Bauddha dharma ka prabhav | बौद्ध धर्म का प्रभाव | Bauddh dharm ka mahatva | बौद्ध धर्म का महत्व

Bauddha dharma ka prabhav : एक संगठित धर्म के रूप में लुप्त होने के बावजूद, बौद्ध धर्म ने भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभाव छोड़ा। ई.पू. 500 के आस-पास बौद्धों ने उत्तर-पश्चिम के लोगों की समस्याओं के बारे में गहरी जागरूकता दिखाई। लोहे के हल से की जाने वाली खेती, व्यापार, और सिक्कों के इस्तेमाल से व्यापारीगण और रईस लोग धन इकट्ठा करने में सक्षम हुए; सुना जाता है कि लोगों के पास अस्सी कोटि धन होते थे। इन सबसे स्वभावतः सामाजिक और आर्थिक असमानताओं का निर्माण हुआ।

Bauddha dharma ka prabhav

बौद्ध धर्म ने इसलिए लोगों को सलाह दी थी कि धन इकट्ठा न करें। इसके फलस्वरूप घृणा, क्रूरता और हिंसा, गरीबी आदि व्यापक पैमाने पर बढ़ी। इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए, बुद्ध ने सिखाया कि किसानों को अनाज एवं अन्य सुविधाएँ, व्यापारियों को पूँजी और बेरोजगारों को रोजगार की सुविधाएँ दी जानी चाहिए। दुनिया भर से गरीबी उन्मूलन के लिए इन तरीकों को अपनाने की सलाह दी गई। बौद्ध धर्म ने यह भी सिखाया कि भिक्षुओं को यदि कोई गरीब दान देते। हैं, तो वे अगले जन्म में धनी पैदा होंगे।

नियमित जीवन शैली – (आचार संहिता)

‘भिक्षुओं के लिए निर्धारित आचार संहिता ई.पू. पाँचवीं चौथी शताब्दी में उत्तर-पूर्व भारत की भौतिक स्थितियों के विरुद्ध उठी प्रतिक्रिया का द्योतक है। यह संहिता भिक्षुओं के भोजन, वस्त्र एवं यौन व्यवहार पर प्रतिबन्ध लगाती है। वे सोने, चाँदी स्वीकार नहीं कर सकते थे, क्रय-विक्रय का सहारा नहीं ले सकते थे। बुद्ध की मृत्यु के बाद इन नियमों को ढीला छोड़ दिया गया, लेकिन प्रारम्भिक नियम एक तरह के आदिम साम्यवाद, व्यापार और उन्नत कृषि से परहेज रखने वाले कबीलाई समाज की विशेषता की वापसी का संकेत देते हैं। भिक्षुओं के लिए निर्धारित आचार संहिता आंशिक रूप से धन, निजी सम्पत्ति और विलासी जीवन के उपयोग के विरुद्ध विद्रोह का द्योतक है, जिस समय ई.पू. पाँचवीं शताब्दी में उत्तर-पूर्व भारत में सम्पत्ति और पैसा विलासिता का सूचक माना जाता था।

सामाजिक बुराइयों का विरोध : Bauddha dharma ka prabhav

ई.पू. पाँचवीं शताब्दी में बौद्ध धर्म ने नए भौतिक जीवन से उत्पन्न बुराइयों को नकारने की कोशिश की, इसने लोगों के सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी बदलने की कोशिश की। कर्जदारों को संघ में शामिल होने की मनाही से उन्हें साहूकारों और धनी लोगों के चंगुल से छुड़ाना मुश्किल हो गया। इसी तरह, गुलामों के लिए संघ में शामिल न होने की पद्धति से मालिकों को गुलाम बनाने में मदद मिली। इस प्रकार, गौतम बुद्ध के नियमों और उपदेशों ने समय के साथ बदलते भौतिक जीवन को समझा और उन्हें वैचारिक रूप से मजबूती प्रदान की।

वर्ण व्यवस्था में प्रभाव :

हालांकि बौद्ध भिक्षुओं ने सांसारिकता त्याग दी थी और वे बार-बार लालची ब्राह्मणों की आलोचना करते थे, लेकिन कई तरह से वे ब्राह्मणों से मिलते भी थे। दोनों ने सीधे उत्पादन में हिस्सा नहीं लिया; वे समाज द्वारा दिए गए दान या उपहारों पर आश्रित थे। उन्होंने पारिवारिक दायित्वों, निजी सम्पत्ति की रक्षा और राजनीतिक अधिकार के सम्मान करने के गुणों पर जोर दिया। दोनों ने वर्ग आधारित सामाजिक व्यवस्था का समर्थन किया; हालांकि, भिक्षुओं की दृष्टि में वर्ण, कर्मों और गुणों पर आधारित थे, जबकि ब्राह्मणों की दृष्टि में वर्ण, जन्म पर आधारित था।

मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति पर बल देते हुए व्यवहारिक :

निःसन्देह बौद्ध शिक्षण का उद्देश्य व्यक्ति के मोक्ष या निर्वाण को सुरक्षित करना था। पुराने समतावादी समाज के विघटन और निजी सम्पत्ति के कारण घोर सामाजिक असमानता के उदय के कारण खुद को समायोजित करने में जिन लोगों को मुश्किल पड़ रहा था, उनके लिए कुछ रास्ते बनाए गए, लेकिन ऐसा भिक्षुओं तक ही सीमित था। अनुयायियों के लिए और कोई रास्ता नहीं था, अतः उन्हें मौजूदा स्थिति से समझौता कर लेने का उपदेश दिया गया।

महिलाओं और शूद्रों की स्थिति में सुधार :

बौद्ध धर्म ने अपने दरवाजे को महिलाओं और शूद्रों के लिए खुला रखकर समाज पर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाला। ब्राह्मणबाद के अन्तर्गत महिलाओं और शूद्रों को एक ही श्रेणी में रखा गया था, वे न तो जनेऊ धारण कर सकते थे और न उन्हें वेद पाठ की अनुमति थी। बौद्ध धर्म अपनाने से उन्हें उनकी इस निम्न पहचान से मुक्ति मिली। बौद्ध धर्म ने मजदूर श्रमिक का तिरस्कार नहीं किया। बोधगया से प्राप्त दूसरी शताब्दी की मूर्तिकला में, बुद्ध को बैल के साथ जुताई करते दर्शाया गया है।

अहिंसा पर बल :

अहिंसा और पशु जीवन की पवित्रता पर जोर देने के साथ, बौद्ध धर्म ने देश के पशु धन को बढ़ाया। प्राचीनतम बौद्ध ग्रन्थ सुत्तनिपात में मवेशी को भोजन, सौन्दर्य, शक्ति और खुशी (अन्नदा, वन्नदा, बलदा, सुखदा) का दाता बताया गया है और इसलिए उनकी सुरक्षा का आग्रह किया गया है। यह शिक्षा उल्लेखनीय रूप से तब आई, जब पशुओं की हत्या, अनार्य लोग भोजन के लिए और आर्य धर्म के नाम पर करते थे। गाय की पवित्रता और अहिंसा पर ब्राहमणवादी आग्रह जाहिर तौर पर बौद्ध शिक्षा से ली गई थी।

तर्कशीलता :

बौद्ध धर्म ने ज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में एक नई जागरूकता पैदा की और उसका विकास किया। लोगों को सिखाया कि किसी भी बात को सहजता से स्वीकार मत करो; उसके गुणों पर बहस करों, उसका मूल्यांकन करो। तर्कशीलता ने कुछ हद तक लोगों के बीच कार्य-कारण को बढ़ावा देते हुए अन्धविश्वास को समाप्त कर दिया। नए धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिए, बौद्धों ने एक नए प्रकार के साहित्य को संकलित किया, अपने लेखन द्वारा पाली को भी समृद्ध किया। प्रारम्भिक पाली साहित्य को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। सबसे पहले बुद्ध की बातें और शिक्षा शामिल हैं, दूसरा संघ के सदस्यों द्वारा माने जाने वाले नियमों से सम्बन्धित हैं और तीसरा धम्म के दार्शनिक प्रदर्शन को प्रस्तुत करता है।

एक नई भाषा का उद्भव :

ईसाई युग की पहली तीन शताब्दियों में, पाली और संस्कृत के मिश्रण से, बौद्ध ने एक नई भाषा बनाई, जिसे संकर-संस्कृत (हाइब्रिड संस्कृत) कहा जाता है। बौद्ध भिक्षुओं की साहित्यिक गतिविधियाँ मध्य युग में भी जारी रहीं और पूर्व भारत में उनके द्वारा कुछ प्रसिद्ध अपभ्रंश लेखन किए गए। बौद्ध मठ शिक्षा के महान केन्द्र के रूप में विकसित हुए, उन्हें आवासीय विश्वविद्यालय कहा जा सकता है। बिहार में नालन्दा और विक्रमशिला और गुजरात में बल्लभों का उल्लेख किया जा सकता है।

बौद्ध धर्म का कला पर प्रभाव :

बौद्ध धर्म ने प्राचीन भारत की कला पर अपना निशान छोड़ा। भारत में पूजा की जाने वाली पहली मानव मूर्तियाँ सम्भवतः बुद्ध की थीं। बुद्ध धर्म के अनुयायियों और भक्तों ने पत्थर में बुद्ध के जीवन के विभिन्न घटनाओं को चित्रित किया। बिहार में बोधगया और मध्य प्रदेश में साँची एवं भरहुत की मूर्ति श्रृंखला इन्हीं कलात्मक गतिविधियों के उदाहरणों को उजागर करते हैं। पहली शताब्दी के बाद से, गौतम बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण श्रृंखलाबद्ध रूप से शुरू हो गया। यूनानी और भारतीय शिल्पकारों ने एक साथ मिलकर भारत के उत्तर-पश्चिम सीमाओं पर एक नई कला का सृजन किया जिसे गान्धार कला के रूप में जाना जाता है। इस क्षेत्र में बनाई गई छवियाँ भारतीय और विदेशी प्रभाव दोनों को दर्शाती हैं। भिक्षुओं के निवास के लिए, चट्टानों से कमरे बनाए गए थे और इस प्रकार गया से सटी हुई पहाड़ियों और पश्चिमी भारत में भी नासिक के आस-पास गुफा-वास्तुकला की शुरुआत हुई। दक्षिण में कृष्णा नदी के किनारे और उत्तर में मथुरा में बौद्ध कला का विकास हुआ।

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