Koshal mahajanapad | कोशल महाजनपद | छठी सदी ई०पू० का कोशल महाजनपद | For UPSC

Koshal mahajanapad : छठीं शताब्दी ईसा पूर्व के आते-आते हमें भारत की राजनीति में महाजनपदों का अस्तित्व दिखाई देता है। इन महाजनपदों की संख्या 16 (16 महाजनपद) थी जोकि पूरे उत्तर भारत, दक्षिण भारत तथा पश्चिमोत्तर भारत में फैले हुए थे किंतु ये अधिकांशतः उत्तर भारत में विद्यमान थे। ऐसा प्रतीत होता है कि सोलह महाजनपदों की पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता एवं संघर्ष के फलस्वरूप अनेक छोटे जनपदों का बड़े राज्यों में विलय हो गया।

अन्य महाजनपद या तो इनकी विस्तारवादी नीति के शिकार हुए अथवा वे अत्यन्त महत्वहीन हो गये। महात्मा गौतम बुद्ध के समय में जिन राजतन्त्रों का उत्तर भारत की राजनीति में बोलबाला था उनमें से कोशल महाजनपद (Koshal mahajanapad) प्रमुख है-
यहाँ हम कोशल महाजनपद के विषय में कुछ विस्तार से विवरण देंगे-

Koshal mahajanapad
कोशल महाजनपद

कोशल महाजनपद : Koshal mahajanapad

कोशल उत्तर-पूर्व भारत का प्रमुख राज्य था जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी। महात्मा बुद्ध के पूर्व ही कंस नामक राजा ने काशी राज्य को जीता था। जातक ग्रंथों में कंस को ‘वारानसिग्गहो‘ अर्थात् बनारस पर अधिकार करने वाला कहा गया है। कंस का पुत्र तथा उत्तराधिकारी महाकोशल हुआ। उसके समय में कोशल का काशी पर पूर्ण अधिकार हो गया। काशी के मिल जाने से कोशल का प्रभुत्व अत्यधिक बढ़ गया।

काशी व्यापार तथा वस्त्रोद्योग का एक महत्वपूर्ण केन्द्र था और तक्षशिला, सौवीर तथा अन्य दूरवर्ती स्थानों के साथ उसका व्यापारिक सम्बन्ध था। इस राज्य के मिल जाने से कोशल की राजनैतिक तथा आर्थिक समृद्धि बढ़ गयी।

कोशल और मगध :

पूर्व में कोशल महाजनपद का प्रतिद्वंदी राज्य मगध था। कोशल तथा मगध के बीच वैमनस्य का मुख्य कारण काशी का राज्य था जिसकी सीमायें दोनों ही राज्यों को स्पर्श करती थीं। बुद्ध के समय कोशल का राजा प्रसेनजित था। वह महाकोशल का पुत्र था। उसने मगध को संतुष्ट करने के लिए अपनी बहन महाकोशला अथवा कोशलादेवी का विवाह मगध नरेश विम्बिसार के साथ कर दिया तथा दहेज में काशी अथवा उसके कुछ ग्राम दिये। अतः बिम्बिसार के समय तक इन दोनों राज्यों में मैत्री सम्बन्ध कायम रहा।

परन्तु बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु के समय में कोशल और मगध में पुनः संघर्ष छिड़ा। संयुक्त निकाय में प्रसेनजित तथा अजातशत्रु के संघर्ष का विवरण मिलता है। ज्ञात होता है कि प्रथम युद्ध में अजातशत्रु ने प्रसेनजित को परास्त किया तथा उसने भाग कर श्रावस्ती में शरण ली किन्तु दूसरी बार अजातशत्रु पराजित हुआ और बन्दी बना लिया गया। कालान्तर में प्रसेनजित ने मगध से संधि कर लेना ही श्रेयस्कर समझा और उसने अपनी पुत्री वाज़िरा का विवाह अजातशत्रु से कर दिया। काशी के ग्राम, जो प्रसेनजित ने बिम्बिसार की मृत्यु के पश्चात् वापस लिये थे, पुनः अजातशत्रु को सौंप दिये।

प्रसेनजित के समय में कोशल का राज्य अपने उत्कर्ष पर था। काशी के अतिरिक्त उसका कपिलवस्तु के शाक्य, केसपुत्त के कालाम, पावा और कुशीनारा के मल्ल, रामगाम के कोलिय, पिप्पलिवन के मोरिय आदि गणराज्यों (10 गणराज्य) पर भी अधिकार था। बौद्ध ग्रन्थ संयुक्त निकाय के अनुसार वह ‘पाँच राजाओं के एक गुट का नेतृत्व करता था। प्रसेनजित महात्मा बुद्ध एवं उनके मत के प्रति श्रद्धालु था। बुद्ध उसकी राजधानी में प्रायः जाते तथा विश्राम करते थे।

प्रसेनजित का पुत्र तथा उत्तराधिकारी विडुडभ हुआ। संयुक्त निकाय से पता चलता है कि प्रसेनजित के मंत्री दीघचारन ने विडूडभ के साथ मिलकर कोशल नरेश के विरुद्ध षड्यन्त्र किया। विडूडभ ने अपने पिता की अनुपस्थिति में राजसत्ता पर अधिकार कर लिया।

प्रसेनजित ने भागकर मगध राज्य में शरण ली, किन्तु राजगृह नगर के समीप पहुँचने पर थकान से उसकी मृत्यु हो गयी। विडूडभ ने कपिलवस्तु के शाक्यों पर आक्रमण किया। संघर्ष का कारण बौद्ध साहित्य में यह बताया गया है कि कोशल नरेश प्रसेनजित महात्मा बुद्ध के कुल में सम्बन्ध स्थापित करने को काफी उत्सुक था। इस उद्देश्य से उसने शाक्यों से यह माँग की कि वे अपने वंश की एक कन्या का विवाह उसके साथ कर दें। शाक्यों को यह प्रस्ताव अपने वंश की मर्यादा के प्रतिकूल लगा किन्तु वे कोशल नरेश को रुष्ट भी नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने छल से वासभखत्तिया नामक एक दासी की पुत्री को प्रसेनजित के पास राजकुमारी बनाकर भेज दिया।

प्रसेनजित ने उससे विवाह कर लिया। विडूडभ उसी का पुत्र था जब उसे इस छल का पता लगा तब वह बड़ा कुपित हुआ तथा शाक्यों से बदला लेने का निश्चय किया। कहा जाता है कि एक बार वह स्वयं शाक्य राज्य में गया था तो शाक्यों ने ‘दासी पुत्र’ कहकर उसका अपमान किया था। इसी अपमान का बदला लेने के लिये राजा बनते ही उसने शाक्यों पर – आक्रमण कर दिया। वे पराजित हुये तथा नगर के पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों का भीषण संहार किया गया। उनमें से अनेक ने भागकर अपनी जान बचाई। किन्तु विडूडभ को अपने दुष्कृत्यों का फल तुरन्त मिला।

शाक्यों के संहार के बाद जब वह अपनी पूरी सेना के साथ वापस लौट रहा था तो अचिरावती (राप्ती) नदी की बाढ़ में अपनी पूरी सेना के साथ नष्ट हो गया। रिज डेविड्स ने इस कथा की प्रामाणिकता को स्वीकार किया है। यह घटना महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के कुछ पहले की है।

विडूडभ के उत्तराधिकारी के विषय में हमें ज्ञात नहीं है। लगता है उसके साथ ही कोशल का स्वतन्त्र अस्तित्व भी समाप्त हो गया तथा मगध मे मिला लिया गया।

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