Sanskriti ka arth | संस्कृति का अर्थ और परिभाषाएं | सभ्यता और संस्कृति | सभ्यता और संस्कृति में अंतर

Sanskriti ka arth : संस्कृति का अर्थ

संस्कृत भाषा में सम उपसर्ग पूर्वक ‘कृ’ धातु में क्तिन् प्रत्यय के योग से ‘संस्कृति’ शब्द निस्पन्न होता है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से संस्कृति शब्द ‘परिष्कृत कार्य’ अथवा उत्तम स्थिति का बोध कराता है, किन्तु इस शब्द का भावार्थ अत्यन्त व्यापक है। अंग्रेजी में वस्तुतः संस्कृति के लिए (Culture) शब्द का प्रयोग होता है। वस्तुतः संस्कृति शब्द मनुष्य की सहज प्रवृत्ति, नैसर्गिक शक्तियों और उनके परिष्कार का द्योतक है।

किसी देश की संस्कृति अपने को विचार, धर्म, दर्शन, काव्य, संगीत, नृत्य कला आदि के रुप में अभिव्यक्त करती है। मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग करके इन क्षेत्रों में जो सृजन करता है और अपने सामूहिक जीवन को हितकर तथा सुखी बनाने हेतु जिन राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक प्रथाओं को विकसित करता है उन सबका समावेश ही हम ‘संस्कृति’ में पाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि संस्कृति की प्रक्रिया एक साथ ही आदर्श को वास्तविक तथा वास्तविक को आदर्श बनाने की प्रक्रिया है।

Sanskriti ka arth
संस्कृति का अर्थ : संस्कृति की परिभाषाएं

संस्कृति की दो प्रकार की परिभाषायें दी गयी हैं एक व्यापक अर्थ में और दूसरा सीमित अर्थ में व्यापक अर्थ में मानव के द्वारा निर्मित आध्यात्मिक एवं अधिभौतिक विश्व का संस्कृति में समावेश किया जाता है, तो सीमित अर्थ में केवल मानव की भौतिक उन्नति का। इसी को हम संस्कृति के आध्यात्मिक और भौतिक पहलू कह सकते हैं।

किसी भी संस्कृति में आत्मा और विश्व के संस्कार की प्रक्रिया साथ-साथ चलती है, तो भी किसी में आध्यात्मिक और किसी में भौतिक पक्ष पर अधिक बल दिया जाता है। बाह्य विश्व के उपभोग अथवा भौतिक प्राप्ति को प्रधानता देना भौतिक संस्कृति का लक्षण है। इसी अर्थ में आधुनिक पाश्चात्य संस्कृतियों को भौतिक कहा जाता है।

इसके विपरीत भारतीय संस्कृति आत्मा की, मानव की मानसिक उन्नति की ओर विशेष रुप से ध्यान देती है। इसीलिए भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक कही जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि पाश्चात्य संस्कृति में आध्यात्मिक और भारतीय संस्कृति में भौतिकवाद के अंश है ही नहीं, “प्रधान्येन व्यपदेशा भवन्ति” इस न्याय के अनुसार उक्त परिभाषा में केवल उनकी विशेषता की ओर इंगित किया गया है।

संस्कृति की परिभाषाएं : Sanskriti ka arth

श्री गोपाल स्वरुप पाठक के अनुसार- “भौतिक साधन, विचार धाराएँ, आदर्श तथा आस्थाएँ, भावनाएँ, शुद्ध मूल्य एवं सामाजिक रीति-रिवाज, जो किसी भी समाज में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिलते हैं, उन्हीं के सामूहिक रूप से संचयन को संस्कृति कहते हैं।”

आचार्य नरेन्द्रदेव को संस्कृति की ‘आध्यात्मिक’ व्याख्या पसन्द है। डॉ० सम्पूर्णानन्द के अनुसार, “संस्कृति वह आधारशिला है, जिसके आश्रय से जाति, समाज, देश का विशाल भव्य प्रसाद निर्मित होता है।”

रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार “संस्कृति एक ऐसा गुण है जो हमारे जीवन में छाया हुआ है। एक आत्मिक गुण है जो मनुष्य के स्वभाव में उसी तरह व्याप्त है, जिस प्रकार फूलों में सुगन्ध और दूध में मक्खन इसका निर्माण एक अथवा दो दिन में नहीं होता, युग-युगान्तर में होता है।”

“मैथ्यू आर्नोल्ड के अनुसार- “विश्व में जो कुछ उत्तमोत्तम कहा गया अथवा जाना गया है उससे स्वयं को भिज्ञ कराना ही संस्कृति है।

ई०बी० टायलर के अनुसार “संस्कृति एक जटिल इकाई है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कलाएँ, नीति, विधि, रीति-रिवाज तथा वे अन्य क्षमतायें और अभ्यास शामिल है, जिन्हें मनुष्य किसी समाज का सदस्य होने के नाते अर्जित करता है।”

ई०ए० हाबेल के अनुसार “संस्कृति सीखे हुए व्यवहार प्रतिमानों का कुल योग है, जो किसी समाज के सदस्यों की विशेषता है जो कि प्राणिशास्त्रीय विरासत का परिणाम नहीं है।”

सभ्यता और संस्कृति :

“संस्कृति’ शब्द के साथ-साथ प्रायः एक और शब्द ‘सभ्यता’ का भी प्रयोग होता है, जिसका तात्पर्य है सभा में बैठने की योग्यता, शिष्टता अथवा सामाजिक आदि। प्रकृति द्वारा प्रदत्त पदार्थों, तत्वों और शक्तियों का उपयोग कर मनुष्य ने भौतिक क्षेत्र में जो प्रगति की है, उसी को हम ‘सभ्यता’ (Civilization) कहते हैं। दूसरे शब्दों में अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मनुष्य प्रकृति के साधनों का जिस ढंग से प्रयोग करता है, उससे ही उसकी ‘सभ्यता’ का निर्माण होता है। सभ्यता और संस्कृति दोनों शब्दों में अंतर और उनमें समानताओं को नीचे बताया गया है-

सभ्यता और संस्कृति में अन्तर-

सभ्यता और संस्कृति, दोनों शब्द समानार्थी होते हुए भी नितान्त भिन्न है अन्तर का उल्लेख निम्न है

अनुभवजन्य ज्ञान संस्कृति का और बुद्धिजन्य ज्ञान सभ्यता का आधार है। अनुभवजन्य ज्ञान नित्य (शाश्वत) और बुद्धिजन्य ज्ञान परिवर्तनशील होने के कारण संस्कृति नित्य (अविनाशी) और सभ्यता परिवर्तनशील होती है।

संस्कृति किसी व्यक्ति द्वारा सृजित नहीं होती, उसका सम्बन्ध जन-समुदाय से होता है। किन्तु सभ्यता व्यक्ति द्वारा सृजित होती है, भले उसका उदय समाज में ही होता है।

संस्कृति का सम्बन्ध आन्तरिक जगत से होता है, जबकि सभ्यता का बाह्य (भौतिक) जगत से होता है।

संस्कृति को माप सकने का कोई भी मापदण्ड नहीं है किन्तु सभ्यता को मापने के मापदण्ड है। जैसे-वैदिक संस्कृति को आधुनिक संस्कृति से तुलना करके उसे श्रेष्ठ अथवा निम्न कहना युगीन मूल्यों के सन्दर्भ में असंगत है। वहीं दूसरी तरफ यातायात के साधनों के प्रयोग में सभ्यता के विकास क्रम में निरन्तर प्रगति करते हुए आज बैलगाड़ी युग से हवाई जहाज के युग में विकास हो गया है। यह सभ्यता के विकास के युग का मापदण्ड है।

संस्कृति में निरन्तरता, प्रवाह, सम्मिश्रण, समन्वय होता है। जबकि सभ्यता का प्रत्येक काल में विकास होता है।

सभ्यता साधन होती है, जबकि संस्कृति साध्य होती है।

संस्कृति आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसकी प्रगति हमारी आत्म प्रगति के साथ ही जुड़ी हुई है। सभ्यता संस्कृति की वाहक है। सभ्यता की श्रेष्ठता के आधार पर संस्कृति की श्रेष्ठता का निर्धारण नहीं किया जा सकता। जैसे टेलीविजन के द्वारा आज हम किसी के सन्देश को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित कर सकते हैं। यह तो टेलीविजन अर्थात् सभ्यता की श्रेष्ठता हुईं किन्तु टेलीविजन प्रसारण की तरह संप्रेषित सन्देश भी विश्व के लिए कल्याणकारी अथवा श्रेष्ठ होगा यह आवश्यक नहीं है अर्थात् टेलीविजन (सभ्यता) के आधार पर सन्देश की श्रेष्ठता (संस्कृति) का निर्धारण अत्यन्त कठिन कार्य है।

सभ्यता मूर्त होती है, जबकि संस्कृति अमूर्त, जिसे अनुभूति के माध्यम से ही महसूस किया जा सकता है।

सभ्यता का उत्थान मानव को प्रगति के पथ पर ले जाता है जबकि संस्कृति मानव को अन्तर्मुखी करके उसके सात्विक गुणों को अभिव्यक्ति करती है।

संस्कृति में चक्रीय परिवर्तन होता है, जबकि सभ्यता में रैखिक परिवर्तन होता है।

मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग करके विचार और कर्म के क्षेत्र में जो सृजन करता है उसी को ‘संस्कृति’ कहते हैं। जबकि मनुष्य अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रकृति के साधनों का जिस ढंग से प्रयोग करता है, उससे उसकी ‘सभ्यता’ का निर्माण होता है।

सभ्यता और संस्कृति का पारस्परिक सम्बन्ध-

सभ्यता और संस्कृति में अन्तर हुए भी दोनों का एक दूसरे से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। हुमायूँ कबीर के शब्दों में “संस्कृति सभ्यता की ही फलीभूत है। संस्कृति का जन्म तभी हुआ, जब सभ्यता ने मनुष्य ने को दैनिक जीवन की जरूरतों से मुक्ति दी” जबकि स्पेंगलर ने सभ्यता को संस्कृति की चरम सीमा बताया।

सभ्यता भी संस्कृति मूलक ही है, सभ्यता का आधार संस्कृति ही है। ‘संस्कृति’ शब्द आत्मा, मन, बुद्धि के विकास को प्रत्यक्ष रूप से सूचित करता है और सभ्यता शब्द उसके से क्रियात्मक विकास को। अतः सभ्यता तो संस्कृति मूलक ही है, क्योंकि संस्कृति रुपी बीज का विकास ही सभ्यता कहलाती है। “सभ्यता” शरीर है, “संस्कृति” आत्मा है। जिस प्रकार शरीर के बिना आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं, उसी प्रकार आत्मा के बिना शरीर का कोई अस्तित्व नहीं होता हैं। दोनों के उपादान तथा आधार एक ही है।

उपरोक्त विवेचन के बाद यह कहा जा सकता है कि सभ्यता और संस्कृति, एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी, एक दूसरे से बहुत संयुक्त भी है। पारस्परिक सम्बन्धों के कारण दोनों

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