Equality in Indian constitution | भारतीय संविधान में समानता | समानता का अधिकार

समानता (Equality in Indian constitution) : लोकतंत्र का मूलमंत्र होता है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, सार्वजनिक पदाधिकारी, साधारण नागरिक, कानून के समक्ष सब समान होते हैं। वे सब देश के साधारण न्यायालयों व कानून के अधीन हैं। इसी को कानून के समक्ष समानता कहा जाता है जो विधि के शासन का एक अंग है। प्रस्तावना में इसे स्थिति की समानता (Equality of Status) कहा गया है। कानून का समान संरक्षण सबको प्राप्त हो। यह समानता का दूसरा पक्ष है। इसे प्रस्तावना में अवसर की समानता (Equality of opportunity) कहा गया है।

Equality in Indian constitution

समानता का अधिकार : Equality in Indian constitution

समानता के अधिकार (Right of equality) की विस्तृत व्याख्या मूलाधिकारों के भाग III में, अनु. 14 से 18 तक की गई है।

भारतीय संविधान की विशेषता यह है कि वह न केवल राज्य द्वारा व्यक्तियों के विरुद्ध भेद-भाव का निषेध करता है वरन् समाज में व्याप्त उन रस्म रिवाजों, प्रथाओं और परम्पराओं पर भी प्रतिबन्ध लगाता है जो व्यक्तियों में जाति, रंग, धर्म, लिंग या किसी भी आधार पर भेद करती हैं।

अतः प्रस्तावना में समानता के उद्देश्य को शामिल करके भारतीय समाज को समतामूलक बनाने का सन्देश दिया गया है।

◆ प्रस्तावना में इस बात पर बल दिया गया है कि देश के नागरिकों में भ्रातृत्व की भावना को प्रोत्साहन दिया जाय। इससे प्रत्येक व्यक्ति को अपने आत्मसम्मान का आश्वासन प्राप्त होगा और राष्ट्र की एकता व अखण्डता को भी बल मिलेगा।

आर्थिक नियोजन और विकास, समाजवाद, औद्योगीकरण, पंचायती राज, आदि इस आदर्श की दिशा में महत्त्वपूर्ण उपाय हैं।

परन्तु दलगत राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिये धर्म के नाम पर समाज को खण्डित कर उसमें अल्पसंख्यकों को एक पृथक इकाई बना देना और ऐसे उपाय अपनाना जो उनका तुष्टिकरण प्रतीत हों, प्रस्तावना के भ्रातृत्व के लक्ष्य के अनुकूल नहीं है।

अमेरिका में सार्वजनिक शिक्षा के क्षेत्र में प्रजाति (race) के आधार पर पृथक्करण की नीति को समान शैक्षणिक अवसरों का खण्डन मानते हुये एक मामले (1954) मुख्य न्यायाधीश अर्ल वारेन ने कहा :

हमारा निष्कर्ष है कि सार्वजनिक शिक्षा के क्षेत्र में “पृथक परन्तु समान” के सिद्धान्त के लिये कोई स्थान नहीं है। पृथक शैक्षणिक सुविधायें स्वभावतः असमान हैं। “

इसी प्रकार भारत में अल्पसंख्यकों के लिये जो पृथक्करण की नीतियाँ और कार्यक्रम अपनाये जाते रहे हैं वे संविधान की प्रस्तावना के भ्रातृत्व के लक्ष्य के प्रतिकूल हैं।

भ्रातृत्व की मांग है कि सब समान समझे जायें। उनमें धर्म के नाम पर उन्हें अल्पसंख्यक कहकर कोई भेद न किया जाय। विशेषाधिकारों, रियायतों, सुविधाओं या अनुदान के आबंटन में कोई साम्प्रदायिक भेद न किया जाय। यही न्याय है, यही विशुद्ध धर्मनिरपेक्षता है। यही भ्रातृत्व की भावना के प्रसार का उपाय है।

◆ संविधान के उद्देश्यों में राष्ट्र की एकता और अखंडता बनाये रखने पर भी बल दिया गया है। मुस्लिम साम्प्रदायिकता के कारण देश के बंटबारे के ऐतिहासिक में यह परम आवश्यक था। वर्तमान काल में जम्मू-कशमीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकवादी विद्रोहकारी अभियानों को देखते हुये प्रस्तावना की यह मांग शासन के लिये एक सतत चेतावनी समझी जानी चाहिये।

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