Bimbisar | बिम्बिसार | बिम्बिसार की उपलब्धियां | Achievements of Bimbisara | बिंबिसार का इतिहास (545 ई.पू.-492 ई.पू.)

हर्यंक वंश के लोग नाग वंश की एक उपशाखा थे। जिसका संस्थापक बिम्बिसार (Bimbisar) था। इसे ही मगध साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता था।

डी.आर. भण्डारकर के अनुसार बिम्बिसार प्रारम्भ में लिच्छिवियों का सेनापति था। सुतनिपात में लिच्छिवियों के नगर, वैशाली को मगधमपुरम कहा गया है। जैन साहित्य में बिम्बिसार का नाम ‘श्रेणिक’ मिलता है। महावंश के अनुसार बिम्बिसार को उसके पिता ने 15 वर्ष की आयु में राज्य दिया। अतः भण्डारकर महोदय का कथन सही प्रतीत नहीं होता। मत्स्य पुराण में बिंबिसार के पिता का नाम ‘क्षेत्तौजस’ दिया गया है।

Bimbisar

टार्नर महोदय के अनुसार बिंबिसार के पिता का नाम ‘भट्टिय’ था जिसे अंग नरेश ब्रह्मदत्त ने हराया था। दीपवंश में पिता का नाम ‘बोधिस’ व तिब्बती अनुश्रुति में ‘महापद्म’ मिलता है।

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार मगध का प्रथम शासक बिंबिसार था। यह मत सबसे अधिक तर्कसंगत है। इसने मगध में हर्यक वंश की स्थापना के बाद मगध साम्राज्य के विस्तार के लिए कई वैवाहिक संबंध स्थापित किये। अतः इसने साम्राज्य विस्तार के लिए वैवाहिक संबंध की नीति अपनाई।

कूटनीतिक वैवाहिक सम्बन्ध व विजयें :

रायचौधरी के अनुसार ‘यूरोप के हैप्सबर्ग तथा बोरबन्स की तरह बिंबिसार भी राजवंशों से वैवाहिक सम्बन्धों का समर्थक था।

  1. चेटक की बहन चेलना : सबसे पहले लिच्छवी गणराज्य के चेटक की पुत्री चेलना (छलना) से विवाह कर मगध की उत्तरी सीमा को सुरक्षित किया क्योंकि लिच्छवी मगध की प्रारम्भिक राजधानी गिरिवज्र पर रात्रि आक्रमण करते थे। एक बार नगर में आग भी लगा दी थी। वैदेही वासवी की पहचान चेल्लना से ही की जाती है जो अजातशत्रु द्वारा बिम्बिसार को कारागार में डालने पर प्रतिदिन भोजन देने जाती थी।
  2. प्रसेनजित की बहन महाकोशला : दूसरा विवाह बिंबिसार ने कोशल नरेश प्रसेनजीत की बहन ‘महाकोशला’ से किया। इससे कोशल का राज्य उसका मित्र बन गया तथा दहेज में एक लाख की वार्षिक आय का काशी ग्राम (काशी के कुछ गांव) भी प्राप्त हुआ। इससे मगध की सुरक्षा भी मिली, क्योंकि उसके और वत्स के मध्य में मित्र राज्य कौशल था।
  3. मद्र देश की राजकुमारी क्षेमा से विवाह : मद्रदेश (कुरू के समीप) की राजकुमारी ‘क्षेमा’ से विवाह किया तथा मद्रों का सहयोग प्राप्त किया। क्षेमा ने ही कौशल नरेश प्रसेनजीत को बौद्ध धर्म की शिक्षा दी।

महावग्ग में बिंबिसार की 500 रानियां होने का उल्लेख है। संभवतः उसने अन्य राजवंशों से भी वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये होंगे।

बिम्बिसार (Bimbisar) के मैत्री संबंध :

अवन्ति के शासक चण्डप्रद्योत से बिंबिसार ने मैत्री सम्बन्ध स्थापित किये। उसने अपने प्रसिद्ध राजवैद्य जीवक को पाण्डुरोग (पीलिया) से पीड़ित प्रद्योत की चिकित्सा के लिए भेजा।
रोरूक (सिन्ध) शासक रूद्रायन व गांधार के पुष्करसारिन (पुक्कुसाति) भी उसके मित्र शासक थे। गांधार नरेश पुक्कुसाति ने बिम्बिसार के दरबार में अपना दूत भेजा था। कूटनीतिक व वैवाहिक सम्बन्धों से उसकी आक्रमण नीति का श्रीगणेश हुआ।

अंग पर विजय :

विधुर पण्डित जातक के अनुसार अंग का मगध की राजधानी पर अधिकार था। संभवत: अंग शासक ब्रह्मदत्त ने बिम्बिसार के पिता भट्टिय को परास्त कर अधिकार किया होगा। बिंबिसार ने अंग पर आक्रमण किया, जिसमें ब्रह्मदत्त मारा गया। बिम्बिसार ने अपने पुत्र अजातशत्रु को अंग की राजधानी चम्पा का वायसराय (उपराजा) नियुक्त किया। डॉ. राय चौधरी के अनुसार ‘बिंबिसार की अंग विजय ने मगध की उस विजय के दौर को प्रारम्भ किया जो अशोक द्वारा कलिंग विजय के बाद तलवार रख देने के साथ समाप्त हुआ।’

बुद्धघोष व महावग्ग के अनुसार ‘बिंबिसार की अधीनता में 80,000 ग्राम थे। बुद्धचर्या के अनुसार बिम्बिसार के राज्य का विस्तार 300 योजन था जिसे अजातशत्रु ने बढ़ाकर 500 योजन कर दिया।

गिरिव्रज से राजधानी का स्थानांतरण :

मगध की प्रारम्भिक राजधानी कुशाग्रपुर (गिरिवज्र ) थी, किन्तु यह नगर उत्तर में स्थित वज्जि संघ के आक्रमणों से सुरक्षित न था। परम्परा के अनुसार बिंबिसार ने 5 पहाड़ियों से गिरे नवीन वृषभ, ऋषिक गिरि, चैत्यक, वैभार) राजगृह की स्थापना की तथा उसे अपनी दूसरी राजधानी बनाया। ह्वेनसांग के विवरण से इसकी पुष्टि होती है। राजगृह के भवनों का निर्माण प्रसिद्ध वास्तुकार महागोविन्द से करवाया गया। बुद्धघोष ने इस नई राजधानी को बिम्बिसारपुरी कहा गया है। उत्तराध्ययन सूत्र में बिंबिसार को ‘राजाओं का सिंह’ कहा गया है।

बिम्बिसार का प्रशासन :-

बिंबिसार ने पहली बार मगध सुदृढ़ शासन व्यवस्था की नींव डाली। बिम्बिसार के उच्च अधिकारी (राजभट्ट) चार श्रेणियों में विभक्त थे

  1. सम्बथक/सर्वाथक महामात्र – सामान्य प्रशासन का प्रमुख पदाधिकारी।
  2. वोहारिक/व्यावहारिक महामात्र – प्रधान न्यायिक अधिकारी।
  3. सेनानायक महामात्र – सेना का प्रधान अधिकारी।
  4. उत्पादन महामात्र– उत्पादन व कर वसूली अधिकारी।

बिम्बिसार के व्यक्तिगत अधिकारियों में ‘सोना कोलीविश’ का नाम मिलता है। उसके अलावा ‘सुमन’ नाम का मालाकार प्रतिदिन बिंबिसार को वेली के फूल दिया करता था। उसके कोलिय नामक मंत्री, कुंभाघोषक नामक कोषाधिकारी व जीवक नामक राजवैद्य का उल्लेख भी मिलता है। बिम्बिसार को ‘सेनिय’ उपनाम भी दिया जाता है जो सिद्ध करता है कि वह प्रथम शासक था जिसने सर्वप्रथम स्थायी सेना का गठन किया।

प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्य को मण्डल (प्रांत) तथा मंडल को ग्राम इकाई में बांटा गया। प्रांतों में राजकुमार उपराजा के रूप में नियुक्त किये जाते थे। मण्डलीक राजाओं का भी उल्लेख मिलता है। बिम्बिसार ने प्रशासन में अपने पुत्रों का पर्याप्त सहयोग लिया। राजकुमार अभय ने राजा प्रद्योत के षड़यंत्र को असफल किया। ग्राम प्रधान ग्रामिक या ग्राम भोजक कहलाता था। महाबरंग के अनुसार इसने 80,000 ग्रामिकों की विशाल सभा बुलाई थी। बिंबिसार की न्याय व्यवस्था कठोर थी। मृत्युदंड का प्रावधान था। गलत सलाह देने के अपराध में बड़े से बड़ा पदाधिकारी भी पदच्युत किया जा सकता था।

बिम्बिसार ने विद्या कला को प्रोत्साहन दिया। जीवक राजवैद्य था. जिसे शिक्षा प्रदान करने के लिए तक्षशिला भेजा। गया। यह आयुर्वेद की कौमार भृत्य शाखा का विशेषज्ञ था।

बिंबिसार का धर्म :-

सुतनिपात के अनुसार बिम्बिसार महात्मा बुद्ध का मित्र व संरक्षक था। बुद्ध से प्रथम भेंट ज्ञान प्राप्ति के 7 साल पहले हुई तथा बिम्बिसार ने बुद्ध को सेनापति बनाने की कोशिश की व बहुत सारा धन भी दिया। दूसरी भेंट ज्ञान प्राप्ति के बाद राजगृह में हुई। विनयपिटक के अनुसार उसने बौद्ध धर्म ग्रहण किया तथा बुद्ध व संघ के निमित्त ‘वेलुवन उद्यान दान में दिया। राजवैद्य जीवक को बुद्ध व उसके अनुयायियों का वैद्य नियुक्त किया। बुद्ध के प्रति अपने श्रद्धाभाव के कारण समस्त भिक्षुओं के लिए ‘तरपण्य’ (गंगा नदी पार करने का शुल्क) निशुल्क किया।

जैन स्रोतों के अनुसार बिम्बिसार ने संन्यासी भिक्षुओं के प्रमुख महावीर से ‘मण्डीकुक्षी चैत्य’ में अपनी रानियों, कर्मचारियों व सम्बन्धियों सहित भेंट की व उसके धर्म का अनुयायी बन गया।

दीघनिकाय से ज्ञात होता है कि बिंबिसार ने चम्पा के प्रसिद्ध ब्राह्मण ‘सोनदण्ड’ को वहां की सम्पूर्ण आमदनी दान में दे दी थी। इस प्रकार बिम्बिसार बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन व ब्राह्मण धर्मों के प्रति भी सहिष्णु बना रहा।

बिम्बिसार की मृत्यु :

जैन स्रोतों के अनुसार अजातशत्रु (कुणिक), हल्ल, बेहल्ल, अभय, नंदीसेन व मेघकुल बिम्बिसार के पुत्र थे। प्रथम तीन चेल्लना के तथा चौथा (अभय) लिच्छवी गणिका आम्रपाली का पुत्र था। जैन आवश्यक सूत्र के अनुसार अजातशत्रु ने अपने पिता बिम्बिसार को कारागृह में डाल दिया। वहां चेल्लना (वासवी) ने कारागार में अपने पति की सेवा की। अंत में बिम्बिसार ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली।

बौद्ध ग्रंथ विनयपिटक के अनुसार बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त ने अजातशत्रु को अपने पिता का वध करने के लिए उकसाया देवदत्त षड्यंत्रकारी, दुष्ट व फूट डालने वाला था। महावंश में भी कहा गया है कि बुद्ध की मृत्यु के आठ वर्ष पूर्व अजातशत्रु ने बिम्बिसार की हत्या कर शासन प्राप्त किया। बिम्बिसार ने 52 वर्षों तक शासन किया।

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