एक यंत्र है जिसको रखते ही जहाँ कहीं भी धातु की सामग्री अन्दर होगी तो उसके कारण यह एक प्रकार का आवाज करने लगता है। आप काशी विश्वनाथ मंन्दिर में ज्ञानवापी के मस्जिद की ओर से जायें वाराणसी में तो आपके शरीर पर मेटलडिटेक्टर लगाकर जांच की जाती है। पाकेट में यदि पैसा, कलम का धातु का कैंप या चुनौटी भी होगी तो यह आवाज करना शुरू कर देगा। यही अवस्था भूमि के साथ भी इसका है। बस ज्ञात हो जाता है कि भूमि में कोई द्रवीय पदार्थ गड़ी है। पर यदि कही मेटल डिटेक्टर लगया गया और वहाँ केवल मलया ही है जिसमें कोई धातु का अंश नहीं जमा है तो यह कोई सूचना नहीं देगा। यह इसका बड़ा दोष है।

5. विद्युत प्रतिरोध मापक

यह एक यंत्र है जिसके द्वारा पृथ्वी तल में विद्युत धारा के प्रवाह को मापा जाता है। इसमें विशेषता यह है कि जब विद्युत प्रवाह भूमि तल में देते हैं तो वोल्टामीटर जो धारा की गति का माप करता है वह नमी के आधार पर चलने लगता है। प्रायः सादी या अन्यवसित भूमि में जल सोखने की क्षमता अधिक होती है। मिट्टी के रंध्र खुले होते हैं। इससे उनमें नमी अधिक होता है। अतः यहां धनात्मक विद्युत संचालित हो जाती है। पर जहाँ न्यवसित स्थान होता है, कुछ अन्दर मिट्टी के जमा होता है वहाँ जल के प्रवाह और शोषण की क्षमता कम होती है। वह स्थान अन्दर पोला नहीं होता। वहाँ मिट्टी के रंध्र खुले नहीं होते कि जल या नमी की पूरा सोखने अन्दर तक यह ऊपर ही सूख जाती है।

इससे जब वहाँ बिजली की धारा दी जाती है तो वह अन्दर सरलता से प्रवाहित नहीं होती। इससे बोल्टामीटर की गति वहां सामान्य नहीं होती। जहाँ नम भूमि में वह धनात्मक परिणाम देता है यहीं वस्ती की भूमि में ऋणात्मक देता है। इसके लिए एक क्षेत्र में थोड़ी थोड़ी दूरी पर कई इलेक्ट्रोडोट लगाए जाते हैं। उनके द्वारा अन्दर संचालित विद्युत की गति का आकलन बोल्दामीटर द्वारा किया जाता है। दो विन्दुओं के बीच विद्युत का प्रवाह मार्ग आंक कर वहाँ पुरावशेष होने का अनुमान लगाया जाता है। पर यदि मिट्टी में चट्टान निकलता हो, धातु के खदान हो, जल का स्तर जहाँ बहुत ऊंचा हो आदि अवस्थाओं में इससे सही परिणाम निकालना सम्भव नहीं है। सामान्य से विपरीत मिट्टी की परते हों तो वहाँ भी सामान्य निष्कर्ष नहीं प्राप्त किया जा सकता। फिर वही स्थलीय उत्खनन, लोगों से पता लगाना, साहित्य का सहरा आदि वास्तविक ज्ञान के लिए लेना पड़ता है।

6. मैगनेटोमीटर

यह एक चुम्बकीय यंत्र है। मैगनेट का अर्थ है चुम्बक इसी से बने होने के कारण इसको यह नाम दिया गया है। मैगनेट में खिचाव की शक्ति होती है। इससे बना यह यंत्र पृथ्वी के अन्दर के गुरुत्वाकर्षण का पता लगाता है। जहाँ खिंचाव नहीं है वहां जमाव की कोई गुजाइश नहीं रहती। इस मीटर को लगाने पर यह खिंचाव और सामान्य स्थल की ओर रेखाएं बनाने लगता है। जैसे जैसे इसको क्षेत्र में घुमाते जायगे इसमें रेखाओं का उतार चंद्राव घरातल के जमाव के अनुसार बदलने लगता है। इसी को देखकर भूमि तल के जमाव के विषय में अनुमान लगाया जा सकता है। पर इसमें भी वही कठिनाईयाँ आती हैं जो विद्युत प्रतिरोध नापक में देखी गई हैं। फिर इनके निष्कर्ष की पुष्टि के लिए क्षेत्र में स्थानीय उत्खनन का सहारा लेना पड़ता है।

7. मृदा- विश्लेषण

मिट्टी में कुछ रसायनिक तत्व नियंत्रित मात्रा में प्रकृति प्रदत्त होते हैं। जब उसके स्वरूप में कोई व्यवधान बाहरी वस्तुओं से उत्पन्न होता है तो इनमें मात्रात्मक अन्तर आने लगता है। एक ऐसा तत्व है कि मिट्टी के भीतर कोई वस्तु खुले क्षेत्र में यदि जमा हो जाय तो इसकी मात्रा स्वाभाविक रूप से बढ़ जायगी। अतः इसके विश्लेषण के द्वारा इसकी बढ़ती मात्रा के आधार पर पुरावशेषों की स्थिति का अनुमान लगाना अत्यन्त सरल है। पर यह मात्र संकित है। पूरा उद्देश्य अन्वेषण का इससे स्थान के विषय में नहीं प्राप्त हो पाता।

8. समुद्रतलीय सर्वेक्षण

समुद्र का आकार घटना बढ़ता रहता है। जहाँ आज सूखा है यहाँ कभी समुद्र था। जहाँ समुद्र है यहाँ कल ऊंचा रहा होगा। भारत भूमि के विषय में कहा जाता है कि इसके उत्तर में कभी समुद्र था और दक्षिण ही ऊंचा या आज धरातलीय परिवर्तन ने इस स्थिति को बदल दिया है। अतः बहुत सी हमारी सभ्यताएं, जो कभी ऊपर थी वे आज समुद्र के पेट में हैं। उनका पता लगाने के लिए एक यंत्र वैथिस्केपन्स (Bthygeaples) का आविष्कार किया गया है जो समुद्र तल के अन्दर पुरास्थलों का ज्ञान देता है। इसी विधि का प्रयोग करके कृष्ण की द्वारका जिसे सात द्वारिकाओं में से भेंट द्वारिका कहते हैं, गुजरात में उसका पता एस० आर० राव ने लगाया है। पर यह यंत्र केवल छिछले सागर तल पर ही कामयाब है।

निष्कर्ष : पुरास्थलों की खोज

इन विवेचनों से स्पष्ट है कि सब विधियां तो अपने में महत्वपूर्ण है ही पर परम्परागत खोजी दल द्वारा स्थान पर जाकर लोगों से मिलकर, यहाँ के स्थान साहित्य और परम्परा का ज्ञान प्राप्त कर जो अन्वेषण किया जा सकता है वही प्रत्येक दृष्टि से सार्थक अन्वेषण है। इन सरल रीतियों से पूरा ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता।

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